यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
About this granth
Yatharth Geeta (यथार्थ गीता), "the Gita as it truly is", is Swami Adgadanand's Hindi commentary on the Bhagavad Gita, subtitled Manav Dharmashastra, "the scripture of humanity". Its cover presents it as an eternal explanation of the Gita "after a gap of 5,200 years". The author is a disciple of Paramahamsa Parmanand of the Anusuiya ashram at Chitrakoot, and the commentary draws on the meditative practice of that lineage.
The publisher's note describes him as a monk without academic degrees who regarded writing as a distraction from devotion but undertook this commentary as a divine command. The commentary reads the war of the Gita as an inner struggle, and yajna and karma as stages of meditative practice.
That reading shows in its chapter names, such as "Doubt and Despondency", "Inquiry into Action", "Incentive to Destroy the Foe", "Elucidation of the Yajna", "Yoga of Practice" and "Awakening of the Royal Knowledge", closing with a concluding section called Upasham. The scanned edition, from about 2015, is published by the Shri Paramhans Swami Adgadanandji Ashram Trust.
२५४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से मैं इस प्रकार देखा जाने
को सुलभ हूँ, जिस प्रकार तूने देखा है। तब क्या आपको देख पाने का कोई
उपाय नहीं है? वे महात्मा कहते हैं, एक उपाय है-
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।।५४।।
हे श्रेष्ठ तपवाले अर्जुन ! अनन्य भक्ति के द्वारा अर्थात् सिवाय मेरे अन्य
किसी देवता का स्मरण न करते हुए, अनन्य श्रद्धा से तो मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष
देखने के लिये, तत्त्व से साक्षात् जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये भी
सुलभ हूँ अर्थात् उनकी प्राप्ति का एकमात्र सुगम माध्यम अनन्य भक्ति है।
अन्त में ज्ञान भी अनन्य भक्ति में परिणत हो जाता है, जैसा कि पीछे अध्याय
सात में द्रष्टव्य है। पीछे उन्होंने कहा कि तेरे सिवाय न कोई देख सका है और
न कोई देख सकेगा, जबकि यहाँ कहते हैं कि अनन्य भक्ति से न केवल मुझे
देखा जा सकता है अपितु साक्षात् जाना और मुझमें प्रवेश भी पाया जा सकता
है, अर्थात् अर्जुन अनन्य भक्त का नाम है, एक अवस्था का नाम है। अनुराग
ही अर्जुन है। अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।५५।।
हे अर्जुन ! जो पुरुष मेरे द्वारा निर्दिष्ट कर्म अर्थात् नियत कर्म यज्ञार्थ कर्म
करता है, ‘मत्परमः’- मेरे परायण होकर करता है, जो मेरा अनन्य भक्त है;
‘सङ्गवर्जितः’- किन्तु संगदोष में रहते हुए वह कर्म नहीं हो सकता, अतः
संगदोष से रहित होकर ‘निर्वैरः सर्वभूतेषु’- सम्पूर्ण भूतप्राणियों में बैरभाव
से रहित है, वह मुझे प्राप्त होता है। तो क्या अर्जुन ने युद्ध किया? प्रण करके
क्या उसने जयद्रथादि को मारा? यदि उन्हें मारता है तो भगवान को न देख
पाता, जबकि अर्जुन ने देखा है। इससे सिद्ध है कि गीता में एक भी श्लोक ऐसा
नहीं है, जो बाह्य मारकाट का समर्थन करता हो। जो निर्दिष्ट कर्म यज्ञ की
प्रक्रिया का आचरण करेगा, जो अनन्य भाव से उनके सिवाय किसी का स्मरण
एकादश अध्याय २५५
तक नहीं करेगा, जो संगदोष से अलग रहेगा तो युद्ध कैसा? जब आपके साथ
कोई है ही नहीं तो आप युद्ध किससे करेंगे? सम्पूर्ण भूतप्राणियों में जो बैरभाव
से रहित है, मन से भी किसी को सताने की कल्पना न करे, वही मुझे प्राप्त
होता है-तो क्या अर्जुन ने लड़ाई ली? कभी नहीं।
वस्तुतः संगदोष से अलग रहकर जब आप अनन्य चिन्तन में लगते
हैं, निर्धारित यज्ञ की क्रिया में प्रवृत्त होते हैं, उस समय परिपंथी राग-द्वेष,
