यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
About this granth
Yatharth Geeta (यथार्थ गीता), "the Gita as it truly is", is Swami Adgadanand's Hindi commentary on the Bhagavad Gita, subtitled Manav Dharmashastra, "the scripture of humanity". Its cover presents it as an eternal explanation of the Gita "after a gap of 5,200 years". The author is a disciple of Paramahamsa Parmanand of the Anusuiya ashram at Chitrakoot, and the commentary draws on the meditative practice of that lineage.
The publisher's note describes him as a monk without academic degrees who regarded writing as a distraction from devotion but undertook this commentary as a divine command. The commentary reads the war of the Gita as an inner struggle, and yajna and karma as stages of meditative practice.
That reading shows in its chapter names, such as "Doubt and Despondency", "Inquiry into Action", "Incentive to Destroy the Foe", "Elucidation of the Yajna", "Yoga of Practice" and "Awakening of the Royal Knowledge", closing with a concluding section called Upasham. The scanned edition, from about 2015, is published by the Shri Paramhans Swami Adgadanandji Ashram Trust.
३१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इसलिये अर्जुन! तेरे लिये इस कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में
कि मैं क्या करूँ, क्या न करूँ?– इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही एक प्रमाण है।
ऐसा जानकर शास्त्रविधि से नियत किये हुए कर्म को ही तुझे करना योग्य है।
अध्याय तीन में भी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ‘नियतं कुरु कर्म त्वं’-
नियत कर्म पर बल दिया और बताया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही वह नियत कर्म
है और वह यज्ञ आराधना की विधि-विशेष का चित्रण है, जो मन का सर्वथा
निरोध करके शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश दिलाता है। यहाँ उन्होंने बताया कि काम,
क्रोध और लोभ नरक के तीन प्रमुख द्वार हैं। इन तीनों को त्याग देने पर ही उस
कर्म का (नियत कर्म का) आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार कहा, जो
परमश्रेय-परमकल्याण दिलानेवाला आचरण है। बाहर सांसारिक कार्यों में जो
जितना व्यस्त है, उतना ही अधिक काम, क्रोध और लोभ उसके पास सजा-
सजाया मिलता है। कर्म कोई ऐसी वस्तु है कि काम, क्रोध और लोभ को त्याग
देने पर ही उसमें प्रवेश मिलता है, कर्म आचरण में ढल पाता है। जो उस विधि
को त्यागकर अपनी इच्छा से आचरण करता है, उसके लिये सुख, सिद्धि
अथवा परमगति कुछ भी नहीं है। अब कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में
शास्त्र ही एकमात्र प्रमाण है। अतः शास्त्रविधि के ही अनुसार तुझे कर्म करना
उचित है और वह शास्त्र है ‘गीता’।
निष्कर्ष-
इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी सम्पद् का विस्तार
से वर्णन किया। जिसमें ध्यान में स्थिति, सर्वस्व का समर्पण, अन्तःकरण की
शुद्धि, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, स्वरूप को स्मरण दिलानेवाला
अध्ययन, यज्ञ के लिये प्रयत्न, मनसहित इन्द्रियों को तपाना, अक्रोध, चित्त
का शान्त प्रवाहित रहना इत्यादि छब्बीस लक्षण बताये, जो सब-के-सब तो
इष्ट के समीप पहुँचे हुए योग-साधना में प्रवृत्त किसी साधक में सम्भव हैं।
आंशिक रूप से सब में हैं।
तदनन्तर उन्होंने आसुरी सम्पद् में प्रधान चार-छः विकारों का नाम
लिया; जैसे- अभिमान, दम्भ, कठोरता, अज्ञान इत्यादि और अन्त में निर्णय
दिया कि अर्जुन! दैवी सम्पद् तो ‘विमोक्षाय’- पूर्ण निवृत्ति के लिये है,
षोडश अध्याय ३१५
परमपद की प्राप्ति के लिये है और आसुरी सम्पद् बन्धन और अधोगति के
लिये है। अर्जुन! तू शोक न कर; क्योंकि तू दैवी सम्पद् को प्राप्त हुआ है।
ये सम्पदाएँ होती कहाँ हैं? उन्होंने बताया कि इस लोक में मनुष्यों के
स्वभाव दो प्रकार के होते हैं- देवताओं-जैसा और असुरों-जैसा। जब दैवी
सम्पद् का बाहुल्य होता है तो मनुष्य देवताओं-जैसा होता है और जब आसुरी
सम्पद् का बाहुल्य होता है तो मनुष्य असुरों-जैसा है। सृष्टि में बस मनुष्यों की
दो ही जाति हैं; चाहे वह कहीं पैदा हुआ हो, कुछ भी कहलाता हो।
तत्पश्चात् उन्होंने आसुरी स्वभाववाले मनुष्यों के लक्षणों का विस्तार
से उल्लेख किया। आसुरी सम्पद् को प्राप्त पुरुष कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त होना
नहीं जानता और अकर्तव्य कर्म से निवृत्त होना नहीं जानता। वह कर्म में जब
प्रवृत्त ही नहीं हुआ तो न उसमें सत्य होता है, न शुद्धि और न आचरण ही होता
है। उसके विचार में जगत् आश्रयरहित, बिना ईश्वर के अपने आप स्त्री-पुरुष
के संयोग से उत्पन्न हुआ है, अतः केवल भोग भोगने के लिये है। इससे आगे
क्या है?- यह विचार कृष्णकाल में भी था। सदैव रहा है। केवल चार्वाक ने
