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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

अध्याय ५ खण्ड १८ मन्त्र २ १५३
॥ सप्तदशः खण्डः ॥
अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो
राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं प्रतिष्ठितोऽसि
प्रजया च पशुभिश्च ॥ १॥
तदनन्तर राजा अश्वपति ने अरुण के पुत्र उद्दालक से प्रश्न किया कि 'हे गौतम ! आपने किस आत्मा
की उपासना की है'? तब उन ऋषिकुमार ने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं पृथ्वी तत्त्व की उपासना करता
हूँ। राजा ने फिर कहा कि आप जिस तत्त्व की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही प्रतिष्ठा संज्ञक (पगरूप)
वैश्वानर आत्मा है। इसकी कृपा से आपको प्रजा एवं पशुओं की प्राप्ति हुई ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं
वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥
राजा ने कहा कि हे ऋषि कुमार ! आप अन्न का भक्षण करते हैं और प्रिय (इष्ट) का दर्शन करते हैं।
आत्मा रूप वैश्वानर की जो इस भाँति उपासना करता है। वह अन्न का भक्षण और प्रिय का दर्शन करता
है। उसके कुल में ब्रह्मतेज भी रहता है, किन्तु यह आत्मा के चरण ही हैं, इस प्रकार अश्वपति ने कहते हुए
आगे यह भी कहा- यदि आप मेरे समक्ष न आते, तो आपके चरण अत्यन्त निष्क्रिय हो जाते ॥ २॥
॥ अष्टादशः खण्डः ॥
तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वाꣳसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं
प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु
सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥
राजा अश्वपति ने उन सभी ऋषि कुमारों की संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी इस वैश्वानर
स्वरूप आत्मा को पृथक्-पृथक् जानते हुए अन्न खाते हैं। जो भी मनुष्य 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अपने
अहं का हेतु होने वाले इस प्रादेश मात्र (अर्थात् द्यु मूर्धा से लेकर पृथ्वी पाद पर्यन्त) अर्थात् वैश्वानर आत्मा
की उपासना करता है, वह सभी लोकों में, सभी प्राणियों में और सभी आत्माओं में अन्न का भक्षण करता है॥ १ ॥
तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा
संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो
मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥
आगे राजा ने कहा कि इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही द्युलोक है, नेत्र ही सूर्य है, प्राण ही वायु
है, शरीर के बीच का भाग ही आकाश है, बस्ति ही जल है, पृथ्वी ही दोनों पैर हैं, वक्ष ही वेदी है,
रोमकूप ही दर्भ (कुश) हैं, हृदय ही गार्हपत्याग्नि है, मन ही दक्षिणाग्नि है और मुँह ही आहवनीय अग्नि के
समान है, क्योंकि इसी में अन्न का हवन होता है ॥ २ ॥
[ऋषि पुत्र विराट् वैश्वानर के एक-एक अंग की ही उपासना करते थे। किसी एक अंग में स्थित आत्मा
की उपासना से आत्म तत्त्व की अनुभूति तो की जा सकती है, किन्तु उसे वहीं तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
उस विराट् को यदि किसी अंग में सीमित करने की भूल की जायेगी, तो वह विराट् अपने सतत प्रवाह को बनाए
रखने के लिए उस अंग विशेष को क्षति पहुँचा सकता है। इसीलिए राजा अश्वपति द्वारा ऋषि पुत्रों के अंग-विशेषों
की हानि की संभावना व्यक्त की गयी थी।]