काम-क्रोध इत्यादि दुर्जय शत्रु बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही हैं। उनका पार पाना
ही युद्ध है।
निष्कर्ष-
इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा-भगवन्! आपकी विभूतियों
को मैंने विस्तार से सुना, जिससे मेरा मोह नष्ट हो गया, अज्ञान का शमन हो
गया; किन्तु जैसा आपने बताया कि मैं सर्वत्र हूँ, इसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता
हूँ। यदि मेरे द्वारा देखना सम्भव हो, तो कृपया उसी स्वरूप को दिखाइये।
अर्जुन प्रिय सखा था, अनन्य सेवक था। अतएव योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कोई
प्रतिवाद न कर तुरन्त दिखाना प्रारम्भ किया कि अब मेरे ही अन्दर खड़े
सप्तर्षि और उनसे भी पूर्व होनेवाले ऋषियों को देख, ब्रह्मा और विष्णु को
देख, सर्वत्र फैले मेरे तेज को देख, मेरे ही शरीर में एक स्थान पर खड़े तू
चराचर जगत् को देख; किन्तु अर्जुन आँखें मलता ही रह गया। इसी प्रकार
योगेश्वर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों तक अनवरत दिखाते गये; किन्तु अर्जुन को
कुछ भी दिखायी नहीं पड़ा। सभी विभूतियाँ योगेश्वर में उस समय थीं; किन्तु
अर्जुन को वे सामान्य मनुष्य-जैसे ही दिखायी पड़ रहे थे। तब इस प्रकार
दिखाते-दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण सहसा रुक जाते हैं और कहते हैं- अर्जुन!
इन आँखों से तू मुझे नहीं देख सकता। अपनी बुद्धि से तू मुझे परख नहीं
सकता। लो, अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मुझे देख सकेगा। भगवान
तो सामने खड़े ही थे। अर्जुन ने देखा, वास्तव में देखा। देखने के पश्चात् क्षुद्र
त्रुटियों के लिए क्षमायाचना करने लगा, जो वास्तव में त्रुटियाँ नहीं थीं।
२५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
उदाहरण के लिये; भगवन्! कभी मैंने आपको कृष्ण, यादव और कभी सखा
कह दिया था, इसके लिये आप मुझे क्षमा करें। श्रीकृष्ण ने क्षमा भी किया;
क्योंकि अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार कर वे सौम्य स्वरूप में आ गये, धीरज
बँधाया।
वस्तुतः कृष्ण कहना अपराध नहीं था। वे साँवले थे ही, गोरे कैसे
कहलाते। यदुवंश में जन्म हुआ ही था। श्रीकृष्ण स्वयं भी अपने को सखा
मानते ही थे। वास्तव में प्रत्येक साधक महापुरुष को पहले ऐसा ही समझते हैं।
कुछ उन्हें रूप और आकार से सम्बोधित करते हैं, कुछ उनकी वृत्ति से उन्हें
पुकारते हैं और कुछ उन्हें अपने ही समकक्ष मानते हैं, उनके यथार्थ स्वरूप को
नहीं समझते। उनके अचिन्त्य स्वरूप को अर्जुन ने समझा तो पाया कि ये न तो
काले हैं और न गोरे, न किसी कुल के हैं और न किसी के साथी ही हैं। इनके
समान कोई है ही नहीं, तो सखा कैसा? बराबर कैसा? यह तो अचिन्त्य स्वरूप
हैं। जिसे यह स्वयं दिखा दें, वही इन्हें देख पाता है। अतः अर्जुन ने अपनी
प्रारम्भिक भूलों के लिये क्षमायाचना की।
प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण कहना अपराध है, तो उनका नाम जपा
कैसे जाय? तो जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जपने के लिये स्वयं बल दिया, जपने
की जो विधि बतायी, उसी विधि से आप चिन्तन-स्मरण करें। वह है-
‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।’- ‘ओम्’ अक्षय ब्रह्म का पर्याय
है। ‘ओ अहम् स ओम्’- जो व्याप्त है वह सत्ता मुझमें छिपी है, यही है ओम्
का आशय। आप इसका जप करें और ध्यान मेरा करें। रूप अपना, नाम ओम्
का बताया।
अर्जुन ने प्रार्थना की कि चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिये। श्रीकृष्ण ने उसी
सौम्य स्वरूप को धारण किया। अर्जुन ने कहा- भगवन्! आपके इस सौम्य
मानव स्वरूप को देखकर अब मैं प्रकृतिस्थ हुआ। माँगा था चतुर्भुज रूप,
दिखाया ‘मानुषं रूपं’। वास्तव में शाश्वत में प्रवेशवाला योगी शरीर से यहाँ