कहा हो, ऐसी बात नहीं है। जब तक जनमानस में दैवी-आसुरी सम्पद् का
उतार-चढ़ाव है तब तक रहेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं- वे मन्दबुद्धिवाले पुरुष
सबका अहित (कल्याण का नाश) करने के लिये ही जगत् में पैदा होते हैं। वे
कहते हैं- मेरे द्वारा यह शत्रु मारा गया, उसे मारूँगा। इस प्रकार अर्जुन ! काम-
क्रोध के आश्रित वे पुरुष शत्रुओं को नहीं मारते बल्कि अपने और दूसरों के
शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं। तो क्या अर्जुन ने प्रण करके
जयद्रथादि को मारा? यदि मारता है तो आसुरी सम्पद्वाला है, उन परमात्मा से
द्वेष करनेवाला है; जबकि अर्जुन को श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि तू दैवी सम्पद्
को प्राप्त हुआ है, शोक मत कर। यहाँ भी स्पष्ट हुआ कि ईश्वर का निवास
सबके हृदय-देश में है। स्मरण रखना चाहिये कि कोई तुम्हें सतत देख रहा है।
अतः सदैव शास्त्रनिर्दिष्ट क्रिया का ही आचरण करना चाहिये अन्यथा दण्ड
प्रस्तुत है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पुनः कहा कि आसुरी स्वभाववाले क्रूर मनुष्यों को
मैं बारम्बार नरक में गिराता हूँ। नरक का स्वरूप क्या है? तो बताया, बारम्बार
३१६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
नीच-अधम योनियों में गिरना एक दूसरे का पर्याय है। यही नरक का स्वरूप
है। काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन मूल द्वार हैं। इन तीनों पर ही आसुरी
सम्पद् टिकी हुई है। इन तीनों को त्याग देने पर ही उस कर्म का आरम्भ होता
है, जिसे मैंने बार-बार बताया है। सिद्ध है कि कर्म कोई ऐसी वस्तु है, जिसका
आरम्भ काम, क्रोध और लोभ को त्याग देने पर ही होता है।
सांसारिक कार्यों में, मर्यादित ढंग से सामाजिक व्यवस्थाओं का निर्वाह
करने में भी जो जितने व्यस्त हैं काम, क्रोध और लोभ उनके पास उतने
अधिक सजे-सजाये मिलते हैं। वस्तुतः इन तीनों को त्याग देने पर ही परम में
प्रवेश दिलानेवाले निर्धारित कर्म में प्रवेश मिलता है। इसलिये मैं क्या करूँ,
क्या न करूँ? - इस कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है।
कौन-सा शास्त्र? यही गीताशास्त्र; 'किमन्यै शास्त्रविस्तरैः।' इसलिये इस
शास्त्र द्वारा निर्धारित किये हुए कर्म-विशेष (यज्ञार्थ कर्म) को ही तू कर।
इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी दोनों सम्पदाओं
का विस्तार से वर्णन किया। उनका स्थान मानव-हृदय बताया। उनका फल
बताया। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'दैवासुरसम्पद्विभागयोगो' नाम
षोडशोऽध्यायः॥१६॥
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'दैवासुर सम्पद् विभाग योग'
नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थ गीता' भाष्ये 'दैवासुरसम्पद्विभागयोगो'
नाम षोडशोऽध्यायः॥१६॥
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'दैवासुर सम्पद् विभाग योग'
नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
सप्तदशोऽध्यायः ॐ तत्सत् व श्रद्धात्रय विभाग योग
॥ ॐ श्री परमात्मने नमः॥
॥अथ सप्तदशोऽध्यायः॥
अध्याय सोलह के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि काम,
क्रोध और लोभ के त्यागने पर ही कर्म आरम्भ होता है, जिसे मैंने बार-बार
कहा है। नियत कर्म को बिना किये न सुख, न सिद्धि और न परमगति ही
मिलती है। इसलिये अब तुम्हारे लिये कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की व्यवस्था में
कि क्या करूँ, क्या न करूँ?- इस सम्बन्ध में शास्त्र ही प्रमाण है। कोई अन्य
शास्त्र नहीं; बल्कि 'इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्।' (१५/२०) गीता स्वयं
शास्त्र है। अन्य शास्त्र भी हैं; किन्तु यहाँ इसी गीताशास्त्र पर दृष्टि रखें, दूसरा न
ढूँढ़ने लगें। दूसरी जगह ढूँढ़ेंगे तो यह क्रमबद्धता नहीं मिलेगी, अतः भटक
जायेंगे।
इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया कि भगवन्! जो लोग शास्त्रविधि को
त्यागकर पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर 'यजन्ते'- यजन करते हैं, उनकी गति
कैसी है? सात्त्विकी है, राजसी अथवा तामसी है? क्योंकि पीछे अर्जुन ने सुना
था कि सात्त्विक, राजस अथवा तामस, जब तक गुण विद्यमान हैं, किसी-न-
किसी योनि के ही कारण होते हैं। इसलिये प्रस्तुत अध्याय के आरम्भ में ही
उसने प्रश्न रखा-
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥१॥
हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर श्रद्धासहित यजन करते हैं,
उनकी गति कौन-सी है? सात्त्विकी है, राजसी है अथवा तामसी है? यजन में
देवता, यक्ष, भूत इत्यादि सभी आ जाते हैं।
३१८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।।
अध्याय दो में योगेश्वर ने बताया कि- अर्जुन! इस योग में निर्धारित
क्रिया एक ही है। अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये
वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उसे
व्यक्त भी करते हैं। उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ती है, अर्जुन!
उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि कुछ पाते हैं। ठीक इसी की पुनरावृत्ति
यहाँ पर भी है कि जो ‘शास्त्रविधिमुत्सृज्य’– शास्त्रविधि को त्यागकर भजते
हैं, उनकी श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है।
इस पर श्रीकृष्ण ने कहा- मनुष्य की आदत से उत्पन्न हुई वह श्रद्धा
सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी- ऐसे तीन प्रकार की होती है, उसे तू मुझसे
सुन। मनुष्य के हृदय में यह श्रद्धा अविरल है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके चित्त की वृत्तियों के अनुरूप
होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है। इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह
स्वयं भी वही है। प्रायः लोग पूछते हैं- मैं कौन हूँ? कोई कहता है- मैं तो
आत्मा हूँ। किन्तु नहीं, यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसी श्रद्धा, जैसी
वृत्ति वैसा पुरुष।
गीता योग-दर्शन है। महर्षि पतंजलि भी योगी थे। उनका योग-दर्शन है।
योग है क्या? उन्होंने बताया- ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।’ ( १/२ ) चित्त की
वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना योग है। किसी ने परिश्रम करके रोक ही लिया,
तो लाभ क्या है? ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।’ ( १/३ )- उस समय यह
द्रष्टा जीवात्मा अपने ही शाश्वत स्वरूप में स्थित हो जाता है। क्या स्थित
सप्तदश अध्याय ३१९
होने से पूर्व यह मलिन था? पतंजलि कहते हैं- ‘वृत्तिसारूप्यमितरत्र।’
(१/४)– दूसरे समय में जैसा वृत्ति का रूप है, वैसा ही वह द्रष्टा है। यहाँ
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं– यह पुरुष श्रद्धामय है, श्रद्धा से ओतप्रोत, कहीं-
न-कहीं श्रद्धा अवश्य होगी और जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।
जैसी वृत्ति, वैसा पुरुष। अब तीनों श्रद्धाओं का विभाजन करते हैं–
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥
उनमें से सात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और
राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य तामस पुरुष प्रेत और भूतों को पूजते हैं। वे
पूजन में अथक परिश्रम भी करते हैं।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥
वे मनुष्य शास्त्रविधि से रहित घोर कल्पित (कल्पित क्रियाएँ रचकर)
तप तपते हैं। दम्भ और अहंकार से युक्त, कामना और आसक्ति के बल से
बँधे हुए–
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥
वे शरीररूप से स्थित भूतसमुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ
अन्तर्यामी को भी कृश करनेवाले हैं अर्थात् दुर्बल करनेवाले हैं। आत्मा प्रकृति
के दरारों में पड़कर विकारों से दुर्बल और यज्ञ-साधनों से सबल होती है। उन
अज्ञानियों (अचेतों) को निश्चय ही तू असुर जान अर्थात् वे सब-के-सब
असुर हैं। प्रश्न पूरा हुआ।
शास्त्रविधि को त्यागकर भजनेवाले सात्त्विक पुरुष देवताओं को, राजस
पुरुष यक्ष-राक्षसों को और तामस पुरुष भूत-प्रेतों को पूजते हैं। केवल पूजते
ही नहीं, घोर तप तपते हैं; किन्तु अर्जुन! शरीररूप से भूतों को और अन्तर्यामी
३२० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
रूप से स्थित मुझ परमात्मा को दुर्बल करनेवाले हैं, मुझसे दूरी पैदा करते हैं
न कि भजते हैं। उनको तू असुर जान अर्थात् देवताओं को पूजनेवाले भी असुर
ही हैं। इससे अधिक कोई क्या कहेगा? अतः जिसके ये सभी अंशमात्र हैं, उन
मूल एक परमात्मा का भजन करें। इसी पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बारम्बार बल
दिया है।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु।।७।।
अर्जुन! जैसे श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही सबको अपनी-
अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन भी तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही
यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके भेद को तू मुझसे
सुन। पहले प्रस्तुत है आहार-
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः।।८।।
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ानेवाले; रसयुक्त,
चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभाव से ही हृदय को प्रिय लगनेवाले
भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार, स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला,
बल, आरोग्य, बुद्धि और आयु बढ़ानेवाला भोज्य पदार्थ ही सात्त्विक है। जो
