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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 363 of 505

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Page 363

मन्त्र १२ ३६३
स्वप्न स्थान वाला तेजस् श्रेष्ठ होने और द्विभाव में रहने से ॐकार का द्वितीय चरण है। इस प्रकार का
ज्ञान रखने वाला पुरुष ज्ञान का उत्कर्ष करता हुआ समान भाव में निमग्न रहता है। उसके कुल में ब्रह्म को
न जानने वाला कोई नहीं रहता ॥ १० ॥
[ तेजस् के अन्तर्गत सभी प्रकार के ज्ञान की धाराएँ आती हैं। उसे पाकर व्यक्ति ज्ञान की उच्चतम अवस्था
तक पहुँच जाता है।]
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं
सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥
सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ विश्व का मापक (विश्व की परिसीमा) और प्रलय करने वाला होने से ॐ
कार का तृतीय चरण है। इस प्रकार का ज्ञान रखने वाला ज्ञानी सम्पूर्ण विश्व का यथार्थ स्वरूप जानता हुआ
इन सबको स्वयं में लय करने वाला होता है ॥ ११ ॥
[ प्राज्ञ कारणसत्ता चेतना का ज्ञाता होता है। उस स्थिति में एक ही चेतन सर्वत्र सक्रिय दिखाई देता है। सभी
को बीजरूप में स्वयं में अनुभव किया जा सकता है।]
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्या-
त्मनात्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रा रहित ॐकार क्रिया से रहित है। जगत् के प्रपंचों का शमन करने वाला, कल्याणकारी एवं
अद्वैत रूप है, यही ब्रह्म का चतुर्थ चरण है। जो इस प्रकार का ज्ञान रखता है, वह आत्मज्ञानी ज्ञान के द्वारा
आत्मा को परब्रह्म में प्रविष्ट कराता है ॥ १२ ॥
[ इस चरण में साधक निर्विकल्पक-अद्वैत बोध में पहुँच जाता है।]
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा....। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ....... इति शान्तिः ॥
॥ इति माण्डूक्योपनिषत्समाप्ता ॥