बैठा है, बाहर दो हाथों से कार्य करता है और साथ ही अन्तरात्मा से जागृत
होकर जहाँ से भी जो भाविक स्मरण करते हैं, एक साथ सर्वत्र उनके हृदय से
एकादश अध्याय २५७
जागृत होकर प्रेरक के रूप में कार्य करता है। हाथ उसके कार्य का प्रतीक है,
यही चतुर्भुज है।
श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तेरे सिवाय मेरे इस रूप को न कोई देख
सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। तब गीता तो हमारे लिये व्यर्थ है।
किन्तु नहीं, योगेश्वर कहते हैं- एक उपाय है। जो मेरा अनन्य भक्त है, मेरे
सिवाय जो दूसरे किसी का स्मरण न करके निरन्तर मेरा ही चिन्तन करनेवाला
है, उसकी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने को (जैसा तूने देखा है),
तत्त्व से जानने को और प्रवेश करने को भी सुलभ हूँ। अर्थात् अर्जुन अनन्य
भक्त था। भक्ति का परिमार्जित रूप है अनुराग, इष्ट के अनुरूप लगाव।
'मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।' (रामचरितमानस, ७/६१/१)-
अनुरागविहीन पुरुष न कभी पाया है और न पा सकेगा। अनुराग नहीं है तो
कोई लाख योग करे, जप करे, तप करे या दान करे, 'वह' नहीं मिलता। अतः
इष्ट के अनुरूप राग अथवा अनन्य भक्ति नितान्त आवश्यक है।
अन्त में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! मेरे द्वारा निर्दिष्ट कर्म को कर, मेरा
अनन्य भक्त होकर कर, मेरी शरण होकर कर; किन्तु संगदोष से अलग
रहकर। संगदोष में यह कर्म हो ही नहीं सकता। अतः संगदोष इस कर्म के
सम्पादित होने में बाधक है। जो बैरभाव से रहित है, वही मुझे प्राप्त करता है।
जब संगदोष नहीं है, जहाँ हमें छोड़कर दूसरा कोई है ही नहीं, बैर का
मानसिक संकल्प भी नहीं है तो युद्ध कैसा? बाहर दुनिया में लड़ाई-झगड़े होते
रहते हैं; किन्तु विजय जीतनेवालों को भी नहीं मिलती। दुर्जय संसाररूपी शत्रु
को असंगतारूपी शस्त्र से काटकर परम में प्रवेश पा जाना ही वास्तविक विजय
है, जिसके पीछे हार नहीं है।
इस अध्याय में पहले तो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दृष्टि प्रदान की,
फिर अपने विश्वरूप का दर्शन कराया। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'विश्वरूपदर्शनयोगो' नामैकादशोऽध्यायः।।११।।
२५८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'विश्वरूपदर्शन योग' नामक ग्यारहवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'विश्वरूपदर्शनयोगो'
नामैकादशोऽध्यायः।।११।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'विश्वरूपदर्शन योग' नामक ग्यारहवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
द्वादशोऽध्यायः भक्तियोग
।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।।
।। अथ द्वादशोऽध्यायः ।।
एकादश अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने बार-बार बल दिया कि-
अर्जुन! मेरा यह स्वरूप जिसे तूने देखा, तेरे सिवाय न पहले कभी देखा गया
है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। मैं न तप से, न यज्ञ से और न दान से
ही देखे जाने को सुलभ हूँ; किन्तु अनन्य भक्ति के द्वारा अर्थात् मेरे अतिरिक्त
अन्यत्र कहीं श्रद्धा बिखरने न पाये, निरन्तर तैलधारावत् मेरे चिन्तन के द्वारा
ठीक इसी प्रकार जैसा तूने देखा, मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये, तत्त्व से साक्षात्
जानने के लिये और प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ। अतः अर्जुन! निरन्तर
मेरा ही चिन्तन कर, भक्त बन। अर्जुन! तू मेरे ही द्वारा निर्धारित किये गये कर्म
को कर। ‘मत्परमः’- अपितु मेरे परायण होकर कर। अनन्य भक्ति ही उनकी
प्राप्ति का माध्यम है। इस पर अर्जुन का प्रश्न स्वाभाविक है कि जो अव्यक्त
अक्षर की उपासना करते हैं और जो सगुण आपकी उपासना करते हैं, इन दोनों
में श्रेष्ठ कौन है?
