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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 470 of 505

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Page 470

४७६ [परिशिष्ट] वैश्वानर
२०३. वेद-वेदान्त -- वेद का अर्थ- 'वास्तविक ज्ञान' से लगाया जाता है; किसी तथ्य को जानने के अर्थ में भी वेद
शब्द प्रयुक्त होता है। भारतीय आर्य संस्कृति के चार धार्मिक ग्रन्थ जो सर्वप्रधान और सर्वमान्य हैं, 'वेद' कहलाते
हैं। ये ब्रह्मा के चारों मुखों से निःसृत माने गये हैं। वेदों के भी चार भाग माने गये हैं- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक
और उपनिषद्। प्रत्येक वेद की कई- कई शाखाएँ भी प्रचलित हुई हैं। प्रत्येक वेद के स्वतंत्र उपवेद भी व्यवहार
में विकसित हुए। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद ये छः वेदों के अंग या वेदाङ्ग कहलाते हैं।
ऐसी मान्यता है कि वेदों का वर्तमान रूप में संग्रह और संकलन महर्षि व्यास ने किया है, इसलिए वे वेदव्यास कहे
जाते हैं। विष्णु और वायु पुराण में वर्णित है कि स्वयं विष्णु भगवान् ने वेदव्यास का रूप धारण करके वेद के चार
भाग किये और ऋक्, यजुः, साम और अथर्व को क्रमशः पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमंत इन चार शिष्यों-
ऋषियों को दिया। वेद का अन्तिम ध्येय ब्रह्म और आत्म तत्त्व का प्रतिपादन करना है- वेदाः ब्रह्मात्मविषयाः
(भा०पु० ११.२१.३५)। वेदों का अन्तिम भाग वेदान्त के रूप में प्रसिद्ध हुआ- वेदानाम्न्तः इति वेदान्तः। वेदान्त
सार के अनुसार प्रामाणिक उपनिषदें ही वेदान्त हैं- वेदान्तो नामोपनिषत् प्रमाणम् (वे०सा०खण्ड ३)। उपनिषद्
के अनुसार पूर्वकल्प में परम गुह्यज्ञान वेदान्त (उपनिषद्) में वर्णित हुआ है- वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे
प्रचोदितम् (श्वेता० ६.२२)। गीता में भगवान् ने कहा है- वेदान्तकर्ता और वेदविद् मैं ही हूँ और वेदों में मैं ही
जानने योग्य हूँ- वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् (गी० १५.१५)।
२०४. वेदाङ्ग ---द्र.-वेद-वेदान्त ।
२०५. वेदान्त - द्र.- वेद-वेदान्त ।
२०६. वैकुण्ठ - भगवान् विष्णु का धाम या स्थान वैकुण्ठ कहलाता है। पुराणानुसार यह धाम सत्यलोक के ऊपर
सर्वश्रेष्ठ लोक है। भगवान् विष्णु जिन्हें मोक्ष देते हैं, वे इसी धाम में निवास करते हैं। यहाँ के निवासी अजर-अमर
रहते हैं। भगवान् अवतार रूप में स्वर्गवासियों को और सारे वैकुण्ठधाम को भूतल पर उतार लेते हैं- भूमावुत्तारितं
सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् (कृष्णी० २५)। उपनिषद् के अनुसार जो साधक 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र की
उपासना करता है, वह वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है। यह वैकुण्ठधाम विज्ञानघन पुण्डरीक (कमल) है। इसका
स्वरूप विद्युत् के समान परम प्रकाशमय है- ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रोपासको वैकुण्ठभुवनं गमिष्यति।
तदिदं पुण्डरीकं विज्ञानघनं तस्मात्तडिदाभमात्रम् (नारा० ४)।
२०७. वैराग्य - वह मानसिक वृत्ति जिसमें सम्पूर्ण सांसारिक विषय- भोग तुच्छ प्रतीत होते हैं और मनुष्य सांसारिक
प्रपञ्चों से निकलकर एकान्त में आत्म उत्थान तथा प्रभु भक्ति में लगता है, वैराग्य कहलाता है। प्राचीन काल में
लोग किसी भी आश्रम अवस्था में वैराग्य होने पर संसार से विरक्त होकर वन में विचरण करते हुए आत्म साधना
में संलग्न हो जाते थे। वैराग्य (संसार से विराग)की स्थिति में ही संन्यास ग्रहण किया जाता था। ईश्वर या गुरु या
इष्ट देव के प्रति अति विशिष्ट राग (स्नेह संबंध) हो जाने की स्थिति को भी वैराग्य कहा जाता है। उपनिषद् के
अनुसार जब भोगने लायक पदार्थों के ऊपर कोई वासना न जाग्रत् हो, तब वह वैराग्य की अवधि (स्थिति) जाननी
चाहिए- वासनाऽनुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदावधिः (अध्या० ४१)। वैराग्य का फल बोध है, बोध का फल
उपरति-चित्तवृत्तियों की विश्रांति या विषय भोग से विरक्ति है। उपरति का फल आत्मानन्द के अनुभव से उत्पन्न होने
वाली शान्ति है- वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम्। स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम्
(अध्या० २८)। गीता में भगवान् का कथन है कि मन अत्यन्त चञ्चल और कठिनाई से वश में आने वाला है;
किन्तु अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आ जाता है-असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु
कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते (गी० ६.३५)।
२०८. वैश्वानर - वैश्वानर शब्द का सामान्य अर्थ 'अग्नि' है। यजन कार्यों में प्रयुक्त अग्नि को 'वैश्वानर' कहते हैं-
वैश्वानरो विसर्गे तु ........ (गोभिलपुत्रकृत संग्रह)। आध्यात्मिक दृष्टि से शरीर के अन्दर परमात्म चेतना का वह
अंश वैश्वानर कहलाता है, जो भोजन आदि के पाचन में योगदान देता है-अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् (गी० १५.१४)। वेदान्तदर्शन की मान्यतानुसार 'वैश्वानर' वह चैतन्यांश