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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

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लिए यह विशेष प्रसिद्ध है- अश्वः पशूनामोजिष्ठो बलिष्ठः (तै० ब्रा० ३.८.७.१), तस्मादश्वः पशूनां वीर्यवत्तमः
(ऐत० ब्रा० ५.१)। चंचल तथा अग्रगामी ज्वालाओं से अग्नि को भी अश्व कहकर निरूपित किया गया है- अग्निर्वा
अश्वः श्वेतः (शत० ब्रा० ३.६.२.५)। सोऽग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय (गो० ब्रा० २.४.११)। यज्ञ की चञ्चल
अग्नि को यज्ञाश्व संज्ञा से निरूपित किया जाता है। विराट् यज्ञ की कल्पना भी अश्वरूप में बृहदारण्यक उपनिषद् में
की गयी है- उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः (बृह० १.१.१)। यह अश्व हय होकर असुरों को और अश्व होकर
मनुष्यों को वहन करता है-हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् (बृह० १.१.२)। इन्द्रियों
का वश में न रह पाना दुष्ट अश्वों की भाँति माना गया है-तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः (कठ०१.३.५)।
२४. अश्वमेध - अश्वमेध यज्ञ एक विशिष्ट वैदिक यज्ञ है। इसका प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र में सांस्कृतिक एकता स्थापित
करना था। इसका अन्य उद्देश्य था- राष्ट्र के पराक्रम को मेधा बुद्धि से संयुक्त करना, जिससे कि अश्व रूपी पाशविक
या चञ्चल प्रवृत्तियों का मेध (मर्दन) हो सके। मध्य युग में राजनैतिक एकता स्थापित करने के उद्देश्य से अश्व
छोड़कर यह विशिष्ट यज्ञानुष्ठान प्रारंभ किया जाता था। अश्वमेध को सभी यज्ञों का राजा कहा गया है- राजा वाऽएष
यज्ञानां यदश्वमेधः (शत० ब्रा० १३.२.२.१)। अश्वमेध सम्पूर्ण राष्ट्र के हित के लिए राष्ट्र के पराक्रम, मेधा, सम्पदा
और राष्ट्रीयता के विस्तार के उद्देश्य से ही सम्पन्न किया जाता था, अतः ब्राह्मण ग्रन्थ में कहा गया है- राष्ट्रं वा
अश्वमेधः (तै० ब्रा० ३.८.९.४)। सूर्य तपता है और उसी से पराक्रम, सामर्थ्य और मेधा क्षरित होती है, अतः सूर्य
को भी अश्वमेध संज्ञा से निरूपित किया गया है-एष ह वा अश्वमेधो य एष (सूर्यः) तपति (बृह० १.२.७)।
२५. असम्भूति-सम्भूति - ईशावास्योपनिषद् में सम्भूति और असम्भूति शब्द का प्रयोग हुआ है। जिसका भाष्य
करते हुए आचार्य शंकर ने लिखा है-सम्भवन्ं सम्भूतिः सा यस्य कार्यस्य सा सम्भूतिः, तस्या अन्या असम्भूतिः
प्रकृतिः कारणमविद्या अव्याकृताख्या। सम्भवन (उत्पन्न होने) का नाम सम्भूति है, वह जिसके कार्य का धर्म
है, उसे 'सम्भूति' कहते हैं। उससे अन्य असम्भूति-प्रकृति-कारण अथवा अव्याकृत नाम की अविद्या है। दूसरे
शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूल प्रकृति जो दृश्यमान जगत् को आदि कारण है, 'असम्भूति' है और यह
दृश्यमान जगत् 'सम्भूति' है। यह दिखायी देने वाला विश्व ब्रह्माण्ड जिसे दर्शन की भाषा में कार्य ब्रह्म भी कहा
जाता है- सम्भूति है और इस ब्रह्माण्ड का आदि कारण अव्याकृत - अप्रकट रूप में विद्यमान जिसे दर्शन की भाषा
में 'प्रकृति' कहा जाता है- असम्भूति है।
ब्रह्माण्ड की तरह पिण्ड में 'सम्भूति-असम्भूति' की स्थिति है। पिण्ड (शरीर) में भी दो स्वरूप का
अनुभव होता है -एक तो हाथ-पैर आदि अंग-अवयवों से शारीरिक कार्य करता हुआ-मन मस्तिष्क से सोच-
विचार करता हुआ, दूसरा उसका कारण स्वरूप जो दृश्यमान नहीं होता, किन्तु दृश्यमान का कारण अवश्य है।
दर्शन की भाषा में दृश्यमान को स्थूल-सूक्ष्म शरीर तथा अदृश्य को कारण शरीर कहा जाता है। यही कारण शरीर
'असम्भूति' तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर 'सम्भूति' की श्रेणी में आता है। उपनिषद् का मानना है कि 'मूल प्रकृति' को-
कारण शरीर की - असम्भूति को सब कुछ मानकर उपासना करने वाला तथा दृश्यमान जगत् की स्थूल-सूक्ष्म
शरीर को-सम्भूति को सब कुछ मानकर उपासना करने वाला घोर अन्धकार में पड़ने की तरह कल्याण की प्राप्ति
नहीं कर पाता, क्योंकि ये दोनों अतिवादी दृष्टिकोण हैं। वस्तुतः मनुष्य को करना क्या चाहिए- इसका स्पष्ट निर्देश
उपनिषद्कार ने ईशावास्योपनिषद् के चौदहवें मन्त्र में दिया है-सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयःसह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते।।' जो व्यक्ति सम्भूति (दृश्यमान जगत्) और विनाश (नाशरहित मूलकारण-
प्रकृति)को साथ-साथ जानता है (उपासना करता है), वह विनाश-अव्याकृत प्रकृति से मृत्यु को पार करके,
सम्भूति-दृश्यमान जगत्-कार्यब्रह्म-से अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। समन्वयवादी दृष्टिकोण यही है।
२६. असुर-राक्षस —शास्त्रों में मनुष्य मात्र को पाँच वर्गों में रखा गया है। चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और
पंचम निषाद। उसी प्रकार सूक्ष्म लोक या अन्तरिक्ष लोक में पाँच वर्ग या श्रेणियों का वर्णन मिलता है- गन्धर्व,
पितर, देवगण, असुर और राक्षस। यज्ञ की सामग्री भी यही ग्रहण करते हैं। इसकी पुष्टि निरुक्त शास्त्र में होती है-
पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम् । गन्धर्वाःपितरो देवा असुरा रक्षांसीत्येके । चत्वारो वर्णा निषादः पञ्चम
इत्यौपमन्यवः (निरु० ३.८)। असुरों को दैत्यों, दानवों या राक्षसों की श्रेणी में गिना जाता है। इन्हें पवित्र यज्ञादि