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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 462 of 505

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Page 462

४६८ [परिशिष्ट] महात्मा

है। मनस्यति अनेन इति मनः अर्थात् जिससे मनन किया जाय, वह मन है। कुछ विद्वानों ने मन को एक ज्ञानेन्द्रिय
माना है, जिसके द्वारा सुख-दुःख आदि का बोध होता है- सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियम् मनः (तर्क भाषा)।
गीता में मन को छठी इन्द्रिय के रूप में स्वीकार किया गया है- मनः षष्ठानीन्द्रियाणि (गीता)। जो मन मनन
करता है, वह वाणी व्यक्त करती है- तद्यद्वै मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति (जैमि० १.४०.५)। मन ही देखता है,
मन ही सुनता है। काम, सङ्कल्प, श्रद्धा आदि सब में मन ही कारणभूत है- मनसा ह्येव पश्यति, मनसा शृणोति।
कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव (बृह० १.५.३)। मन ही
बन्धन और मोक्ष का भी कारण है- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः (मैत्रा० ४.४-८) । शिवसङ्कल्पोपनिषद्
के प्रत्येक मन्त्र में 'तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु' पद आया है, जिसका भाव है वह हमारा मन शिव-कल्याणकारी
संकल्प से युक्त हो'। हमारा मन अनन्त सामर्थ्य से परिपूर्ण है- अनन्तं वै मनः (बृह०३.१.९)। सांख्य दर्शन के
सिद्धान्तानुसार प्रकृति से महत् अथवा बुद्धि की उत्पत्ति होती है। इससे पुनः अहङ्कार की उत्पत्ति होती है। फिर
अहङ्कार से मनस् की उत्पत्ति होती है। यह मनस् तत्त्व बुद्धि को बाह्यज्ञान की सूचना देता है, ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान
को बुद्धि तक पहुँचाता है।
१६३. मनीषी - द्र०- कवि।
१६४. मन्थ - 'मन्थ' धातु मथने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक साहित्य में एक पेय पदार्थ जिसमें कई पदार्थ मथ
दिये जाते थे, मन्थ कहते थे। शाङ्खायन आरण्यक (१२.८) में सभी प्रकार के मन्थों का उल्लेख मिलता है। कोश
ग्रन्थों में मन्थ शब्द 'मथना या बिलोना' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। हिलाना, मलना, ध्वस्त करना, कम्पन आदि इसके
पर्याय हैं। दूध मिला हुआ सत्तू का पेय प्रायः मन्थ के रूप में प्रयुक्त होता था। घर्षण द्वारा अग्नि उत्पन्न करने के यन्त्र
मन्था को भी मन्थ कहा गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् में अग्नि में आहुति डालकर संस्रव (स्रुवा से लगे हुए घृत)
को मन्थ में डालने का निर्देश कई बार हुआ है- अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति (बृह०६.३.३)।
१६५. मन्यु-क्रोध- मन्यु शब्द के पर्याय हैं- स्तोत्र, कर्म, शोक, याग, क्रोध (अनीति के प्रति क्रोध), साहस,
अहंकार आदि। शिव और अग्नि को भी मन्यु कहा गया है। इन्द्रदेवता ने मन्यु के द्वारा वृत्र का हनन किया- मन्युना
वृत्रहा (तै०.सं० ४.४.८.१)। मन्यु के द्वारा संयुक्त होकर इन्द्र ने असुरों को मिटाया- मन्युना वै युजेन्द्रोऽसुरानवाबाधत
(मै०ब्रा० ४.६.३)। मन्यु के द्वारा ही पराक्रम प्रेरित होता है, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है- मन्युना वै वीर्यं
क्रियते, इन्द्रियेण जयति (मै०ब्रा०२.२.१२)। वराह के क्रोध को मन्यु कहकर निरूपित किया गया है- पशूनां वा
एष मन्युर्यद्वराहः (तै० ब्रा० १.७.९.४)। क्रोध के विषय में महर्षि वाल्मीकि कहते हैं- वे श्रेष्ठ और महात्मा लोग
धन्य हैं जो उठते हुए क्रोध को विवेक से वैसे ही दबा देते हैं, जैसे जलती आग को जल से (वा० सु०का० ५५.४)।
क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है तथा पराये दोष देखने से भड़कता है। हे राजन् ! क्षमा द्वारा वह रुकता है तथा क्षमा
से ही शान्त हो जाता है (महा० शा०प० १६३.७)।
१६६. मर्त्य - मर्त्य का सामान्य अर्थ मरणधर्मा या मरणशील है। मरने वाला या नश्वर जगत् मर्त्य है। अनेक स्थानों
पर मनुष्य के लिए मर्त्य शब्द प्रयुक्त हुआ है, अतः मनुष्य लोक या भूलोक को मर्त्यलोक भी कहा गया है। मनुष्य
लोक का निवासी यह मनुष्य जीर्ण होने वाला और मरणशील (मर्त्य) है, इस तथ्य को जानने वाला अमर-अजर
देवात्माओं (अथवा आत्मा) का सङ्ग पाकर वैसा ही होता है-अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधस्थः
प्रजानन् (कठ० १. १.२८)। यह मरणधर्मा मनुष्य धान्य की तरह पकता है और धान्य की तरह फिर उत्पन्न होता
है- सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाऽऽजायते पुनः (कठ० १. १.६)। जिस समय मनुष्य के हृदय में स्थित
कामनाओं का नाश हो जाता है, उस समय मरणधर्मा मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है और यहीं उसे ब्रह्म को प्राप्ति
होती है-यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति (बृह०४.४.७)।
१६७. महात्मा - जिसकी आत्मा बहुत उच्च हो, जिसका स्वभाव, आचरण और विचार आदि बहुत उच्च हो, ऐसे
महानुभाव को महात्मा कहा गया है। महादेव शिव के पर्याय के रूप में महात्मा शब्द प्रयुक्त हुआ है। दर्शनशास्त्र
में यह शब्द उच्च आत्मा, परमात्मा या विश्वात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। किसी सन्त या महापुरुष के लिए
आदरवाचक अर्थ में भी यह शब्द प्रयुक्त होता है। महात्मा यमराज ने नचिकेता की बुद्धि से प्रसन्न होकर वर दिया-