१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context॥ मान्त्रिकापानषद् ॥
यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। उपनिषदकार कहते हैं कि यह जीवात्मा स्वयं को परमात्मा का
अंश अनुभव करता हुआ भी उसे सहज रूप में देख नहीं पाता। जब देहासक्ति तथा देहाभिमान रूपी अंधकार
छँटता है, तभी उसे देख पाना सम्भव होता है। सामान्य रूप से लोग अविनाशी और अविचल माया का ही ध्यान
करते हैं, उसमें संव्यास हंस रूप उस परमात्मा का अनुभव करना आवश्यक है। उसी को व्यक्त-अव्यक्त, द्वैत-
अद्वैत, सूक्ष्म एवं विराट् रूपों में गाया गया है। सभी मंत्रों का रहस्य वही ब्रह्म है। ऋषि ने उसे ब्रह्मचारी, स्तंभ की
तरह अडिग, संसार रूप में फलित होने वाला तथा विश्व शकट को खींचने वाला कहा है।
॥ शान्ति पाठः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं ...........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य - ईशावास्योपनिषद)
ॐ अष्टपादं शुचिं हंसं त्रिसूत्रमणुमव्ययम्।
त्रिवर्त्मानं तेजसोऽहं सर्वतःपश्यन्न पश्यति ॥ १ ॥
आठ चरणों वाले, पवित्र स्वरूप, हंस (परमात्मा) रूप, त्रिसूत्र (व्यष्टि, समष्टि, तदुभय) रूप,
अतिसूक्ष्म, अव्यय और देदीप्यमान उस परमात्म चेतना को हम (भक्ति, ज्ञान, कर्म) तीन मार्गों से सर्वत्र
अनुभव करते हैं; परन्तु देख नहीं पाते ॥ १ ॥
भूतसंमोहने काले भिन्ने तमसि वैखरे। अन्तः पश्यन्ति सत्त्वस्था निर्गुणं गुणगह्वरे ॥
यद्यपि वह परमात्म चेतना निर्गुण है, तो भी वह गुण रूपी गुहा में समाया हुआ है। सामान्य पुरुष
मोहादि से सम्मोहित अवस्थाजन्य अन्धकार में निमग्न रहते हैं; परन्तु सात्त्विक गुणों में अवस्थित रहने
वाले पुरुष उसे अपने अन्तःकरण में देखते हैं ॥ २ ॥
अशक्यः सोऽन्यथा द्रष्टुं ध्यायमानः कुमारकैः ।
विकारजननीमज्ञामष्टरूपामजां ध्रुवाम् ॥ ३ ॥
अन्य किसी प्रकार से भी ध्यान किया जाए, तो भी उस परमात्म चेतना को अज्ञानी पुरुष नहीं देख
सकते, क्योंकि जगत् में विकारों को जन्म देने वाली, अज्ञान रूप वाली, आठरूप वाली (पंचभूत, मन,
बुद्धि, अहंकार), अजन्मा (प्रकृति रूप) माया का प्रभाव अविचल रहता है ॥ ३ ॥
ध्यायतेऽध्यासिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः । सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठितं जगत् ॥
ध्यान (चिन्तन) के द्वारा ही उस माया के ज्ञान की प्राप्ति होती है। उसी (माया) के द्वारा यह
(आध्यात्मिक-जीव) विस्तार को प्राप्त होता है और (बन्धन से मुक्त होने के लिए ) प्रेरित होता है।
वस्तुतः पुरुष जो (आध्यात्मिक) पुरुषार्थ करता है, उसी पुरुषार्थ के द्वारा यह जगत् अधिष्ठित है ॥ ४ ॥
गौरनाद्यन्तवती सा जनित्री भूतभाविनी ।
सितासिता च रक्ता च सर्वकामदुघा विभोः ॥ ५ ॥
यह गौरूपी माया उत्पत्ति और प्रलय से युक्त है, सबकी सहायिका है, प्राणि-मात्र की पोषिका है।
यह श्वेत, कृष्ण और रक्तवर्णा (सत्, रज, तम) है तथा सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली है ॥ ५ ॥
पिबन्त्येनामविषयामविज्ञातां कुमारकाः ।
एकस्तु पिबते देवः स्वच्छन्दोऽत्र वशानुगः ॥ ६ ॥