१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ खण्ड ११ मन्त्र ३ १६५
ठीक उसी तरह यह सम्पूर्ण प्रजा भी सत् तत्त्व से प्रकट होकर, यह नहीं समझ पाती कि हम सभी
का सत् तत्त्व से ही आगमन हुआ है। वे सभी यहाँ पर व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, वराह, कीट-पतङ्गे, डाँस
अथवा मच्छर आदि के रूप में प्रकट होते हैं, पुनः अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय
एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
आरुणि ने कहा- हे श्वेतकेतु ! यही अणिमा (अणुरूप) आदि से युक्त आत्मा वाला जगत् है तथा तुम
भी वही हो। उसने अपने पिता से पुनः समझाने की प्रार्थना की। पिता उद्दालक ने 'अच्छा' कहते हुए फिर
से समझाने के लिए कहा ॥ ३ ॥
॥ एकादशः खण्डः ॥
अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्यो मध्येऽभ्या-
हन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो
मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥
(उन्होंने वृक्ष के दृष्टान्त द्वारा पुनः समझाते हुए कहा-) हे सोम्य! यदि किसी विशाल वृक्ष की जड़
में प्रहार करें, तो वह शुष्क न होकर जीवन धारण करते हुए मात्र रस ही स्रवित करेगा। ठीक वैसे ही यदि
उस (वृक्ष) के मध्य भाग पर आघात किया जाए, तब भी वह जीवित रहते हुए रस टपकाता रहेगा और
यदि इसके ऊर्ध्व भाग में प्रहार किया जाए, तब भी वह जीवित रहते हुए रस-स्राव ही करता रहेगा।
(इससे यह सिद्ध होता है कि) यह वृक्षरूपी जीव-आत्मा से परिपूर्ण जल का पान करता हुआ
आनन्दानुभूति करते हुए स्थिर रहता है ॥ १ ॥
अस्य यदेकाꣳ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां
जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥
हे सोम्य! किसी वृक्ष की एक शाखा को जीव परित्याग कर देता है, तो वह शुष्क हो जाती है। यदि
दूसरी शाखा चेतना शून्य हो जाए, तो वह भी शुष्क हो जाती है। यदि तृतीय शाखा को जीव आघात करने
पर छोड़ दे, तो वह भी सूख जाती है और यदि ऐसे ही सम्पूर्ण वृक्ष का ही जीव उत्क्रमण कर जाता है,
तो वह वृक्ष पूर्णरूपेण शुष्क हो जाएगा ॥ २ ॥
जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ
सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति
तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
हे सोम्य! ठीक ऐसे ही यह वृक्षरूपी शरीर जीवन तत्त्व से रहित होते ही नष्ट हो जाता है, किन्तु जीव
का नाश नहीं होता, ऐसे सूक्ष्म भाव से सम्पन्न आत्म-तत्त्व से परिपूर्ण यह जगत् है। यह सत्य है और हे
सोम्य! इसी तरह तुम भी सत्य तत्त्व से पूर्ण हो। श्वेतकेतु ने निवेदन किया- भगवन्! पुनः समझाएँ। पिता
ने 'अच्छा' कहकर उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