१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in contextमुण्डक २ खण्ड २ मन्त्र ५ ३६१
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽ स्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
उस पुरुष से ही समस्त समुद्र और सभी पर्वत एवं विभिन्न रूपों वाली नदियाँ उत्पन्न हुई हैं। उसी से
सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस की उत्पत्ति हुई। वही पुरुष सभी प्राणियों में अन्तरात्मा रूप में प्रतिष्ठित है ॥ ९ ॥
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्।
एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽ विद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥
हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण जगत्, कर्म और तप सभी परब्रह्म रूप है। वह परम तत्त्व अमृतरूप है।
जो पुरुष उस ब्रह्म को सभी प्राणियों की हृदय गुहा में अधिष्ठित जानता है, वह इस जगत् में अविद्या
ग्रन्थि को खोल देता है ॥ १० ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
आविःसंनिहितं गुहाचरन्नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणन्निमिषच्च
यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥
यह (ब्रह्म) प्रकाशमान, सबमें व्याप्त, हृदय गुहा में विचरणशील तथा महान् पद वाला है। इस ब्रह्म
में चलने वाले, श्वास लेने वाले, पलक झपकने वाले सब प्राणी समाविष्ट होते हैं। जो सत्- असत् रूप,
वरणीय, वरिष्ठ और जीवात्माओं की बुद्धि से परे है, उस ब्रह्म को जानो ॥ १ ॥
यदर्चिमद्यदणुभ्योऽ णु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च।
तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥
जो देदीप्यमान है, जो अणु से भी अतिसूक्ष्म अणु है तथा जिसमें सम्पूर्ण लोक और उनके निवासी
स्थित हैं, वही यह अविनाशी ब्रह्म है, वही प्राण है, वही वाणी और वही मन भी है। वही सत्यरूपं और
अमृतरूप है। हे सोम्य ! मनन द्वारा उसका वेधन करना चाहिए, अतः उसका वेधन करें ॥ २ ॥
धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं संधयीत।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥
उपनिषद् रूप महाअस्त्र धनुष लेकर उस पर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाएँ और उसे
खींचकर भावों से भरे चित्त से उस अविनाशी ब्रह्म का लक्ष्यवेधन करें ॥ ३ ॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥
प्रणव ॐकार धनुष है, अन्तरात्मा बाण है, ब्रह्म उसका लक्ष्यवेध माना गया है। उसे आलस्य-प्रमाद
रहित मनुष्य ही वेध सकता है। बाण से लक्ष्य वेधकर एकाग्रतापूर्वक उसमें तन्मय हो जाना चाहिए ॥ ४ ॥
यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः।
तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥
जिस विराट् पुरुष में पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक तथा सम्पूर्ण प्राणों के साथ मन अधिष्ठित है, उस