१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
Page 414 of 505
Read in context४१४ श्वेताश्वतरोपनिषद्
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥८॥
मैं इस अविद्यारूप तमस् से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरूप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही
विद्वान् मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं ॥ ८ ॥
यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष
की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त है ॥ ९॥
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्।
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १०॥
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्म) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुःखों से परे है, जो
विद्वान् उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अन्यान्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं ॥ १०॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥
वह कल्याणकारी भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवा वाला है, वह सम्पूर्ण प्राणियों की हृदय
गुहा में निवास करता है। वह सर्वव्यापी और सब जगह पहुँचा हुआ है ॥ ११॥
महान्प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥
यह परम पुरुष परमात्मा महान्, सर्व समर्थ, सबका नियन्ता, प्रकाश स्वरूप और अविनाशी है,
अपनी अत्यन्त निर्मल कांति की प्राप्ति के निमित्त अन्तःकरण को प्रेरित करने वाला है ॥ १२ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।
हृदा मनीषी मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १३॥
अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला अन्तरात्मा सर्वदा मनुष्यों के हृदय में सन्निविष्ट रहता है। जो विद्वान् इस
हृदयगुहा में स्थित मन के स्वामी को विशुद्ध मन से साक्षात्कार करके जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥
[ गीता ने भी हृदय में स्थित अंगुष्ठ मात्र जीवात्मा का उल्लेख किया है। शरीर विज्ञान के अनुसार हृदय
में पेसमेकर से उसकी संगति बैठती है। हृदय की धड़कन के मूल स्पंदन वहीं से उपजते हैं। ]
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥
वह परमात्मा सहस्र सिर वाला, सहस्र नेत्रों वाला और सहस्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत् को
सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर(सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर
हृदयाकाश में स्थित है ॥ १४॥
पुरुष एवेदः सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ १५ ॥
जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यत्काल में होने वाला है और जो अन्नादि पदार्थों से पोषित
हो रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है ॥ १५ ॥
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
वह परम पुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह
कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