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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 359 of 505

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Page 359

मन्त्र १५ ३५९
सभी जीव (कुमार) इस माया रूपी गौ के पय का दोहन करते हैं; परन्तु वह परम पुरुष इस माया
के विषयों से भिन्न और अविज्ञात है, वह स्वयं स्वच्छन्द रहकर, सभी प्राणियों को वश में रखकर अकेला
ही (सम्पूर्ण प्राणियों में-आत्म रूप में) माया का पयःपान (निर्लिप्त रहकर) करता है ॥ ६ ॥
ध्यानक्रियाभ्यां भगवान्भुङ्क्तेऽसौ प्रसहद्भिभूः ।
सर्वसाधारणीं दोग्ध्रीं पीयमानां तु यज्वभिः ॥ ७ ॥
सर्व साधारण द्वारा दुही जाती और याज्ञिकों द्वारा यजन की जाती हुई इस माया रूपी गौ का वह
भगवान् (ऐश्वर्यशाली) ध्यान (चिन्तन) और क्रिया (यौगिक क्रिया) द्वारा उपभोग करता है और उसे
अत्यन्त व्यापक बनाता जाता है ॥ ७ ॥
पश्यन्त्यस्यां महात्मानः सुवर्णं पिप्पलाशनम् ।
उदासीनं ध्रुवं हंसं स्नातकाध्वर्यवो जगुः ॥ ८ ॥
महात्मा पुरुष सु-रूप (वर्ण) वाले इस जगत् रूप पीपल का फल खाते हैं और इस जगत् की माया में उस
उदासीन परम पुरुष और परमहंस को ही देखते हैं। सभी स्नातक और अध्वर्युगण उसी का गान करते हैं ॥ ८ ॥
शंसन्तमनुशंसन्ति बह्वचाः शास्त्रकोविदाः । रथन्तरं बृहत्साम सप्तवैधैस्तु गीयते ॥
शास्त्रज्ञ जन ऋचाओं के माध्यम से तथा स्तोता जन (स्तुतियों के द्वारा) उसी परम पुरुष की स्तुति
करते हैं और उसी के लिए रथन्तर संज्ञक तथा बृहत्साम का सप्तविध गान करते हैं ॥ ९ ॥
मन्त्रोपनिषदं ब्रह्म पदक्रमसमन्वितम् । पठन्ति भार्गवा होते ह्वाथर्वाणो भृगूत्तमाः ॥
मन्त्रों का रहस्य ही ब्रह्म है, उसी को भृगुवंशी श्रेष्ठ 'भार्गव' लोग अथर्ववेदीय पद और क्रम के
अनुसार पढ़ते हैं ॥ १० ॥
सब्रह्मचारिवृत्तिश्च स्तम्भोऽथ फलितस्तथा।
अनड्वाञ्रोहितोच्छिष्टः पश्यन्तो बहुविस्तरम् ॥ ११ ॥
यह परम-पुरुष ब्रह्मचारी वृत्ति वाला, स्तम्भ के सदृश अटल, जगत् रूप में फलयुक्त, जगत् रूप
शकट का वाहक, रजोगुण से रहित, सत्त्वगुण सम्पन्न तथा अत्यन्त व्यापक रूप में दिखाई देने वाला है ॥ ११ ॥
कालः प्राणश्च भगवान्मृत्युः शर्वो महेश्वरः ।
उग्रो भवश्च रुद्रश्च ससुरः सासूरस्तथा ॥ १२ ॥
(षडैश्वर्य सम्पन्न) यह परमपुरुष भगवान् कालरूप, प्राणरूप, मृत्युरूप, शर्वरूप, महेश्वररूप, भवरूप,
रुद्ररूप, उग्ररूप, ससुर (देवयुक्त) तथा सासूर (असुरयुक्त) भी हैं ॥ १२ ॥
प्रजापतिर्विराट् चैव पुरुषः सलिलमेव च । स्तूयते मन्त्रसंस्तुत्यैरथर्वाविदितैर्विभुः ॥
वह परमदेव, प्रजापति, विराट् पुरुष और जलादि देवताओं के रूप में सबके लिए स्तुति करने योग्य
है। अथर्ववेद द्वारा उसके व्यापक रूप का परिज्ञान होता है ॥ १३ ॥
तं षड्विंशक इत्येते सप्तविंशं तथापरे । पुरुषं निर्गुणं सांख्यमथर्वशिरसो विदुः ॥
कोई उसे छब्बीसवाँ तत्त्व कहते हैं, कोई सत्ताईसवाँ तत्त्व कहते हैं। अथर्वशिर (उपनिषद्) के ज्ञाता
उसे निर्गुण सांख्यपुरुष कहते हैं ॥ १४ ॥
चतुर्विंशतिसंख्यातं व्यक्तमव्यक्तमेव च। अद्वैतं द्वैतमित्याहुस्त्रिधा तं पञ्चधा तथा ॥