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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 431 of 505

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Page 431

आकाश [परिशिष्ट] ४३७

कार्यों में विघ्नकारी तथा कुमार्गगामी माना गया है। राक्षसों को कुबेर के धनकोश का रक्षक भी माना गया है। असु
का अर्थ प्राण होने से असुर शब्द प्राणवान् या शक्तिमान् का भी बोधक है। असुरों के गुरु भृगुपुत्र शुक्राचार्य माने
गये हैं। देवों, मनुष्यों एवं असुरों तीनों को प्रजापति की संतान कहकर स्वीकार किया गया है- त्रयाः प्राजापत्याः
प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुराः (बृह० ५.२.१)।
२७. आकाश - पृथ्वी से ऊपर-नीचे विस्तृत अनंत आकाश (रिक्त स्थान) है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व के सब पदार्थ
ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र, तारे, चन्द्र, सूर्य आदि स्थित हैं, आकाश कहलाता है। पृथ्वी के निकटवर्त्ती आकाश का वह
भाग, जिसमें वायु और मेघ होते हैं, अन्तरिक्ष लोक कहा जाने लगा। पञ्चतत्त्वों में से एक तत्त्व आकाश है, जिसका
गुण 'शब्द' है और उससे श्रोत्रेन्द्रिय की उत्पत्ति मानी गयी है। द्यौः, द्यु, अभ्र, व्योम, पुष्कर, अम्बर, गगन, नभ,
अनन्त, स्वर्ग, खं आदि आकाश के पर्यायवाची शब्द हैं। पृथ्वी के ऊपर के आकाश (स्वर्ग) में तथा नीचे के
आकाश (पाताल) में सात-सात लोकों के अस्तित्व का उल्लेख भी मिलता है। याज्ञवल्क्य ने गार्गी से आकाश के
विस्तार का वर्णन किया है- जो द्युलोक से ऊपर, पृथ्वी से नीचे और जो द्युलोक एवं पृथ्वी के मध्य में है और
द्युलोक एवं पृथ्वी तथा भूत, वर्तमान, भविष्यत्- ये सब आकाश में ओत-प्रोत हैं- यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक्
पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतञ्च प्रोतञ्चेति
(बृह० ३.८.४)। यह सम्पूर्ण विश्व आकाश में ही है- सर्वमित्याकाशे (तैत्ति० ३.१०.३)।
२८. आत्मा-जीवात्मा - वेदान्त का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय 'आत्मा' ही है। वेदान्त ग्रन्थों में 'आत्मा' के दो स्वरूप
परिलक्षित होते हैं- एक शुद्ध-बुद्ध-निर्विकार स्वरूप, जिस पर अविद्या-अज्ञान का, कषाय-कल्मष का कोई प्रभाव
नहीं पड़ता है, इसीलिए इसे 'परमात्मा' के समकक्ष माना जाता है- अयमात्मा ब्रह्म (नृ०उ० १.२, रा० उ० २.९),
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् (ऐत० १.१.१), आत्मैवेदं सर्वम् (नृ०उ० ७.४) इत्यादि औपनिषदिक वचन
इसके प्रमाण हैं। आत्मा का दूसरा रूप वह है, जो अविद्या-अज्ञान आदि से आवृत होता है, इसे जीव की - जीवात्मा
की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी का संसार में बारम्बार आवागमन होता है-अतति सन्ततभावेन जाग्रदादिसर्वावस्थासु
अनुवर्त्तते। अत् सातत्यगमने+मनिन् = जीवः (हला०को०)। हलायुध कोश के इस निर्वचन से स्पष्ट है कि जो
निरन्तर गतिमान् रहता है, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में शरीर का अनुवर्तन करता है, वह जीव है-एक
एव हि भूतात्मा भूते-भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ (ब्र०बि० १२) एक एवात्मा
मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु (ब्र०बि० ११), वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा
सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ (कठ० २.२.१०) इत्यादि उपनिषद् वाक्य इसी तथ्य का प्रतिपादन
करते हैं। वेदान्त का मानना है कि इस 'आत्मतत्त्व' का आनुभूतिक ज्ञान हो जाने पर व्यक्ति (जीव) आवागमन से
मुक्त हो जाता है- दुःखों से-शोक से मुक्त होकर परमशान्ति का अधिकारी बन जाता है- एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (कठ० २.२.१२)
वेदान्त के महान् तत्त्वज्ञ महर्षि याज्ञवल्क्य ने इसी उद्देश्य से अपनी धर्मपत्नी मैत्रेयी को आत्मानुसन्धान का
निर्देश दिया था- आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि। आत्मनो वा अरे दर्शनेन
श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेद सर्वं विदितम् (बृह० २.४.५) अर्थात् हे मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शन करने, श्रवण करने,
मनन करने एवं निदिध्यासन (अनुभव) करने योग्य है। आत्मतत्त्व के दर्शन (साक्षात्कार) से, श्रवण से तथा बुद्धि
द्वारा विशेष रूप से जानने (अनुभव करने) से सब कुछ ज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान के अभाव में मुक्ति प्राप्ति सम्भव
नहीं- 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' । अतएव समय रहते जीवन के चरम लक्ष्य-आत्मज्ञान की प्राप्ति का परम पुरुषार्थ
करके मोक्ष को प्राप्ति कर लेना मानव जीवन का उद्देश्य कहा गया है।
२९. आदेश - आदेश शब्द के पर्याय आज्ञा, उपदेश, संकेत, विवरण, भविष्य कथन, विधिवाक्य आदि बताये गये हैं।
उस मनोमय पुरुष का सिर यजुर्वेद है। ऋक् तथा साम क्रमशः दक्षिण और उत्तर भाग है। आदेश (विधि वचन)
आत्मा (शरीर का मुख्य केन्द्र) है-तस्य यजुरेव शिरः। ऋग्दक्षिणः पक्षः। सामोत्तरः पक्षः। आदेश आत्मा
(तैत्ति० २.३.१)। यह उस परम पुरुष का आदेश (संकेत) है, जो बिजली का चमकना है, वह उसके नेत्रों के
झपकाने के समान है- तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३ इतीत्यन्मीमिषदा३इत्यधिदैवतम् (केन०४.४)।