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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

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विधाता-धाता [परिशिष्ट] ४७५

प्राप्त होता है-तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् (मुण्ड०३.२.८)। सबके भीतर रहने वाले
आत्मा के स्वरूप का बोध करने वाला विद्वान् है-सर्वान्तरस्थ स्व संविद्रूपविद्विद्वान् (निरा०३२)।
१९८. विधाता-धाता — विधान करने वाला, रचने वाला, बनाने वाला, उत्पन्न करने वाला, सृष्टिकर्त्ता, ब्रह्मा या ईश्वर
को विधाता कहा गया है। इसे धाता भी कहा गया है; जिसका अर्थ है, पालन करने वाला, धारण करने वाला या रक्षा
करने वाला। ऋग्वेद में आदित्य देव को विश्वकर्मा, धाता और विधाता कहा गया है- विश्वकर्मा विमना आद्विहाया
धाता विधाता परमोत संदृक् (ऋ० ८.३.१७)। निरुक्त की दुर्गवृत्ति में सब भूतों को उत्पन्न करने वाले को धाता
तथा आजीविका आदि कर्मों में प्रवृत्त करने वाले को विधाता कहा गया है- धाता उत्पादयिता सर्वभूतानाम्.....विधाता
जीवनस्य जीवतां च साध्वसाधुषु कर्मसु प्रवर्तमानानां (निरू० दुर्गवृत्ति १०.२६)। आगे निरुक्त में वर्णित है कि
धाता ही सबका विधाता है-धाता सर्वस्य विधाता (निरु० ११.१०)। वह परमेश्वर ही विष्णु,नारायण,अर्क,
सविता,धाता,विधाता और इन्द्र है- विष्णुनारायणोऽर्कः सविता धाता विधाता सम्राडिन्द्र इति (मैत्रा० ५.८)।
१९९. विराट् पुरुष — सार्वभौम शक्ति सम्पन्न परम पुरुष को विराट् पुरुष कहा गया है। दृश्य-अदृश्य अनन्त सृष्टि की
रचना करने वाले उस विराट् पुरुष को सहस्रों नामों से पुकारा जाता है-सहस्राक्षरा वै परमा विराट् (तां० म० २५.
९.४)। यह स्थूल जगत् उसी विराट् पुरुष का शरीर है। वह सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होने पर भी उससे दस अंगुल
ऊपर अवस्थित है। सम्पूर्ण विश्व जो व्यक्त हुआ है, वह तो उसका एक पाद ही है, शेष तीन पाद तो अभी अव्यक्त
हैं (पुरुषसूक्त)। भगवद्गीता के अनुसार भगवान् ने जो अपना विराट् रूप दिखाया था, उसमें सभी लोक, पर्वत,
समुद्र,नदी, देवता आदि दिखाई पड़े थे।
२००. विवस्वान्-वैवस्वत — बारह आदित्यों में से एक विवस्वान् है। भागवत पुराण के अनुसार ये आदित्य
विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, शुक्र तथा उरुक्रम हैं। इनकी पत्नी का नाम
संज्ञा है। विवस्वान् के पुत्र का नाम श्राद्धदेव मनु था। संज्ञा पत्नी से इन्हें यम, यमी आदि संतति हुई (भा०पु० ६.६-
४१)। वर्तमान काल के मनु वैवस्वत इन्हीं के पुत्र हैं। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार मनु वैवस्वत के दस पुत्र थे-
इक्ष्वाकु, तृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूषक, नरिष्यन्त, पृषध्र, नाभाग और कवि (ब्रह्मा० पु० २.३८)। इनकी विदुषी
पुत्री इला मैत्रावरुण याग से उत्पन्न हुई थी। (भा०पु०९.१.१५)।
२०१. विषय-भोग — इन्द्रियजन्य सुख को विषय कहा गया है। ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जो पदार्थ ग्रहण किये जाते हैं (रूप,
रस, गंध, स्पर्श और शब्द), इन्द्रियों के विषय कहलाते हैं। विषयों से जिस सुख-दुःख की अनुभूति होती है, उसे
भोग कहते हैं। गीता में कहा गया है कि विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की आसक्ति विषयों में हो जाती है।
आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है। कामना की पूर्ति न होने से क्रोध उत्पन्न होता है-ध्यायतो विषयान्पुंसः
सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते (गी० २.६२)। मनुष्य के चारों ओर विषयों
की अनन्त लहरें उठती रहती हैं, उनमें घिरा हुआ मनुष्य अपना लक्ष्य नहीं देख पाता। जो इन्द्रिय निग्रह नहीं कर
पाते, उनकी इन्द्रियाँ, आत्मा, परमात्मा और परमार्थ तत्त्व को छोड़कर विषयों की ओर दौड़ती हैं, उन्हें विषयों में
रमण का अभ्यास पड़ जाता है। गीता में भगवान् कृष्ण कुन्तीपुत्र अर्जुन से कहते हैं- जो इन्द्रियों तथा विषयों के
संसर्ग से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, वे निःसन्देह दुःख की योनियाँ हैं, वे आदि और अन्त वाले (नश्वर) हैं, उनमें
बुद्धिमान् नहीं रमते - ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः (गी०
५.२२) विषयों में अनासक्त रहने वाला पुरुष अन्तःकरण का सुख पाता है- बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि
यत्सुखम् (गी० ५.२१)।
२०२. वीर्यम् — वीर्य के पर्याय शुक्र, तेज, रेतस्, बीज, पराक्रम, पुंसत्व, कांति, साहस आदि हैं। शरीर के सप्तधातुओं
में से एक धातु वीर्य है, जिसका निर्माण अन्त में होता है। जिसके कारण शरीर में बल और कांति आती है। आत्मन्
(प्रकृति या सूर्य या अग्नि) से वीर्य की प्राप्ति होती है- आत्मना विन्दते वीर्यं (केन० २.४)। बृहस्पति रूप के द्वारा
उद्गीथ रूप, पितर स्वधा के द्वारा प्रतिहाररूप और इन्द्र वीर्य (पराक्रम) के द्वारा निधनरूप है- रूपेण बृहस्पतिरुद्गीथं
स्वधया पितरः प्रतिहारं वीर्येणेन्द्र निधनम् (जैमि० १.२१.७)। वीर्य का एक अर्थ पराक्रम है। यक्ष ने अग्नि से
पूछा- तुझमें क्या सामर्थ्य है- तस्मिन्स्त्वयि किं वीर्यमिति (केन० ३.५)।