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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

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ब्रह्मन्भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगतः (यो०त० १९)। योग के आठ अंग माने गये
हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हें अष्टांग योग कहते हैं। महर्षि
पतंजलि ने योग दर्शन की रचना की। इन्होंने योग दर्शन की चार भागों या पादों- समाधि, साधन, विभूति और
कैवल्य में विभाजित किया। जो साधक योग का अभ्यास करते हैं, उन्हें अनेकों विलक्षण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं,
जिन्हें विभूति या सिद्धि कहते हैं। विज्ञान भिक्षु का 'योगसार संग्रह' योग का एक प्रामाणिक ग्रन्थ है। गीता में
भगवान् ने योग को कर्म का कौशल कहकर निरूपित किया है- तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्
(गी० २.५०)। योग को शरीर, मन और अन्तःकरण इन तीन साधनों के द्वारा क्रमशः कर्मयोग, ज्ञानयोग और
भक्तियोग- इन तीन प्रकारों में विभक्त किया गया है। कठोपनिषद् का कथन है कि इन्द्रियों की स्थिर धारणा ही योग
है- तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् (कठ० २.३.११)। गीता के अनुसार असंयत आत्मा (मन) वाले
को योग प्राप्त करना कठिन है- असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः (गी० ६.३६)। जिस प्रकार वायु रहित
स्थान में दीपक चलायमान नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा के योग में लगे हुए संयतचित्त योगी की स्थिति कही गयी
है-यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमास्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः (गी० ६.१९)। योग
युक्त आत्मा सबको समभाव से देखने वाला अपने को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपने में देखता है-
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः (गी० ६.२९)।
१८५. योग-क्षेम— 'योग-क्षेम' शब्द दर्शन जगत् का बड़ा ही प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय शब्द है। सामान्य आध्यात्मिक
जीवन की प्रवृत्ति वाला मनुष्य अपने जीवन में योग-क्षेम की ही आकांक्षा रखता है। योग-क्षेम का तात्पर्य है 'प्राप्त
भोग पदार्थ सुरक्षित बने रहें तथा जो अप्राप्त है, वे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों। योग-क्षेम की शास्त्रीय परिभाषा है-
'अप्राप्तस्य प्रापणं योगः,' 'प्राप्तस्य रक्षणं क्षेमः' अर्थात् अप्राप्त की प्राप्ति 'योग' है और प्राप्त की रक्षा क्षेम है।
सामान्य जीवनचर्या के लिए यह आवश्यक है, परन्तु जो सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक जीवन के पथिक हैं, वे इस योग-
क्षेम को तुलना में ब्रह्मज्ञान- आत्मज्ञान की प्राप्ति अभीष्ट मानते हैं; क्योंकि यही मुक्ति का आधार है। 'ऋते ज्ञानान्न
मुक्तिः' - यह उक्ति इसी तथ्य को ओर संकेत करती है। ज्ञान (ब्रह्मज्ञान-आत्मज्ञान) के बिना मुक्ति सम्भव नहीं।
कठोपनिषद् में यह तथ्य बड़े स्पष्ट शब्दों में व्याख्यायित हुआ है कि सामान्यजन (मन्द व्यक्ति) योग-क्षेम का
आधार होने से 'प्रेय' मार्ग का वरण कर लेते हैं, जबकि यह नश्वर है। भौतिक सुख-सुविधा के साधन अनित्य ही
हैं। इसलिए परमकल्याण (मोक्ष) पथ के पथिक इसकी चाह नहीं करते, वे श्रेय मार्ग- आत्मसाक्षात्कार-
ब्रह्मसाक्षात्कार का मार्ग अपनाते हैं, भले ही कष्ट साध्य जीवन क्यों न जीना पड़े। इस प्रकार योग-क्षेम सामान्य
जनों का आकांक्षणीय है। गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है कि जो अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, उसका
योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। उसे अपने योगक्षेम की चिन्ता नहीं करनी चाहिए-अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः
पर्युपासते तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् (गी० ९.२२)।
१८६. योनि— योनि शब्द सामान्यतय उद्गम या उत्पत्ति स्थान अथवा उत्पादक कारण के रूप में प्रयुक्त होता है।
जीवात्मा के ८४ लाख योनियों में परिभ्रमण की मान्यता भी प्रसिद्ध है। प्राणियों के ये विभाग या वर्ग प्रधानतः चार
हैं- अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज। कुछ विद्वानों के मत से ये चारों इक्कीस-इक्कीस लाख हैं। इन सबमें
मनुष्य योनि को श्रेष्ठ-सर्वोत्तम और दुर्लभ कहा गया है। योनि और रेतस् की संगति गायत्री और रथन्तर से की गयी
है- रेतो वै गायत्र्यै रथन्तरं, योनिर्वै रथन्तरस्य गायत्री (जै०ब्रा० ३.२९२)। पृथिवी को भी योनि कहकर निरूपित
किया गया है-योनिर् वा इयं (पृथिवी) (शत०ब्रा० १२.४.१.७)। सभी प्राणी संवत्सर (काल) से उत्पन्न होते हैं,
अतः संवत्सर को सम्पूर्ण प्राणियों को योनि कहा गया है- संवत्सरो हि सर्वेषां भूतानां योनिः (शत०ब्रा०८.४.१.१८)।
उपनिषद् में वर्णन है कि प्रजापति ने मुख रूप योनि (केन्द्र) से दोनों हाथों द्वारा अग्नि की उत्पन्न किया- स
(प्रजापतिः) मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत (बृह०१.४.६)।
१८७. राग-द्वेष— किसी इष्ट वस्तु या सुख आदि को प्राप्त करने को अभिलाषा या उसके प्रति आकर्षण या अनुराग
आसक्ति का भाव राग कहलाता है। पतंजलि ने पाँच प्रकार के क्लेशों में से एक क्लेश राग को माना है। उनके
अनुसार जब कोई व्यक्ति सुख भोगता है, तो उसकी प्रवृत्ति और अधिक सुख पाने की होती है, इसी प्रवृत्ति को