भोज्य पदार्थ सात्त्विक है, वही सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होता है। इससे स्पष्ट
हो जाता है कि कोई भी खाद्य वस्तु सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी नहीं
होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी हुआ करता है। न दूध
सात्त्विक है, न प्याज राजसी और न लहसुन तामसी है।
जहाँ तक बल, बुद्धि, आरोग्य और हृदय को प्रिय लगने का प्रश्न है, तो
विश्वभर में मनुष्यों को अपनी-अपनी प्रकृति, वातावरण और परिस्थितियों के
अनुकूल विभिन्न खाद्य सामग्रियाँ प्रिय होती हैं, जैसे- बंगालियों तथा मद्रासियों
को चावल प्रिय होता है और पंजाबियों को रोटी। एक ओर तो अरबवासियों
सप्तदश अध्याय ३२१
को दुम्बा, चीनियों को मेढक, तो दूसरी ओर ध्रुव-जैसे ठंडे प्रदेशों में मांस
बिना गुजारा नहीं है। रूस और मंगोलिया के आदिवासी खाद्य में घोड़े इस्तेमाल
करते हैं, यूरोपवासी गाय तथा सुअर दोनों खाते हैं; फिर भी विद्या, बुद्धि-
विकास तथा उन्नति में अमेरिका और यूरोपवासी प्रथम श्रेणी में गिने जा रहे हैं।
गीता के अनुसार रसयुक्त, चिकना और स्थिर रहनेवाला भोज्य पदार्थ
सात्त्विक है। लम्बी आयु, अनुकूल, बल-बुद्धि बढ़ानेवाला, आरोग्यवर्द्धक
पदार्थ सात्त्विक है। स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला भोज्य पदार्थ सात्त्विक
है। अतः कहीं किसी खाद्य पदार्थ को घटाना-बढ़ाना नहीं है। परिस्थिति,
परिवेश तथा देशकाल के अनुसार जो भोज्य वस्तु स्वभाव से प्रिय लगे और
जीवनी शक्ति प्रदान करे, वही सात्त्विकी है। वस्तु सात्त्विकी, राजसी या तामसी
नहीं होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी होता है।
इसी अनुकूलन के लिये जो व्यक्ति घर-परिवार त्यागकर केवल ईश्वर-
आराधन में लिप्त हैं, संन्यास आश्रम में हैं, उनके लिये मांस-मदिरा त्याज्य है;
क्योंकि अनुभव से देखा गया है कि ये पदार्थ आध्यात्मिक मार्ग के विपरीत
मनोभाव उत्पन्न करते हैं, अतः इनसे साधन-पथ से भ्रष्ट होने की अधिक
सम्भावना है। जो एकान्त-देश का सेवन करनेवाले विरक्त हैं, उनके लिये
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अध्याय छः में आहार के लिये एक नियम दिया कि
'युक्ताहार विहारस्य' इसी को ध्यान में रखकर आचरण करना चाहिये। जो
भजन में सहायक है उतना (वही) आहार ग्रहण करना चाहिये।
कट्वम्ललवणात्युष्णातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥
कड़वे, खट्टे, अधिक नमकीन, अत्यन्त गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक
और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार राजस पुरुष को प्रिय
होते हैं।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥
३२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जो भोजन देर का बना हुआ है, 'गतरसं'– रसरहित, दुर्गन्धयुक्त,
बासी, उच्छिष्ट (जूठा) और अपवित्र भी है, वह तामस पुरुष को प्रिय होता है।
प्रश्न पूरा हुआ। अब प्रस्तुत है 'यज्ञ'–
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥
जो यज्ञ 'विधिदृष्टः'– शास्त्रविधि से निर्धारित किया गया है (जैसा
पीछे अध्याय ३ में यज्ञ का नाम लिया, अध्याय ४ में यज्ञ का स्वरूप बताया
कि बहुत से योगी प्राण को अपान में, अपान को प्राण में हवन करते हैं। प्राण–
अपान की गति निरोध कर प्राणों की गति स्थिर कर लेते हैं, संयमाग्नि में हवन
करते हैं। इस प्रकार यज्ञ के चौदह सोपान बताये, जो सब-के-सब ब्रह्म तक
की दूरी तय करा देनेवाली एक ही क्रिया की ऊँची–नीची अवस्थाएँ हैं। संक्षेप
में यज्ञ चिन्तन की प्रक्रिया का चित्रण है, जिसका परिणाम सनातन ब्रह्म में
प्रवेश है। जिसका विधान इस शास्त्र में किया गया है।) उसी शास्त्र-विधान पर
पुनः बल देते हैं कि अर्जुन ! शास्त्रविधि से नियत किये हुए, जिसे करना ही
कर्त्तव्य है तथा जो मन का निरोध करनेवाला है, जो फल को न चाहनेवाले
पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥
हे अर्जुन ! जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिये ही हो या फल को उद्देश्य
बनाकर किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जान। यह कर्त्ता यज्ञ की विधि जानता
है; किन्तु दम्भाचरण या फल को उद्देश्य बनाकर करता है कि अमुक वस्तु
मिलेगी तथा लोग देखें कि यज्ञ करता है– प्रशंसा करेंगे, ऐसा यज्ञकर्त्ता वस्तुतः
राजसी है। अब तामस यज्ञ का स्वरूप बताते हैं–
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥
जो यज्ञ शास्त्रविधि से रहित है, जो अन्न (परमात्मा) की सृष्टि कर
सप्तदश अध्याय ३२३
सकने में असमर्थ है, मन के अन्तराल में निरुद्ध करने की क्षमता से रहित है,
