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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 413 of 505

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Page 413

अध्याय ३ मन्त्र ७ ४१३
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भवे संभवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥
जो एक मायापति अपनी प्रभुतासम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है,जो अकेला
ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान् जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥ २ ॥
वह एक परमात्मा ही रुद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन
करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर
स्थित है, वह सम्पूर्ण लोकों की रचना करके उनका रक्षक होकर प्रलयकाल में उन्हें समेट लेता है ॥ २ ॥
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
संबाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥
वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को
बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है,वही इस द्यावा-पृथिवी का रचयिता है ॥ ३ ॥
यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥
जो रुद्ररूप परमात्मा सम्पूर्ण देवों की भी उत्पत्ति और उनके विकास का कारण है, जो सबका
अधिपति और सर्वज्ञाता है, जिसने सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया, वह परमात्मा हम सबको
कल्याणकारी बुद्धि से संयुक्त करे ॥ ४ ॥
या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शंतमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५ ॥
पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता हे रुद्रदेव ! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कान्तिमान्
जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें ॥ ५ ॥
यामिषुं गिरिशंत हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥
हे हिमालय वासी सुखदाता ! जिस बाण को आप प्राणियों की ओर फेंकने के लिए हाथ में धारण
किये रहते हैं, हे हिमालय रक्षक देव ! आप उसे कल्याणकारी बनाएँ, इस जगत् को, जीव समूह को हिंसित
न करें ॥ ६ ॥
ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति ॥ ७ ॥
जो उस जीव-जगत् से परे हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्मा से भी अत्यन्त श्रेष्ठ है, जो अत्यन्त व्यापक है,
किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत् को अपनी सत्ता से
घेरे हुए उस महान् परमात्मा को जानकर विद्वान् पुरुष अमर हो जाते हैं ॥ ७ ॥