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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 505 में से

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पृष्ठ 23

भूमिका २३
भूख-प्यास की अनुभूति नहीं होती। रोगों की स्थिति
में 'ड्रिप' द्वारा जल एवं पोषण पहुँचाने से भी भूख-
प्यास सताती नहीं है। स्पष्ट है कि भूख-प्यास प्रत्येक
जीवित कोष के साथ संयुक्त है।'
इसी प्रकार पुरुष के गर्भ में पुरुष के परिपाक
की बात भी जेनेटिक साइन्स के माध्यम से इस
प्रकार स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है-
'वर्तमान प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स)
भी वीर्य में गुण सूत्रों (क्रोमोजोमों) तथा जीन्स
(जीवाणुओं) में व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं
का समावेश मानता है। पुरुष के गर्भ में पुरुष का
परिपाक यह उपनिषद् की अपनी दृष्टि है। पदार्थ
विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं, ऋषि उसमें चेतना का
संकल्पयुक्त तंत्र देखते हैं।'
कठोपनिषद् में नाचिकेताग्नि तथा उसकी
'इष्टिकाओं' की अवधारणा जिज्ञासुओं को दी जानी
आवश्यक प्रतीत होती है, उसके लिए १.१.१५ एवं
१.१.१६ की टिप्पणियाँ ध्यान देने योग्य हैं-
वेद में 'इष्टका' शब्द स्थूल ईंटों के अतिरिक्त
'इष्ट' वस्तु के निर्माण में प्रयुक्त सूक्ष्म इकाइयों के
लिए भी प्रयुक्त होता है। यहाँ स्थूल ईंटों के स्थान
पर अग्नि की सूक्ष्म इकाइयों का भाव ही ग्राह्य है।
लौकिक अग्नि में भी विभिन्न इकाइयाँ शामिल होती
हैं। इनमें ताप (कैलोरी), प्रकाश (ल्यूमेन) तथा
रंग (कलर स्पेक्ट्रम) आदि सबको पता है। स्थूल
अग्नि के अनेक अन्य गुण भी उसके घटक (इकाई)
कहे जा सकते हैं। यहाँ स्वर्ग प्रदायिनी दिव्य अग्नि
की इकाइयों तथा उनके चयन की बात कही गयी
है। गुहा-अन्तःकरण में स्थित ऊर्जा की इकाइयाँ
बीज रूप में स्थित दिव्य प्रवृत्तियाँ कही जा सकती
हैं। उन्हीं के जागरण एवं संयोजन से व्यक्ति विद्वान्,
कलाकार, वैज्ञानिक आदि स्तरों तक पहुँच जाता
है। यमदेव ने नचिकेता को स्वर्ग तक पहुँचाने वाली
दिव्य अग्नि-ऊर्जा के लिए आवश्यक सूक्ष्म इकाइयों
तथा उनके संयोजन का रहस्य बतलाया है।'
इसी प्रकार विभिन्न प्रकरणों में जिज्ञासु
अध्येताओं के चिन्तन को दिशा देने वाली टिप्पणियाँ
स्थान-स्थान पर की गयी हैं।
पूर्वाग्रह रहित शोध दृष्टि
ऋषियों के कथन का सही भाव प्राप्त करने
के लिए परम्परा या पूर्वाग्रह से हटकर शोध दृष्टि
का उपयोग आवश्यक हो जाता है। ऋषि निर्देशों
के अनुरूप चलते हुए प्रस्तुत प्रयास में अनेक
विवादास्पद प्रसंगों के युक्ति संगत स्पष्टीकरण
सम्भव हो सके हैं।
उदाहरण के लिए ऊपर वर्णित कठ० १.१.१५
की व्याख्या को लें। यज्ञीय कर्मकाण्ड के अन्तर्गत
ईंटों से वेदिकाओं के निर्माण की बात ध्यान में आ
जाती है। उसी को ध्यान में रखकर पूर्व आचार्यों ने
नाचिकेताग्नि के अन्तर्गत इष्टका चयन सम्बन्धी मन्त्रों
के अर्थ ईंटों से वेदी का निर्माण प्रसंग के संदर्भ में
ही करने का प्रयास किया है; किन्तु इस आधार पर
मंत्रों के भावों और उनकी फलश्रुतियों की सिद्धि
नहीं होती। वेद में भी जिन मन्त्रों के देवता 'इष्टका'
हैं, उन प्रसंगों के अर्थ उन्हें प्रकृति की सूक्ष्म इकाइयों
के रूप में स्वीकार करने से ही स्पष्ट होते हैं। इस
छोटी-सी अवधारणा के साथ मन्त्रों के सहज
स्वाभाविक अर्थ और महत्त्व स्पष्ट होने लगते हैं।
ऐसा ही एक प्रसंग छान्दोग्य उपनिषद् ३.६.४
की टिप्पणी में स्पष्ट किया गया है, वहाँ ऋषि सूर्य
के विभिन्न दिशाओं से उदय और अस्त होने के
प्रभावों का वर्णन कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि
सूर्य का उदय सदैव पृथ्वी के पूर्व से तथा अस्त
पश्चिम दिशा में होता है। मेरु पर्वत के आस-पास
सूर्य के भ्रमण जैसी परिकल्पनाओं के आधार पर
उस प्रसंग का विवेक मान्य समाधान नहीं निकलता।
उक्त प्रकरण के समाधान हेतु उक्त टिप्पणी का भाव
ध्यान देने योग्य है-
छठवें से दसवें खण्ड तक सूर्य के उदय