दक्षिणा अर्थात् सर्वस्व के समर्पण से रहित है तथा जो श्रद्धारहित है, ऐसा यज्ञ
तामस यज्ञ कहा जाता है। ऐसा पुरुष वास्तविक यज्ञ को जानता ही नहीं। अब
प्रस्तुत है तप-
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।१४।।
परमदेव परमात्मा, द्वैत पर जय प्राप्त करनेवाले द्विज, सद्गुरु और
ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा शरीर-सम्बन्धी
तप कहा जाता है। शरीर सदैव वासनाओं की ओर बहकता है, इसे अन्तःकरण
की उपर्युक्त वृत्तियों के अनुरूप तपाना शारीरिक तप है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।।
उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय, हितकारक और सत्य भाषण तथा परमात्मा
में प्रवेश दिलानेवाले शास्त्रों के चिन्तन का अभ्यास, नाम-जप- यह वाणी-
सम्बन्धी तप कहा जाता है। वाणी विषयोन्मुख विचारों को भी व्यक्त करती
रहती है, इसे उस ओर से समेटकर परमसत्य परमात्मा की दिशा में लगाना
वाणी-सम्बन्धी तप है। अब मन-सम्बन्धी तप देखें-
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।।
मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन अर्थात् इष्ट के अतिरिक्त अन्य विषयों
का स्मरण भी न हो, मन का निरोध, अन्तःकरण की सर्वथा पवित्रता- यह
मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों शरीर, वाणी और मन का तप
मिलाकर एक सात्त्विक तप है।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।१७।।
३२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
फल को न चाहते हुए अर्थात् निष्काम कर्म से युक्त पुरुषों द्वारा परम
श्रद्धा से किये हुए उपर्युक्त तीनों तपों को मिलाकर सात्त्विक तप कहते हैं। अब
प्रस्तुत है राजस तप-
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये अथवा केवल पाखण्ड से ही
किया जाता है, वह अनिश्चित एवं चंचल फलवाला तप राजस कहा गया है।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥
जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से; मन, वाणी और शरीर के पीडासहित
अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये बदले की भावना से किया जाता है, वह
तप तामस कहा गया है।
इस प्रकार सात्त्विक तप में शरीर, मन और वाणी को मात्र इष्ट के
अनुरूप ढालना है। राजस तप में तप की क्रिया वही है; किन्तु दम्भमान
सम्मान की इच्छा से तपते हैं। प्रायः महात्मा लोग घर-बार छोड़ने के बाद भी
इस विकार के शिकार हो जाते हैं और तीसरा तामस तप अविधिपूर्वक होता है,
दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के दृष्टिकोण से होता है। अब प्रस्तुत है दान-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥
दान देना ही कर्त्तव्य है- इस भाव से जो दान देश (स्थान), काल
(समयानुकूल) और सत्यपात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार की भावना
से रहित होकर दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥
जो दान क्लेशपूर्वक (जो देते नहीं बनता लेकिन देना पड़ रहा है) तथा
प्रत्युपकार की भावना से कि यह करूँगा तो यह मिलेगा अथवा फल को
सप्तदश अध्याय ३२५
उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।
जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर अयोग्य
देश-काल में अनधिकारियों को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।
'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- "हो, कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो
जाता है।" ठीक इसी प्रकार श्रीकृष्ण का कहना है कि दान देना ही कर्त्तव्य है।
देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार न चाहने की भावना
से उदारता के साथ दिया जानेवाला दान सात्त्विक है। कठिनाई से निकलनेवाला,
बदले में फल की भावना से दिया जानेवाला दान राजस है और बिना सत्कार
के, झिड़कियों के साथ प्रतिकूल देश-काल में कुपात्र को दिया जानेवाला दान
तामस है, लेकिन है दान ही; किन्तु जो देह, गेह इत्यादि सबके ममत्व को
त्यागकर एकमात्र इष्ट पर ही निर्भर है, उसके लिये दान का विधान इससे और
उन्नत है- वह है सर्वस्व का समर्पण, सम्पूर्ण वासनाओं से हटकर मन का
समर्पण; जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा है- 'मय्येव मन आधत्स्व।' अतः दान
नितान्त आवश्यक है। अब प्रस्तुत है ॐ, तत् और सत् का स्वरूप-
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।२३।।
अर्जुन! ॐ, तत् और सत्- ऐसा तीन प्रकार का नाम 'ब्रह्मणः निर्देशः
स्मृतः'- ब्रह्म का निर्देश करता है, स्मृति दिलाता है, संकेत करता है और ब्रह्म