यहाँ इस प्रश्न को अर्जुन ने तीसरी बार उठाया है। अध्याय तीन में उसने
कहा- भगवन्! यदि निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा सांख्ययोग आपको श्रेष्ठ
मान्य है, तो आप मुझे भयंकर कर्मों में क्यों लगाते हैं? इस पर श्रीकृष्ण ने
कहा- अर्जुन! निष्काम कर्ममार्ग अच्छा लगे चाहे ज्ञानमार्ग, दोनों ही दृष्टियों से
कर्म तो करना ही पड़ेगा। इतने पर भी जो इन्द्रियों को हठ से रोककर मन से
विषयों का स्मरण करता है वह दम्भाचारी है, ज्ञानी नहीं। अतः अर्जुन! तू कर्म
कर। कौन-सा कर्म करे?, तो ‘नियतं कुरु कर्म त्वम्’- निर्धारित किये हुए
कर्म को कर। निर्धारित कर्म क्या है? तो बताया- यज्ञ की प्रक्रिया ही एकमात्र
कर्म है। यज्ञ की विधि को बताया, जो आराधना-चिन्तन की विधि-विशेष है,
परम में प्रवेश दिलानेवाली प्रक्रिया है। जब निष्काम कर्ममार्ग और ज्ञानमार्ग
दोनों में ही कर्म करना है, यज्ञार्थ कर्म करना है, क्रिया एक ही है तो अन्तर
२६० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कैसा? भक्त कर्मों का समर्पण करके इष्ट के आश्रित होकर यज्ञार्थ कर्म में
प्रवृत्त होता है, तो दूसरा सांख्ययोगी अपनी शक्ति को समझकर (अपने भरोसे)
उसी कर्म में प्रवृत्त होता है, पूरा श्रम करता है।
अध्याय पाँच में अर्जुन ने पुनः प्रश्न किया- भगवन्! आप कभी
सांख्य-माध्यम से कर्म करने की प्रशंसा करते हैं, तो कभी समर्पण-माध्यम
से निष्काम कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं- इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है? यहाँ तक
अर्जुन समझ चुका है कि कर्म दोनों दृष्टियों से करना होगा, फिर भी दोनों में
श्रेष्ठ मार्ग वह चुनना चाहता है। श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! दोनों ही दृष्टियों से
कर्म में प्रवृत्त होनेवाले मुझको ही प्राप्त होते हैं; किन्तु सांख्यमार्ग की अपेक्षा
निष्काम कर्ममार्ग श्रेष्ठ है। निष्काम कर्मयोग का अनुष्ठान किये बिना न कोई
योगी होता है और न ज्ञानी। सांख्ययोग दुष्कर है, उसमें कठिनाइयाँ अधिक हैं।
यहाँ तीसरी बार अर्जुन ने यही प्रश्न रखा कि- भगवन्! आपमें अनन्य
भक्ति से लगनेवाले और अव्यक्त अक्षर की उपासना से (सांख्यमार्ग से)
लगनेवाले, इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है?
