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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 362 of 505

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Page 362

३६२ माण्डूक्योपनिषद्
यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान
एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५॥
जिस अवस्था में प्रसुप्त मनुष्य किसी भोग की कामना नहीं करता और न ही स्वप्न देखता है, ऐसी
सुषुप्तावस्था में जो एकाग्र वृत्ति वाला, प्रकृष्ट ज्ञान स्वरूप और आनन्द रूप ही है एवं जो एकमात्र आनन्द
का ही भोक्ता है, जिसका मुख तेजोमय चैतन्य रूप है, वह 'प्राज्ञ' ही ब्रह्म का तृतीय चरण है ॥ ५ ॥
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥
वह ब्रह्म ही सबका ईश्वर है, वह सर्वज्ञ अन्तर्यामी और सम्पूर्ण जगत् का कारण भूत है। वही सब
भूतों की उत्पत्ति, स्थिति तथा विनाश का कारण है ॥ ६ ॥
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य-
वहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७॥
जो अन्तः अथवा बाह्य प्रज्ञा वाला नहीं है, जो दोनों ओर की प्रज्ञा वाला नहीं है, जो प्रकृष्ट ज्ञानपुञ्ज
नहीं है, न ज्ञान रूप है, न अज्ञान ही है, जो ज्ञानेन्द्रियगम्य नहीं है, जो कर्मेन्द्रियगम्य भी नहीं है, जो क्रिया
रहित है, जो प्रतीकों से भिन्न है, जो चिन्तन की सीमा से परे तथा कथन की सीमा से भी परे है, जो एकमात्र
अनुभवगम्य है, जो सम्पूर्ण प्रपञ्चों का लय स्थान है, जो शान्तस्वरूप, कल्याणरूप और अद्वैतरूप है,
वही ब्रह्म का चतुर्थ चरण है, वही आत्मा (या परमात्मा) है, वही जानने योग्य है ॥ ७ ॥
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार
इति ॥ ८ ॥
वह (ब्रह्म) और यह (आत्मा) अक्षर ॐकार रूप ही है । यह ॐकार मात्राओं में सन्निहित है।
इसकी मात्राएँ ही इसके चरण हैं और इसके चरण ही इसकी मात्राएँ हैं। ये मात्राएँ अकार, उकार और
मकार हैं ॥ ८ ॥
[ इस मंत्र में वर्णित ब्रह्म या आत्मा की मात्राएँ अनेक अर्थों में प्रकट होती हैं, ॐ में तीन मात्राएँ - अ, उ, म्
हैं। विश्व त्रि आयामी (थ्री डाइमेंशनल) है। सापेक्षवाद (थ्योरी आफ रिलेटिविटी) के अनुसार समय (टाइम),
आयतन (स्पेस) तथा भार (मांस) यह तीन आयाम हैं। समय में भी भूत, वर्तमान एवं भविष्यत् तीन मात्राएँ हैं।
आयतन में लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई यह तीन आयाम हैं। गुण रूप में भी सत्, रज, तम हैं। इस प्रकार यह ब्रह्म
तीन मात्राओं में व्यक्त है, यह कथन प्रमाणित होता है।]
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽ कारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वा आप्नोति ह वै
सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९॥
जाग्रत् स्थान वाला वैश्वानर व्याप्त होने और आदि तत्त्व होने के कारण ॐकार का प्रथम चरण है। इस
प्रकार का ज्ञान रखने वाला ज्ञानी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करता हुआ सबमें वरिष्ठता पाता है ॥९॥
[ सारे कौशल तथा स्थूल पुरुषार्थ वैश्वानर के अन्तर्गत आते हैं। उसे पाकर सब प्रकार की कामनाएँ पूर्ण
होती हैं।]
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसंततिं
समानश्च भवति नास्याऽब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १०॥