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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 467 of 505

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Page 467

रयि (परिशिष्ट) ४७३

उन्होंने राग कहा है। महर्षि पतंजलि ने राग का मूल अविद्या और परिणाम क्लेश बताया है। द्वेष इसका विपरीतार्थक
शब्द है। चित्त की अप्रिय लगने वाली वस्तु, व्यक्ति या प्रवृत्ति की द्वेष कहते हैं। योग दर्शन के अनुसार सुख-भोग
के अन्दर अन्तःकरण में रहने वाली जो अभिलाषा विशेष है, वह राग है-सुखानुशयीरागः (यो० द० २.७)। न्याय
दर्शन में काम, मत्सर, स्पृहा, तृष्णा, लोभ इन सबको रागपक्ष या राग कहकर निरूपित किया गया है- रागपक्षः
कामो मत्सरः, स्पृहा, तृष्णा, लोभ इति। प्रशस्तपाद भाष्य में द्वेष के पाँच भेद किये गये हैं- द्रोह, क्रोध, मन्यु,
अक्षम, अमर्ष। योग दर्शन के अनुसार दुःख में बसने वाली अन्तःकरण की प्रवृत्ति द्वेष है- दुःखानुशयी द्वेषः
(यो०द० २.८)। राग-द्वेष रजोगुण का विकार है। गीता में निर्देश है कि रजोगुण की रागात्मक तृष्णा तथा आसक्ति
से उत्पन्न हुआ जान-रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् (गी० १४.७)। उपनिषद् में इन विकारों की
तुलना राक्षसों से की गयी है। द्वेष चाणूर मल्ल है। मत्सर दुर्जय मुष्टिक है-द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयं मत्सरो मुष्टिको
जयः। (कृष्णो० १४)। गीता में भी इन दोनों विकारों को जीव का शत्रु कहा गया है- इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे
रागद्वेषौ व्यवस्थितौ तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ (गी० ३.३४)।
१८८. रयि— रयि शब्द कोश ग्रन्थ में जल, सोम रूप अन्न भोजन या सम्पत्ति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आदित्य की
प्राण स्वरूप और रयि की चन्द्रस्वरूप प्रतिपादित किया गया है। स्थूल और सूक्ष्म (मूर्त और अमूर्त) प्रकृति के सभी
घटकों को रयि माना गया है- रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च (प्रश्न० १.५)। पितृयान मार्ग जो
चन्द्रलोक होकर जाता है, उसे रयि कहा है- एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः (प्रश्न. १.९)। मनुष्यगण रयिरूपी
लौकिक सम्पदा की अभिलाषा सदैव करते रहते हैं। उपनिषद् में वर्णित है कि उस विराट् पुरुष की सभी अपनी
अभिलाषा के अनुरूप समझते हैं। देवता उसे अमृतरूप में अपनाते हैं। मनुष्यगण उसे रयि (लौकिक सम्पदा) के
रूप में मानते हैं- उर्गिति देवाः । रयिरिति मनुष्याः (मुद्ग० ३.२)। पितृयान मार्ग का सम्बन्ध दक्षिणायन तथा
कृष्णपक्ष से है, अतः दक्षिणायन या कृष्णपक्ष की भी रयि कहा गया है।
१८९. लिङ्ग— लिङ्ग का सामान्य अर्थ है- लक्षण, प्रतीक, चिह्न, निशान, जिससे किसी का बोध हो। जैसे पुल्लिंग से
पुरुष का बोध होता हैं और शिवलिंग से शिव का बोध होता है; अतः लिङ्ग 'बोधक' अर्थ में प्रयुक्त होता है। धूम्र
अग्नि का लिङ्ग है। उस परम पुरुष का बोध अन्य किसी भी तत्त्व से नहीं हो सकता, अतः उसे अलिङ्ग भी कहा
गया है। लिङ्ग पुराण में शिव के दो रूप वर्णित हैं- १. निर्गुण शिव, उन्हें अलिङ्ग कहा गया है, २. जगत्कारण रूप
शिव, जिनका बोधक शिवलिङ्ग है। कहीं लिङ्ग की अव्यक्त अथवा अमूर्त सत्ता का स्थूल प्रतीक कहा गया है। कहीं
इसे प्रकृति बोधक भी माना गया है। उपनिषद् में उस विराट् परम पुरुष की निराकार रूप होने के कारण अलिङ्ग
कहा गया है-अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च (कठ० २.३.८)।
१९०. लोक, परलोक,सप्तलोक— हमारे पुराशास्त्रों में सात लोकों का प्रायः उल्लेख मिलता है। वस्तुतः धरती और
इसके ऊपर सात लोक हैं तथा धरती से नीचे भी सात लोक है। इस प्रकार कुल चौदह लोक हो जाते हैं। चूँकि
ऊपर-नीचे सात-सात लोक हैं, इसलिए उपलक्षण में सात लोक ही कहे जाते हैं। ऊर्ध्व सप्तलोक हैं- भूः, भुवः,
स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्यम् तथा अधः लोक हैं- अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल
और पाताल (पद्मपु०)।
यहाँ उपनिषदों के परिप्रेक्ष्य में इनका दार्शनिक स्वरूप प्रतिपादित किया गया है। दार्शनिक मान्यता के
अनुसार शीर्षस्थ इन्द्रियों के जो स्थान हैं (२ आँख, २ कान, २ नाक एवं १ जिह्वा), वे ही सप्त लोक हैं, क्योंकि
प्राण इन्हीं स्थानों में विशेष रूप से संचरित होते हैं। इस प्रकार ये इन्द्रिय गोलक 'लोक' कहे जा सकते हैं, चूँकि
इनकी संख्या सात है, इसलिए ये सप्तलोक कहे जाते हैं। उपनिषदों में प्रायः दो लोकों का उल्लेख मिलता है- इह
लोक और परलोक। दूसरे शब्दों में इसे ही 'अयं लोक' और 'असौ लोक' कहा गया है। निरुक्त में तीन लोकों का
उल्लेख मिलता है- पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक। सुश्रुत में दो लोक हैं- स्थावर और जङ्गम।
१९१. वरदान — किसी देवी-देवता या महापुरुषों से माँगा हुआ मनोरथ वरदान कहलाता है। वह कथन जिसके लिए
देवों से प्रार्थना की जाय या उनसे प्राप्त हुआ फल भी वरदान कहलाता है। वर का एक अर्थ-श्रेष्ठ या सर्वोत्तम भी
है। कठोपनिषद् का कथन है कि उठो! जागो! और श्रेष्ठ महापुरुषों के पास जाकर उस आत्म तत्त्व को जान लो-