१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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रथ की गति। सूर्यरथ एक मुहूर्त (४८ मिनट) में चौंतीस लाख आठ सौ योजन (१ योजन=४ कोस, १ कोस=२
मील या तीन किलोमीटर) पार करता हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्ड अत्यधिक बृहदाकार सिद्ध होता है।
१५७. ब्राह्मण— ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण कहा गया है। ब्रह्म का एक अर्थ वेद भी है, अतः वेदाध्यायी को भी
ब्राह्मण कहा जाता है। सामान्यतः चतुर्वर्णों में प्रथम वर्ण ब्राह्मण कहलाता है। ब्राह्मण को पृथ्वी का देवता (भूसुर)
भी कहा गया है। मनुस्मृति में ब्राह्मण के छः कर्त्तव्य बताए गये हैं- अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं
प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् (मनु० १.८८)। याज्ञवल्क्य गार्गी से कहते हैं कि जो इस अक्षर (अविनाशी
स्वरूप आत्मा) की जानकर इस लोक से प्रयाण करता है, वह ब्राह्मण है- अथ य एतदक्षरं गार्गि
विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति, स ब्राह्मणः (बृह०३.८.१०)। ब्राह्मण आत्मा को जानकर तीनों एषणाओं को त्यागकर
भिक्षाचर्या से विचरते हैं- एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च
व्युत्थायाऽथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह०३.५.१)। चारों वर्णों को उत्पन्न करने वाले ब्रह्म (परमात्मा) देवों में
अग्निरूप से ब्रह्मा हुए, मनुष्यों में ब्राह्मण हुए- तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माऽभवद् ब्राह्मणो मनुष्येषु (बृह०१.४.१५)।
१५८. भर्ग— सूर्य के तेज, ज्योति, दीप्ति को भर्ग कहा गया है। यह भूनने के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। अतः पापों या
विकारों को भूनने के उद्देश्य से साधक सूर्य के भर्गस्वरूप की उपासना करते हैं। भगवान् शिव, त्र्यंबक के लिए
अमरकोश में 'भर्ग' शब्द प्रयुक्त हुआ है। मैत्रायण्युपनिषद् में 'भर्ग' शब्द की व्याख्या इस प्रकार वर्णित है-भर्ग वही
है, जो सूर्य में स्थापित है। आँख की पुतली में भी भर्ग नाम से यही रहता है। इसकी कान्ति से मनुष्य गति कर
सकता है, अतः यह भर्ग है अथवा यह सबको तपाता है, इसी से यह भर्ग है। यह रुलाने वाला रुद्र है अथवा प्राणियों
का रञ्जन करता है, इसलिए भर्ग है अथवा यह प्राणियों में जाता है, अतः यह भर्ग है अथवा इस जगत् में यह आता
और जाता है अथवा प्रजा का धारण-पोषण करने से यह भर्ग है (मैत्रा० ५.७)।
१५९. भवबन्धन— द्र०- आवागमन -चक्र।
१६०. भूत— उपनिषद् आदि में भूत शब्द प्राणी अथवा जीव के लिए प्रायः प्रयुक्त हुआ है। अतीत, विगत या बीते समय
के लिए भी 'भूत' का प्रयोग होता है। स्थूल जगत् के निर्माण में अव्यक्त प्रकृति से घनीभूत हुए पञ्चतत्त्वों को भी
पञ्चमहाभूत कहा जाता है। जो प्राणी मृत्यूपरान्त सूक्ष्म शरीरधारण कर प्रेतयोनि में जाते हैं, उन्हें भी भूत कहते हैं।
गीता में भगवान् कहते हैं- हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पूर्व अव्यक्त हैं, बीच में व्यक्त होते हैं और मृत्यूपरान्त
अव्यक्त हो जाते हैं- अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना
(गी०२.२८) ईशोपनिषद् में कहा गया है- जिस साधक को सभी प्राणी आत्मरूप अनुभूत होते हैं, उस एकत्व को
अनुभूति करने वाले साधक को मोह-शोक नहीं रहता- यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को
मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः (ईश० ७)।
१६१. भोक्ता— भोक्ता का सामान्य अर्थ है- भोग करने वाला, भोगने वाला, भोजन करने वाला, शासन करने वाला,
अनुभूत या सहन करने वाला। कहीं अनादि प्रकृति को भोग्या और जीव को भोक्ता कहकर निरूपित किया गया
है। इन्द्रियों को घोड़ा और विषयों को घोड़े चरने के मार्ग एवं शरीर, इन्द्रिय और मन के साथ रहने वाले जीवात्मा
को मनीषीगण भोक्ता कहते हैं-इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्
भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः (कठ० १.३.४)। गीता में भगवान् कहते हैं, सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ- अहं
हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च (गीता० ९.२४)। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में जो भोग,
भोक्ता और भोग्य है, वह सदाशिव, चैतन्यस्वरूप और विलक्षण साक्षीरूप मैं ही हूँ-त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता
भोगश्च यद्भवेत्। तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः (कै० १८)।
भोक्ता, भोग्य और प्रेरक परमात्मा-इन तीनों का ज्ञान होने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यह ब्रह्म इन तीन भेदों
में वर्णित है- भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् (श्वेता० १.१२)।
१६२. मनस् — पंच ज्ञानेन्द्रियों, पंच कर्मेन्द्रियों के साथ मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है; परन्तु यह शरीर के भीतर
रहने वाली इन्द्रिय अन्तरिन्द्रिय है। मन अन्तःकरण की वह वृत्ति है, जिसके द्वारा सङ्कल्प और विकल्प किया जाता