का परिचायक है। उसी से 'पुरा'- पूर्व में (आरम्भ में) ब्राह्मण, वेद और
यज्ञादि रचे गये हैं। अर्थात् ब्राह्मण, यज्ञ और वेद ओम् से पैदा होते हैं। ये
योगजन्य हैं। ओम् के सतत चिन्तन से ही इनकी उत्पत्ति है, और कोई तरीका
नहीं है।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।२४।।
३२६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इसलिये ब्रह्म का कथन करनेवाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत की
हुई यज्ञ, दान और तप-क्रियाएँ निरन्तर ‘ओम्’ इस नाम का उच्चारण करके
ही की जाती हैं, जिससे उस ब्रह्म का स्मरण हो जाय। अब तत् शब्द का प्रयोग
बताते हैं-
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।२५।।
‘तत्’ अर्थात् वह (परमात्मा) ही सर्वत्र है, इस भाव से फल को न
चाहकर शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट नाना प्रकार की यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ परम
कल्याण की इच्छा करनेवाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं। तत् शब्द परमात्मा के
प्रति समर्पणसूचक है। अर्थात् जप तो ओम् का करें तथा यज्ञ, दान और तप
की क्रियाएँ उस पर निर्भर होकर करें। अब सत् के प्रयोग का स्थल बताते हैं-
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।२६।।
और सत्; योगेश्वर ने बताया कि सत् है क्या? गीता के आरम्भ में ही
अर्जुन ने प्रश्न खड़ा किया कि कुलधर्म ही शाश्वत है, सत्य है, तो श्रीकृष्ण ने
कहा- अर्जुन! तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हुआ? सत् वस्तु का तीनों कालों
में कभी अभाव नहीं होता, उसे मिटाया नहीं जा सकता और असत् वस्तु का
तीनों कालों में अस्तित्व नहीं है, उसे रोका नहीं जा सकता। वस्तुतः वह कौन-
सी वस्तु है, जिसका तीनों कालों में अभाव नहीं है? और वह असत् वस्तु है
क्या, जिसका अस्तित्व नहीं है? तो बताया- यह आत्मा ही सत्य है और
भूतादिकों के समस्त शरीर नाशवान् हैं। आत्मा सनातन है, अव्यक्त है, शाश्वत
और अमृतस्वरूप है- यही परमसत्य है।
यहाँ कहते हैं, ‘सत्’ ऐसे परमात्मा का यह नाम ‘सद्भावे’- सत्य के
प्रति भाव में और साधुभाव में प्रयोग किया जाता है और हे पार्थ! जब नियत
कर्म सांगोपांग भली प्रकार होने लगे, तब सत् शब्द का प्रयोग किया जाता है।
सत् का अर्थ यह नहीं है कि यह वस्तुएँ हमारी हैं। जब शरीर ही हमारा नहीं है,
सप्तदश अध्याय ३२७
तो इसके उपभोग में आनेवाली वस्तुएँ हमारी कब हैं। यह सत् नहीं है। सत् का
प्रयोग केवल एक दिशा में किया जाता है- सद्भाव में। आत्मा ही परम सत्य
है- इस सत्य के प्रति भाव हो, उसे साधने के लिये साधुभाव हो और उसकी
प्राप्ति करानेवाला कर्म प्रशस्त ढंग से होने लगे, वहीं सत् शब्द का प्रयोग
किया जाता है। इसी पर योगेश्वर अग्रेतर कहते हैं-
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।२७।।
यज्ञ, तप और दान को करने में जो स्थिति मिलती है, वह भी सत् है-
ऐसा कहा जाता है। 'तदर्थीयम्'- उस परमात्मा की प्राप्ति के लिये किया
हुआ कर्म ही सत् है, ऐसा कहा जाता है। अर्थात् उस परमात्मा की प्राप्तिवाला
कर्म ही सत् है। यज्ञ, दान, तप तो इस कर्म के पूरक हैं। अन्त में निर्णय देते हुए
कहते हैं कि इन सबके लिये श्रद्धा आवश्यक है।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।
हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तपा हुआ
तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है, वह सब असत् है- ऐसा कहा जाता
है। वह न तो इस लोक में और न परलोक में ही लाभदायक है। अतः समर्पण
के साथ श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
निष्कर्ष-
अध्याय के आरम्भ में ही अर्जुन ने प्रश्न किया कि- भगवन्! जो
शास्त्रविधि को त्यागकर और श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते हैं (लोग भूत,
भवानी अन्यान्य पूजते ही रहते हैं) तो उनकी श्रद्धा कैसी है? सात्त्विकी है,
राजसी है अथवा तामसी? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! यह
पुरुष श्रद्धा का स्वरूप (पुतला) है, कहीं-न-कहीं उनकी श्रद्धा होगी ही।
जैसी श्रद्धा वैसा पुरुष, जैसी वृत्ति वैसा पुरुष। उनकी वह श्रद्धा सात्त्विकी,
३२८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
राजसी और तामसी तीन प्रकार की होती है। सात्त्विकी श्रद्धावाले देवताओं
को, राजसी श्रद्धावाले यक्ष (जो यश, शौर्य प्रदान करे), राक्षसों (जो सुरक्षा दे
सके) का पीछा करते हैं और तामसी श्रद्धावाले भूत-प्रेतों को पूजते हैं।
शास्त्रविधि से रहित इन पूजाओं द्वारा ये तीनों प्रकार के श्रद्धालु शरीर में स्थित