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१॥
'एवं' अर्थात् इस प्रकार जो अभी-अभी आपने विधि बतायी है, ठीक
इसी विधि के अनुसार अनन्य भक्ति से जो आपकी शरण लेकर, आपसे
निरन्तर संयुक्त होकर आपको भली प्रकार उपासते हैं और दूसरे जो आपकी
शरण न लेकर स्वतन्त्र रूप से अपने भरोसे उसी अक्षय और अव्यक्त स्वरूप
की उपासना करते हैं, जिसमें आप भी स्थित हैं- इन दोनों प्रकार के भक्तों में
अधिक उत्तम योगवेत्ता कौन है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा-
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२॥
द्वादश अध्याय २६१
अर्जुन ! मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मुझसे संयुक्त हुए जो
भक्तजन परम से सम्बन्ध रखनेवाली श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझे भजते हैं,
वे मुझे योगियों में भी अति उत्तम योगी मान्य हैं।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।३।।
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।।४।।
जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार संयत करके मन-बुद्धि के
चिन्तन से अत्यन्त परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप, सदा एकरस रहनेवाले,
नित्य, अचल, अव्यक्त, आकाररहित और अविनाशी ब्रह्म की उपासना करते
हैं, सम्पूर्ण भूतों के हित में लगे हुए और सबमें समान भाववाले वे योगी भी
मुझे ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्म के उपर्युक्त विशेषण मुझसे भिन्न नहीं हैं। किन्तु-
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५।।
उन अव्यक्त परमात्मा में आसक्त हुए चित्तवाले पुरुषों के साधन में
क्लेश विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्त विषयक गति दुःखपूर्वक
प्राप्त की जाती है। जब तक देह का भान है, तब तक अव्यक्त की प्राप्ति
दुष्कर है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण सद्गुरु थे। अव्यक्त परमात्मा उनमें व्यक्त था। वे
कहते हैं कि महापुरुष की शरण न लेकर जो साधक अपनी शक्ति समझते हुए
आगे बढ़ता है कि- मैं इस अवस्था में हूँ, आगे इस अवस्था में जाऊँगा, मैं
अपने ही अव्यक्त स्वरूप को प्राप्त होऊँगा, वह मेरा ही रूप होगा, मैं वही हूँ।
इस प्रकार सोचते, प्राप्ति की प्रतीक्षा न करके अपने शरीर को ही 'सोऽहं'
कहने लगता है। यही इस मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। वह 'दुःखालयम्
अशाश्वतम्' में ही घूम-फिरकर खड़ा हो जाता है। किन्तु जो मेरी शरण लेकर
चलता है वह-
२६२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६॥
जो मेरे परायण होकर सम्पूर्ण कर्मों अर्थात् आराधना को मुझमें अर्पण
करके अनन्य भाव से योग अर्थात् आराधना-प्रक्रिया के द्वारा निरन्तर चिन्तन
करते हुए भजते हैं-
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७॥
केवल मुझमें चित्त लगानेवाले उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप
संसार-सागर से उद्धार करनेवाला होता हूँ। इस प्रकार चित्त लगाने की प्रेरणा
और विधि पर योगेश्वर प्रकाश डालते हैं-
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८॥
इसलिये अर्जुन! तू मुझमें मन लगा, मुझमें ही बुद्धि लगा। इसके
उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। मन और
बुद्धि भी न लगा सके, तब? (अर्जुन ने पीछे कहा भी है कि मन को रोकना तो
मैं वायु की तरह दुष्कर समझता हूँ) इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥९॥
यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापित करने में समर्थ नहीं है, तो हे
अर्जुन! योग के अभ्यास द्वारा मुझे प्राप्त होने की इच्छा कर। (जहाँ भी चित्त
जाय, वहाँ से घसीटकर उसे आराधना, चिन्तन-क्रिया में लगाने का नाम
अभ्यास है) यदि यह भी न कर पाये तो?-
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥१०॥
यदि तू अभ्यास में भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म कर अर्थात्
आराधना करने में तत्पर हो जा। इस प्रकार मेरी प्राप्ति के लिये कर्मों को करता
द्वादश अध्याय २६३
हुआ तू मेरी प्राप्तिरूपी सिद्धि को ही प्राप्त होगा। अर्थात् अभ्यास भी पार न
