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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 370 of 505

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Page 370

३७० मुण्डकोपनिषद्
एक आत्मा को ही जानें, उससे भिन्न अन्य विषयों को सर्वथा छोड़ दें, यही अमृतरूप ब्रह्म प्राप्ति का सेतु
(साधन) है ॥ ५ ॥
अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥
रथ चक्र की नाभि में जिस प्रकार अरे लगे होते हैं और जिस प्रकार शरीर की सम्पूर्ण नाड़ियाँ हृदय
में एकत्र होती हैं, उसी प्रकार विभिन्न रूपों में सञ्चरित होने वाला वह परब्रह्म हृदय के मध्य स्थित होता
है। उस परमेश्वर का ॐ के उच्चारण द्वारा ध्यान करना चाहिए। अज्ञान-अन्धकार से पार जाने के लिए यह
आवश्यक है, इस प्रकार आपका कल्याण हो ॥ ६ ॥
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ।
मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं संनिधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा
आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥ ७ ॥
जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है, जिसकी महिमा इस भूलोक में व्याप्त है, वही ब्रह्म (दिव्य ब्रह्मपुर)
आकाश (हृदय गुहा) में प्रतिष्ठित है। जो मनोमय कोश से युक्त है, जो शरीर एवं प्राणों का संचालक है,
जो अन्नमय कोश (अथवा स्थूल शरीर) में हृदय कमल के आश्रय से अधिष्ठित है, वह आनन्दस्वरूप,
अमृतरूप परमेश्वर सर्वत्र देदीप्यमान है, उसे विवेकी पुरुष विशिष्ट अनुभवों (या ज्ञान) के आधार पर चारों
ओर देखते हैं ॥ ७ ॥
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥
उस परब्रह्म को तत्त्वतः जान लेने पर मनुष्य की हृदय ग्रन्थि खुल जाती है, सारे संशय नष्ट हो जाते
हैं और उसके सम्पूर्ण (प्रारब्ध) कर्म भी क्षीण हो जाते हैं ॥ ८ ॥
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥
प्रकाशमय सूक्ष्म कोश में निर्मल और कलारहित ब्रह्म विद्यमान है। वह शुभ्र और ज्योतिर्मय सम्पूर्ण
पदार्थों का ज्योतिस्वरूप है, आत्मज्ञानी पुरुष उस ब्रह्म को जानते हैं ॥ ९ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥
वहाँ (उस ब्रह्मलोक में) न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा अथवा तारे। वहाँ ये बिजलियाँ भी
प्रकाशित नहीं होतीं, फिर यह अग्नि कहाँ से प्रकाशित हो सकता है? उस एक (ब्रह्म) के ही प्रकाशित
होने पर सब कुछ प्रकाशित होता है, उसका ही प्रकाश इन सबमें चमकता है ॥ १० ॥
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं
विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥
वह ब्रह्म अमृतरूप ज्ञान ही है, ब्रह्म ही आगे और वही पीछे है, ब्रह्म ही बायीं और दायीं ओर है तथा
ब्रह्म ही नीचे और ऊपर विस्तृत है। यह सम्पूर्ण जगत् सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है ॥ ११ ॥