भूतसमुदाय अर्थात् अपने संकल्पों और हृदय-देश में स्थित मुझ अन्तर्यामी
को भी कृश करते हैं, न कि पूजते हैं। उन सबको निश्चय ही तू असुर जान
अर्थात् भूत, प्रेत, यक्ष, राक्षस तथा देवताओं को पूजनेवाले असुर हैं।
देवता-प्रसंग को श्रीकृष्ण ने यहाँ तीसरी बार उठाया है। पहले अध्याय
सात में उन्होंने कहा कि- अर्जुन ! कामनाओं ने जिनका ज्ञान हर लिया है, वही
मूढ़बुद्धि अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। दूसरी बार अध्याय नौ में उसी प्रश्न
को दुहराते हुए कहा- जो अन्यान्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी मुझे ही
पूजते हैं; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् शास्त्र में निर्धारित विधि
से भिन्न है, अतः वह नष्ट हो जाता है। यहाँ अध्याय सत्रह में उन्हें आसुरी
स्वभाववाला कहकर सम्बोधित किया। श्रीकृष्ण के शब्दों में एक परमात्मा की
ही पूजा का विधान है।
तदनन्तर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने चार प्रश्न लिये- आहार, यज्ञ, तप और
दान। आहार तीन प्रकार के होते हैं। सात्त्विक पुरुष को तो आरोग्य प्रदान
करनेवाले, स्वाभाविक प्रिय लगनेवाले, स्निग्ध आहार प्रिय होते हैं। राजस
पुरुष को कड़वे, तीक्ष्ण, उष्ण, चटपटे, मसालेदार, रोगवर्द्धक आहार प्रिय होते
हैं। तामस पुरुष को जूठा, बासी और अपवित्र आहार प्रिय होता है।
शास्त्रविधि से निर्दिष्ट यज्ञ (जो आराधना की अन्तःक्रियाएँ हैं) जो मन
का निरोध करता है, फलाकांक्षा से रहित वह यज्ञ सात्त्विक है। दम्भ-प्रदर्शन
तथा फल के लिये किया जानेवाला वही यज्ञ राजस है और शास्त्रविधि से
रहित, मन्त्र, दान तथा बगैर श्रद्धा से किया हुआ यज्ञ तामस है।
परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली सारी योग्यताएँ जिनमें हैं, उन
प्राज्ञ सद्गुरु की अर्चना, सेवा और अन्तःकरण से अहिंसा, ब्रह्मचर्य और
सप्तदश अध्याय ३२९
पवित्रता के अनुरूप शरीर को तपाना शरीर का तप है। सत्य, प्रिय और
हितकर बोलना वाणी का तप है और मन को कर्म में प्रवृत्त रखना, इष्ट के
अतिरिक्त विषयों के चिन्तन में मन को मौन रखना मन-सम्बन्धी तप है। मन,
वाणी और शरीर तीनों मिलाकर इस ओर तपाना सात्त्विक तप है। राजस तप
में कामनाओं के साथ उसी को किया जाता है, जबकि तामस तप शास्त्रविधि
से रहित स्वेच्छाचार है।
कर्त्तव्य मानकर देश, काल और पात्र का विचार करके श्रद्धापूर्वक
दिया गया दान सात्त्विक है। किसी लाभ के लोभ में कठिनाई से दिया जानेवाला
दान राजस है और झिड़ककर कुपात्र को दिया जानेवाला दान तामस है।
ॐ, तत् और सत् का स्वरूप बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि
ये नाम परमात्मा की स्मृति दिलाते हैं। शास्त्रविधि से निर्धारित तप, दान और
यज्ञ आरम्भ करने में ओम् का प्रयोग होता है और पूर्ति में ही ओम् पिण्ड
छोड़ता है। तत् का अर्थ है वह परमात्मा, उसके प्रति समर्पित होकर ही वह
कर्म होता है और जब कर्म धारावाही होने लगे, तब सत् का प्रयोग होता है।
भजन ही सत् है। सत् के प्रति भाव और साधुभाव में ही सत् का प्रयोग किया
जाता हैं। परमात्मा की प्राप्ति करा देनेवाले कर्म यज्ञ, दान और तप के परिणाम
में भी सत् का प्रयोग है और परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाला कर्म निश्चयपूर्वक
सत् है; किन्तु इन सबके साथ श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धा से रहित होकर किया
हुआ कर्म, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप न इस जन्म में लाभकारी है, न
अगले जन्मों में ही। अतः श्रद्धा अपरिहार्य है।
सम्पूर्ण अध्याय में श्रद्धा पर प्रकाश डाला गया और अन्त में ॐ, तत्
और सत् की विशद व्याख्या प्रस्तुत की गयी, जो गीता के श्लोकों में पहली
बार आया है। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘ॐ तत्सत् श्रद्धात्रयविभागयोगो’ नाम
सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।
३३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में 'ॐ तत्सत् श्रद्धात्रय विभाग योग'
नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'ॐ तत्सत्
श्रद्धात्रयविभागयोगो' नाम सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'ॐ तत्सत् श्रद्धात्रय विभाग योग'
नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
अष्टादशोऽध्यायः संन्यास योग
॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥
॥ अथाष्टादशोऽध्यायः ॥
यह गीता का अन्तिम अध्याय है, जिसके पूर्वार्द्ध में योगेश्वर श्रीकृष्ण
द्वारा प्रस्तुत अनेक प्रश्नों का समाधान है तथा उत्तरार्द्ध गीता का उपसंहार है कि