लगे तो साधना-पथ में लगे भर रहो।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ।।११।।
यदि इसे भी करने में असमर्थ है तो सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग कर
अर्थात् लाभ-हानि की चिन्ता छोड़कर 'मद्योग' के आश्रित होकर अर्थात्
समर्पण के साथ आत्मवान् महापुरुष की शरण में जा। उनसे प्रेरित होकर कर्म
स्वतः होने लगेगा। समर्पण के साथ कर्मफल के त्याग का महत्त्व बताते हुए
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२।।
केवल चित्त को रोकने के अभ्यास से ज्ञानमार्ग से कर्म में प्रवृत्त होना
श्रेष्ठ है। ज्ञान-माध्यम से कर्म को कार्यरूप देने की अपेक्षा ध्यान श्रेष्ठ है;
क्योंकि ध्यान में इष्ट रहता ही है। ध्यान से भी सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्याग
श्रेष्ठ है; क्योंकि इष्ट के प्रति समर्पण के साथ ही योग पर दृष्टि रखते हुए
कर्मफल का त्याग करने से उसके योगक्षेम की जिम्मेदारी इष्ट की हो जाती है।
इसलिये इस त्याग से वह तत्काल ही परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है।
अभी तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि अव्यक्त की उपासना
करनेवाले ज्ञानमार्गी से समर्पण के साथ कर्म करनेवाला निष्काम कर्मयोगी
श्रेष्ठ है। दोनों एक ही कर्म करते हैं; किन्तु ज्ञानमार्गी के पथ में व्यवधान
अधिक हैं। उसके लाभ-हानि की जिम्मेदारी स्वयं पर रहती है, जबकि
समर्पित भक्त की जिम्मेदारी महापुरुष पर होती है, इसलिये वह कर्मफल-
त्याग द्वारा शीघ्र ही शान्ति को प्राप्त होता है। अब शान्तिप्राप्त पुरुष के लक्षण
बताते हैं-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।।१३।।
२६४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार शान्ति को प्राप्त हुआ जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से
रहित, सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है और जो ममता से रहित, अहंकार
से रहित, सुख-दुःख की प्राप्ति में सम तथा क्षमावान् है,
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१४।।
जो निरन्तर योग की पराकाष्ठा से संयुक्त है, लाभ तथा हानि में सन्तुष्ट
है, मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर को वश में किये हुए है, दृढ़ निश्चयवाला है,
वह मुझमें अर्पित मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।१५।।
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी
जीव से उद्विग्न नहीं होता एवं हर्ष, सन्ताप, भय और समस्त विक्षोभों से मुक्त
है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
साधकों के लिये यह श्लोक अत्यन्त उपयोगी है। उन्हें इस ढंग से रहना
चाहिये कि उनके द्वारा किसी के मन को ठेस न लगे। इतना तो साधक कर
सकते हैं; किन्तु दूसरे लोग इस आचरण से नहीं चलेंगे। वे तो संसारी हैं ही,
वे तो आग उगलेंगे, कुछ भी कहेंगे; किन्तु पथिक को चाहिये कि अपने हृदय
में उनके द्वारा (उनके आघातों से) भी उथल-पुथल न होने दे। चिन्तन में सुरत
लगी रहे, क्रम न टूटे। उदाहरण के लिये आप स्वयं सड़क पर नियमानुकूल
बायें से चल रहे हैं, कोई मदिरा पीकर चला आ रहा है, उससे बचना भी
आपकी जिम्मेदारी है।
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।१६।।
जो पुरुष आकांक्षाओं से रहित, सर्वथा पवित्र है, 'दक्षः' अर्थात् आराधना
का विशेषज्ञ है (ऐसा नहीं कि चोरी करता हो तो दक्ष है। श्रीकृष्ण के
अनुसार कर्म एक ही है, नियत कर्म- आराधना-चिन्तन, उसमें जो दक्ष है),
द्वादश अध्याय २६५
जो पक्ष-विपक्ष से परे है, दुःखों से मुक्त है, सभी आरम्भों का त्यागी वह मेरा
भक्त मुझे प्रिय है। करने योग्य कोई क्रिया उसके द्वारा आरम्भ होने के लिये
शेष नहीं रहती।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥१७॥
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना
ही करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों के फल का त्यागी है, जहाँ
कोई शुभ विलग नहीं है, अशुभ शेष नहीं है, भक्ति की इस पराकाष्ठा से युक्त
वह पुरुष मुझे प्रिय है।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८॥
जो पुरुष शत्रु और मित्र में, मान तथा अपमान में सम है, जिसके
