१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 22, कुल 505 में से
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है, वहीं द्रष्टा के दृष्टिकोण तथा उसके गूढ़ संकेतों
को भी उभारना उचित प्रतीत होता है। ऋषि चेतना
के समर्थ संरक्षण एवं मार्गदर्शन में हुए इस भाषार्थ
में उक्त दोनों पक्षों के निर्वाह का प्रयास किया गया
है। इसके लिए सहज भाषार्थ के आगे-पीछे पूर्वापर
टिप्पणियों का सहारा लेकर विशिष्ट भावों-संकेतों
को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। उसके
लिए वर्तमान समय में जन-मानस में बैठे हुए ज्ञान-
विज्ञान के उदाहरणों के माध्यम से बात समझाने
का प्रयास किया गया है। इससे ऋषि मेधा एवं
जन-जिज्ञासा का सुसंयोग बन सकेगा, ऐसा विश्वास
है। ऋषि की दृष्टि का दिङ्निर्देश हो जाने से विज्ञजन
उस दिशा में अपनी चिन्तन शक्ति का उपयोग
करके समुचित लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
उदाहरणार्थ-सामान्यरूप से उद्गीथ का अर्थ
'ॐकार' या 'साम' मन्त्रों का गायन ही लिया जाता
है; किन्तु छान्दोग्य उपनिषद् १.३.६ में ऋषि ने उसे
त्रिविध प्राण-प्रवाहों के संयोग से साध्य बतलाया
है। इस ओर ध्यान दिलाए बिना जन मान्यता का
परिशोधन कैसे हो सकता है ?
इसी प्रकार छान्दोग्य २.२.१ की टिप्पणी में
स्थूल सामगान के पाँच विभागों या भक्तियों के
माध्यम से प्रकृति के विभिन्न क्रिया-कलापों में
चलने वाली प्राण-प्रक्रिया को ऋषि ने आलंकारिक
ढंग से व्यक्त किया है। यह क्रम अध्याय २ के
द्वितीय से ससम खण्ड तक चलता है। अस्तु, द्वितीय
खण्ड के प्रारम्भ में ही टिप्पणी देकर पाठक को
वह भाव समझने के लिए प्रेरित किया गया है।
इसी उपनिषद् में पहले स्पष्ट किया जा चुका
है कि 'उद्गीथ' ही साम है तथा साम का भाव
'साधु' श्रेष्ठ-सदाशयता पूर्ण होता है। उद्गीथ में
प्राणों को उद्देश्य विशेष के लिए तरंगित-प्रेरित
किया जाता है। श्रेष्ठ सन्दर्भों में प्राणों को तरंगित
करने का क्रम स्थूल-सूक्ष्म प्रकृति में विभिन्न रूपों
में चल रहा है। यज्ञीय गान में साम के पाँच विभाग
या भक्ति कहे गये हैं। ऋषि ने विराट् प्रकृति यज्ञ में
साम के विभिन्न रूपों और उसके विभागों का वर्णन
ससम खण्ड तक किया है। कहा गया है कि प्रकृति
की विभिन्न क्रियाओं में होने वाले प्राणों के साम
प्रयोगों से जो साधक तादात्म्य बिठा लेता है, उस
साधक में उस चक्र को नियन्त्रित करने की क्षमता
आ जाती है।
इसी प्रकार छान्दोग्य ३.५.२ के पूर्व पदार्थ
कणों के अनुशासित प्रक्रिया के पीछे चेतन संकल्प
की उपस्थिति का भाव समझाने की दृष्टि से टिप्पणी
की गयी है-
'पदार्थ विज्ञान आदित्यादि की सक्रियता के
पीछे पदार्थ कणों की सक्रियता को कारण मानता
है। ऋषि कहते हैं कि आदित्यादि की जो दृश्य
प्रक्रिया चल रही है, उसके पीछे चेतन का संकल्प
या आदेश कार्य कर रहा है। कम्प्यूटर सारे कार्य
करता दिखता है; किन्तु कम्प्यूटर वैज्ञानिक जानता
है कि उस सारी प्रक्रिया के मूल में कम्प्यूटर को
दिया गया निर्देश (कमाण्ड) ही उसकी सक्रियता
का मुख्य कारण है। उसी प्रकार ऋषि इस विश्व
ब्रह्माण्ड के पीछे कोई गुप्त निर्देश होना मानते हैं।
उसे ही उन्होंने दृश्य रसों का भी रस कहा है।'
ऐतरेय उपनिषद् में ऋषि ने एक उपाख्यान
से यह समझाया है कि विराट् पुरुष परब्रह्म से
उत्पन्न हुई देव शक्तियाँ मनुष्य शरीर के विभिन्न
अंग-अवयवों में स्थापित हैं। उस क्रम में भूख-
प्यास के लिए कोई स्थान विशेष नहीं बतलाया
गया है। इस रहस्यात्मक उक्ति को आज के शरीर
विज्ञान के क्रम में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है-
'ऋषि स्पष्ट करते हैं कि भूख-प्यास का
कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है। वह विभिन्न अंग-अवयवों
में संव्यास देवशक्तियों के साथ संयुक्त है। शरीर
विज्ञान के वर्तमान शोध निष्कर्ष भी यही कहते हैं।
भूख-प्यास शरीर के प्रत्येक कोश में होती है। जब
तक पेट में अन्न-जल का भण्डार होता है; तब तक