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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 505 में से

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पृष्ठ 142

१४२ छान्दोग्योपनिषद्
अथ हैनꣳ श्रोत्रमुवाच यदहꣳ संपदस्मि त्वं तत्संपदसीत्यथ हैन मन उवाच
यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४॥
फिर उस श्रोत्र ने कहा कि 'मैं जो सम्पद्' (श्रेष्ठ सम्पत्ति) हूँ, सो वह सम्पद् आप ही हैं। (इसके
बाद) उस मुख्य प्राण से मन ने कहा- 'मैं जो आयतन (आश्रय) हूँ, वह आश्रय आप ही हैं॥ १४ ॥
न वै वाचो न चक्षूꣳषि न श्रोत्राणि न मनाꣳसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो
ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥
इसलिए लोक में वाक् आदि समस्त इन्द्रियों को न वाणी, न नेत्र, न श्रोत्र और न ही मन; बल्कि
सबको 'प्राण' नाम से ही सम्बोधित करते हैं, क्योंकि ये सभी प्राण ही हैं ॥ १५ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किंचिदिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा
एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किंचनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥
उस मुख्य प्राण ने प्रश्न किया कि मेरा अन्न क्या होगा ? तब वाक् आदि इन्द्रियों ने उत्तर देते हुए कहा-
'कुत्तों और पक्षियों से लेकर सभी प्राणियों का यह जो कुछ भी अन्न है, वह सब तुम्हारा ही है।' 'अन्' यह
प्राण का नाम प्रसिद्ध है। इस प्रकार जानने वाले के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता है ॥ १ ॥
[ प्राणियों में जब तक प्राण रहते हैं, तभी तक उन्हें अन्न की आवश्यकता पड़ती है। प्राण जाते ही अन्न की
माँग समाप्त हो जाती है, इसीलिए सारे अन्न प्राण के लिए ही हैं।]
स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः
पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥
उस मुख्य प्राण ने पुनः प्रश्न किया कि 'मेरा वास (वस्त्र)क्या होगा ?' तब वाक् आदि इन्द्रियों ने
कहा -'जल'। (प्राण को) भोजन करने से पूर्व और पश्चात् आच्छादित करते हैं। (ऐसा करने से) वह
वस्त्र धारण करने वाला और अनग्न होता है ॥ २ ॥
तद्धैतत्सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय
स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥
इस प्राणोपासना पद्धति का विवरण सत्यकाम जाबाल ने व्याघ्रपद के पुत्र गोश्रुति नामक वैयाघ्रपद
को सुनाया- "यदि कोई इस प्राणोपासना को शुष्क ठूँठ से भी कहेगा, तो उसमें भी शाखाएँ उत्पन्न हो
जाएँगी और पत्ते प्रस्फुटित हो आएँगे।"'॥ ३ ॥
[ मन्त्र क्र० १ में प्राण-प्रक्रिया को जानने वाले तथा क्र० ३ में सुनने वाले को असाधारण लाभ प्राप्त होने
की बात कही गयी है। उस काल में जानने का अर्थ उस प्राण-प्रक्रिया को चलाने की क्षमता होना तथा सुनने का
अर्थ उस प्राण-प्रक्रिया को आत्मसात् करना ही रहा होगा। उसी स्थिति में किसी अन्न से पोषण पाने तथा सूखे ठूँठ
में भी नये प्राण का संचार होने की बात सिद्ध होती है।]
अथ यदि महज्जिगमिषेदामावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्याꣳ रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं
दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्रावाज्यस्य हुत्वा मन्थे संपातमवनयेत् ॥ ४ ॥