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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 505 में से

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पृष्ठ 26

२६ [भूमिका]
प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करने के लिए प्राचीन पाठों
को भी ढूँढ़ने का प्रयास किया गया है। इसके लिए
अड़यार लाइब्रेरी-मद्रास' से प्रकाशित उपनिषदों
के प्रथम संस्करण (१९२०-५०) प्राप्त किये गये
हैं। साथ ही 'भाण्डारकर प्राच्य शोध प्रतिष्ठान, पूना';
सिन्धिया प्राच्य विद्या शोध संस्थान,उज्जैन';
एशियाटिक रिसर्च इंस्टीट्यूट, मुम्बई', 'अखिल
भारतीय संस्कृत परिषद् लखनऊ' तथा 'सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी' से प्राप्त 'हस्त-
लिखित' उपनिषदों का भी सहयोग लिया गया है।
२. प्रत्येक खण्ड में 'मन्त्रानुक्रमणिका' देने का भी
श्रमसाध्य प्रयास किया गया है। अभी तक गीताप्रेस
द्वारा प्रकाशित कुछ गिनी-चुनी उपनिषदों की ही
मन्त्रानुक्रमणिका उपलब्ध थी। अब इस संग्रह की
सभी उपनिषदों की क्रमणी दी जा रही है। इससे
मन्त्रों की ढूँढ़-खोज में सरलता रहेगी।
३. प्रत्येक खण्ड में एक परिशिष्ट जोड़ने का नूतन
प्रयास किया गया है। उपनिषदों में प्रयुक्त पारिभाषिक
शब्दों को व्याख्यायित करके अकारादि क्रम में प्रस्तुत
किया गया है। इससे उपनिषद् विद्या में अभिरुचि
रखने वाले अध्येताओं को बड़ी सहायता मिलेगी।
४. यथाशक्ति उपनिषदों के मूलस्रोतों का पता लगाकर
उनके सन्दर्भ देने का प्रयास भी किया गया है।
इससे यह जानना सुगम होगा कि कौन सी उपनिषद्
संहिता का भाग है, कौन ब्राह्मण का, कौन आरण्यक
का और कौन उनसे भिन्न है।
५. प्रत्येक उपनिषद् के प्रारम्भ में उसका संक्षिप्त
सारांश दे दिया गया है, जिससे उपनिषद् की विषय-
वस्तु पर एक विहंगम दृष्टि पड़ सके, जो पाठकों
के लिए सुविधापूर्ण सिद्ध होगा।
इस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया
माताजी की थाती को उन्हीं की प्रेरणा एवं शक्ति से
आपके समक्ष प्रस्तुत करने में अतीव सन्तोष का
अनुभव हो रहा है। इस ज्ञान यज्ञ में जिस समिधा
और हव्य का उपयोग हुआ है,उसे जुटाने एवं प्रयुक्त
करने में जिनके भी श्रम-साधन सार्थक हुए हैं, उन्हें
निःसन्देह इस ज्ञानयज्ञ की दिव्य सुगन्ध आप्यायित
करके धन्य बना देगी। उनके लिए शब्दों से आभार
प्रदर्शन का कोई मूल्य नहीं। इस प्रयास को और
अधिक उत्कृष्टता प्रदान करने में पाठकों के सुझाव
सदैव प्रार्थनीय रहेंगे,क्योंकि वे ही इसके सच्चे पारखी
हैं। उन्हीं के हाथों में इसे इस आशा के साथ सौंप
रहे हैं कि वे इस ज्ञानामृत का रसास्वादन उसी भाव
से करेंगे, जिस भाव से यह प्रस्तुत किया गया है।
— प्रकाशक