गीता से लाभ क्या है? सत्रहवें अध्याय में आहार, तप, यज्ञ, दान तथा श्रद्धा
का विभागसहित स्वरूप बताया गया, उसी सन्दर्भ में त्याग के प्रकार शेष हैं।
मनुष्य जो कुछ करता है, उसमें कारण कौन है? कौन कराता है? भगवान
कराते हैं या प्रकृति? यह प्रश्न पहले से आरम्भ है, जिस पर इस अध्याय में
पुनः प्रकाश डाला गया। इसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था की चर्चा हो चुकी है। सृष्टि
में व्याप्त उसके स्वरूप का विश्लेषण इस अध्याय में प्रस्तुत है। अन्त में गीता
से मिलनेवाली विभूतियों पर प्रकाश डाला गया है।
गत अध्याय में अनेक प्रकरणों का विभाजन सुनकर अर्जुन ने स्वयं
एक प्रश्न रखा कि त्याग और संन्यास को भी विभागसहित बतायें-
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१॥
अर्जुन बोला- हे महाबाहो! हे हृदय के सर्वस्व! हे केशिनिषूदन! मैं
संन्यास और त्याग के यथार्थ स्वरूप को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।
पूर्ण त्याग संन्यास है, जहाँ संकल्प और संस्कारों का भी समापन है
और इससे पहले साधना की पूर्ति के लिये उत्तरोत्तर आसक्ति का त्याग ही
त्याग है। यहाँ दो प्रश्न हैं कि संन्यास के तत्त्व को जानना चाहता हूँ और दूसरा
है कि त्याग के तत्त्व को जानना चाहता हूँ। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा-
३३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२॥
अर्जुन! कितने ही पण्डितजन काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास कहते
हैं और कितने ही विचार-कुशल पुरुष सम्पूर्ण कर्मफलों के त्याग को त्याग
कहते हैं।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३॥
कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, अतः त्याग
देने योग्य हैं और दूसरे विद्वान् ऐसा कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप त्यागने
योग्य नहीं हैं। इस प्रकार अनेक मत प्रस्तुत करके योगेश्वर अपना भी निश्चित
मत देते हैं-
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४॥
हे अर्जुन! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरुषश्रेष्ठ!
वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥
यज्ञ, दान और तप- ये तीन प्रकार के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, इन्हें
तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप तीनों ही पुरुषों को पवित्र
करने वाले हैं।
श्रीकृष्ण ने चार प्रचलित मतों का उल्लेख किया। पहला- काम्य कर्मों
का त्याग, दूसरा- सम्पूर्ण कर्मफलों का त्याग, तीसरा- दोषयुक्त होने के
कारण सभी कर्मों का त्याग और चौथा मत- यज्ञ, दान और तप त्यागने योग्य
नहीं हैं। उनमें से एक मत में अपनी सहमति प्रकट करते हुए कहा- अर्जुन!
मेरा भी यह निश्चित किया हुआ मत है कि यज्ञ, दान और तपरूप क्रिया
अष्टादश अध्याय ३३३
त्यागने योग्य नहीं है। इससे सिद्ध है कि कृष्णकाल में भी कई मत प्रचलित थे,
जिनमें एक यथार्थ था। उस काल में भी कई मत थे, आज भी हैं। महापुरुष
जब दुनिया में आता है तो कई मत-मतान्तरों में से कल्याणकारी मत को
निकालकर सामने खड़ा कर देता है। प्रत्येक महापुरुष ने यही किया है,
श्रीकृष्ण ने भी यही किया। उन्होंने कोई नया मार्ग नहीं बताया, बल्कि प्रचलित
कई मतों के बीच सत्य को समर्थन देकर उसे स्पष्ट कर दिया।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६॥
योगेश्वर श्रीकृष्ण बल देकर कहते हैं- पार्थ! यज्ञ, दान और तपरूप
कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर अवश्य करना चाहिये। यह मेरा निश्चय
किया हुआ उत्तम मत है। अब अर्जुन के प्रश्न के अनुसार वे त्याग का
विश्लेषण करते हैं-
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥
हे अर्जुन! नियत कर्म (श्रीकृष्ण के शब्दों में नियत कर्म एक ही है, यज्ञ
की प्रक्रिया। इस नियत शब्द को आठ-दस बार योगेश्वर ने कहा। इस पर
बार-बार बल दिया कि कहीं साधक भटककर दूसरा न करने लगे), इस
शास्त्रविधि से निर्धारित कर्म का त्याग करना उचित नहीं है। मोह से उसका
त्याग करना तामस त्याग कहा गया है। सांसारिक विषय-वस्तुओं की आसक्ति
में फँसकर कार्यम् कर्म (कार्यम् कर्म, नियत कर्म एक दूसरे के पूरक हैं) का
त्याग तामसी है। ऐसा पुरुष ‘अधः गच्छति’- कीट-पतंगपर्यन्त अधम योनियों
में जाता है; क्योंकि उसने भजन की प्रवृत्तियों का त्याग कर दिया। अब राजस
त्याग के विषय में बताते हैं-
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥
कर्म को दुःखमय समझकर शारीरिक क्लेश के भय से उसका त्याग
करनेवाला व्यक्ति राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं