सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 505 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 160

१६० छान्दोग्योपनिषद्
जो कुछ उन्हें रोहित सा (लाल रंग की भाँति) प्रतीत होता है, वह तेज का ही रूप है, जो कुछ शुक्ल
सा प्रतीत होता है, वह जल का रूप है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है, ऐसे सभी रूपों
की जानकारी उन्होंने प्राप्त की ॥ ६ ॥
यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाः समास इति तद्विदांचक्रुर्यथा नु खलु
सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥
इसके अतिरिक्त जो कुछ भी विशेष रूप से स्वीकार नहीं किया गया, वह भी इन तीनों देवों का ही
समूह है, ऐसी जानकारी उन्होंने प्राप्त की। उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! मेरे द्वारा यह जानो, कि किस प्रकार
ये तीनों देवता शरीर एवं इन्द्रियों के संघात रूप पुरुषत्व को प्राप्त करके तीन प्रकार से पृथक्-पृथक् हो जाते
हैं। (यह क्रम अगले खण्ड में स्पष्ट किया गया है।) ॥ ७ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं
योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥
जो अन्न भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है, वह तीन भागों में बँट जाता है। उस अन्न का जो
स्थूलतम पदार्थ है, वह मल रूप में परिवर्तित हो जाता है, जो मध्यम अंश है, वह रसादि से युक्त होकर
मांस के रूप में परिवर्तित हो जाता है और जो अति सूक्ष्म है, वह मन के रूप में परिणत हो जाता है ॥१॥
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं
योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥
जो जल ग्रहण किया जाता है, वह तीन प्रकार से विभक्त हो जाता है। उस (जल) का स्थूल भाग
मूत्र बनता है, मध्यम अंश रक्त के रूप में परिवर्तित हो जाता है और सूक्ष्म अंश प्राण बन जाता है ॥ २ ॥
तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स
मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥
जो तेज ग्रहण किया जाता है, वह भी तीन रूपों में विभाजित हो जाता है। उस (तेज) का स्थूल भाग
हड्डी के रूप में, मध्यम भाग मज्जा के रूप में और अत्यन्त सूक्ष्म अंश वाणी के रूप में परिणत हो जाता है ॥
अन्नमयः हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा
भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥
उद्दालक ने पुनः कहा- 'हे सोम्य ! अन्न का कार्य मन, जल का कार्य प्राण और तेज का कार्य वाणी
है।' श्वेतकेतु ने कहा- 'हे भगवन् ! आप कृपा करके यह बात पुनः स्पष्ट करने की कृपा करें।' तब उद्दालक
ने फिर से मार्गदर्शन देने हेतु उसे आश्वस्त किया ॥ ४ ॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥
श्वेतकेतु के पिता उद्दालक ने पुनः कहा- हे सोम्य ! दही को मथने के पश्चात् उसका जो सूक्ष्म भाग
एकत्रित होता है, वही ऊर्ध्व की ओर गमन करते हुए घृत के रूप में परिणत होता है ॥ १ ॥