अन्तःकरण की वृत्तियाँ सर्वथा शान्त हैं, जो सर्दी-गर्मी, सुख-दुःखादि द्वन्द्वों में
सम और आसक्तिरहित है तथा-
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥१९॥
जो निन्दा तथा स्तुति को समान समझनेवाला है, मननशीलता की चरम
सीमा पर पहुँचकर जिसकी मनसहित इन्द्रियाँ शान्त हो चुकी हैं, जिस किसी
प्रकार शरीर-निर्वाह होने में जो सदैव सन्तुष्ट है, जो अपने निवास-स्थान में
ममता से रहित है, भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ वह स्थिरबुद्धिवाला
पुरुष मुझे प्रिय है।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२०॥
जो मेरे परायण हुए हार्दिक श्रद्धायुक्त पुरुष इस उपर्युक्त धर्ममय अमृत
का भली प्रकार सेवन करते हैं, वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं।
२६६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
निष्कर्ष-
गत अध्याय के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- अर्जुन! तेरे
सिवाय न कोई पाया है, न पा सकेगा- जैसा तूने देखा; किन्तु अनन्य भक्ति
अथवा अनुराग से जो भजता है, वह इसी प्रकार मुझे देख सकता है, तत्त्व के
साथ मुझे जान सकता है और मुझमें प्रवेश भी पा सकता है। अर्थात् परमात्मा
ऐसी सत्ता है, जिसको पाया जाता है। अतः अर्जुन! भक्त बन।
अर्जुन ने इस अध्याय में प्रश्न किया कि- भगवन्! अनन्य भाव से जो
आपका चिन्तन करते हैं और दूसरे वे जो अक्षर अव्यक्त की उपासना करते हैं,
इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि दोनों मुझे
ही प्राप्त होते हैं; क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप हूँ। किन्तु जो इन्द्रियों को वश में
रखते हुए मन को सब ओर से समेटकर अव्यक्त परमात्मा में आसक्त हैं,
उनके पथ में क्लेश विशेष हैं। जब तक देह का अध्यास (भान) है, तब तक
अव्यक्त स्वरूप की प्राप्ति दुःखपूर्ण है; क्योंकि अव्यक्त स्वरूप तो चित्त के
निरोध और विलयकाल में मिलेगा। उसके पूर्व उसका शरीर ही बीच में बाधक
बन जाता है। 'मैं हूँ, मैं हूँ', 'मुझे पाना है'- कहते-कहते अपने शरीर की ही
ओर घूम जाता है। उसके लड़खड़ाने की अधिक सम्भावना है। अतः अर्जुन!
तू सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके अनन्य भक्ति से मेरा चिन्तन कर। जो
मेरे परायण भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मानव शरीरधारी
मुझ सगुण योगी के रूप का ध्यान द्वारा तैलधारावत् निरन्तर चिन्तन करते हैं,
उनका मैं शीघ्र ही संसार-सागर से उद्धार करनेवाला हो जाता हूँ। अतः
भक्तिमार्ग श्रेष्ठ है।
अर्जुन! मुझमें मन को लगा। मन न लगे तो भी लगाने का अभ्यास
कर। जहाँ भी चित्त जाय, पुनः घसीटकर उसका निरोध कर। यह भी करने में
असमर्थ है तो तू कर्म कर। कर्म एक ही है, यज्ञार्थ कर्म। तू कार्यम् कर्म करता
भर जा, दूसरा न कर। उतना ही कर, पार लगे चाहे न लगे। यदि यह भी करने
में असमर्थ है तो स्थितप्रज्ञ, आत्मवान्, तत्त्वज्ञ महापुरुष की शरण होकर
द्वादश अध्याय २६७
सम्पूर्ण कर्मफलों का त्याग कर। ऐसा त्याग करने से तू परमशान्ति को प्राप्त हो
जायेगा।
तत्पश्चात् परमशान्ति को प्राप्त हुए भक्त के लक्षण बताते हुए योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने कहा- जो सम्पूर्ण भूतों में द्वेषभाव से रहित है, जो करुणा से युक्त
और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, वह भक्त मुझे प्रिय है। जो
ध्यान-योग में निरन्तर तत्पर और आत्मवान्, आत्मस्थित है, वह भक्त मुझे
प्रिय है। जिससे न किसी को उद्वेग प्राप्त होता है और स्वयं भी जो किसी से
उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, ऐसा भक्त मुझे प्रिय है। जो शुद्ध है, दक्ष है, व्यथाओं
से उपराम है, सर्वारम्भों को त्यागकर जिसने पार पा लिया है, ऐसा भक्त मुझे
प्रिय है। सम्पूर्ण कामनाओं का त्यागी और शुभाशुभों का पार पानेवाला भक्त
मुझे प्रिय है। जो निन्दा और स्तुति में समान और मौन है, मनसहित जिसकी
इन्द्रियाँ शान्त और मौन हैं, जो किसी भी प्रकार शरीर-निर्वाह में सन्तुष्ट और
रहने के स्थान में ममता से रहित है, शरीर-रक्षा में भी जिसकी आसक्ति नहीं
है, ऐसा स्थितप्रज्ञ भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है।
इस प्रकार श्लोक ग्यारह से उन्नीस तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने शान्तिप्राप्त
योगयुक्त भक्त की रहनी पर प्रकाश डाला, जो साधकों के लिये उपादेय है।
अन्त में निर्णय देते हुए उन्होंने कहा- अर्जुन ! जो मेरे परायण हुए अनन्य श्रद्धा
से युक्त पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्कामभाव से भली
प्रकार आचरण में ढालते हैं, वे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं। अतः समर्पण के
साथ इस कर्म में प्रवृत्त होना श्रेयतर है; क्योंकि उसके हानि-लाभ की जिम्मेदारी
वह इष्ट सद्गुरु अपने ऊपर ले लेते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने स्वरूपस्थ महापुरुष के
लक्षण बताये, उनकी शरण में जाने को कहा और अन्त में अपनी शरण में
आने की प्रेरणा देकर उन महापुरुषों के समकक्ष अपने को घोषित किया।
श्रीकृष्ण एक योगी, महात्मा थे।
इस अध्याय में भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया, अतः इस अध्याय का
नामकरण 'भक्तियोग' युक्तिसंगत है।
२६८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘ भक्तियोगो ’ नाम द्वादशोऽध्यायः॥१२॥
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘भक्तियोग’ नामक बारहवाँ अध्याय
पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘भक्तियोगो’ नाम
द्वादशोऽध्यायः॥१२॥
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘भक्तियोग’ नामक बारहवाँ अध्याय
पूर्ण होता है।
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
त्रयोदशोऽध्यायः क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥
॥ अथ त्रयोदशोऽध्यायः ॥
गीता के आरम्भ में ही धृतराष्ट्र का प्रश्न है- संजय! धर्मक्षेत्र में तथा
कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डुपुत्रों ने क्या किया?
किन्तु अभी तक यह नहीं बताया गया कि वह क्षेत्र है कहाँ? जिन महापुरुष ने
जिस क्षेत्र में युद्ध बताया, स्वयं ही उस क्षेत्र का प्रस्तुत अध्याय में निर्णय देते
हैं कि वह क्षेत्र वस्तुतः है कहाँ?
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥१॥
कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र है और इसको जो भली प्रकार जानता
है, वह क्षेत्रज्ञ है। वह उसमें फँसा नहीं है बल्कि उसका संचालक है। ऐसा उस
तत्त्व को विदित करनेवाले महापुरुषों ने कहा है।
शरीर तो एक ही है, इसमें धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र ये दो क्षेत्र कैसे?
वस्तुतः इस एक ही शरीर के अन्तराल में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन
हैं। एक तो परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्ति दैवी
सम्पद् है और दूसरी है आसुरी सम्पद्- दूषित दृष्टिकोण से जिसका गठन है,
जो नश्वर संसार में विश्वास दिलाती है। जब आसुरी सम्पद् का बाहुल्य होता
है तो यही शरीर 'कुरुक्षेत्र' बन जाता है और इसी शरीर के अन्तराल में जब
दैवी सम्पद् का बाहुल्य होता है तो यही शरीर 'धर्मक्षेत्र' कहलाता है। यह
चढ़ाव-उतार बराबर लगा रहता है; किन्तु तत्त्वदर्शी महापुरुष के सान्निध्य में
जब कोई अनन्य भक्ति द्वारा आराधना में प्रवृत्त होता है तो इन दोनों प्रवृत्तियों
में निर्णायक युद्ध का सूत्रपात हो जाता है। क्रमशः दैवी सम्पद् का उत्थान और
२७० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
आसुरी सम्पद् का शमन हो जाता है। आसुरी सम्पद् के सर्वथा शमन के
उपरान्त परम के दिग्दर्शन की अवस्था आती है। दर्शन के साथ ही दैवी सम्पद्
की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, अतः वह भी परमात्मा में स्वतः विलीन
हो जाती है। भजनेवाला पुरुष परमात्मा में प्रवेश पा जाता है। ग्यारहवें अध्याय
में अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष के अनन्तर पाण्डव-पक्ष के योद्धा भी
योगेश्वर में विलीन होते जा रहे हैं। इस विलय के पश्चात् पुरुष का जो स्वरूप
है, वही क्षेत्रज्ञ है। आगे देखें-
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥२॥
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान अर्थात् मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ।
जो इस क्षेत्र को जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है- ऐसा उसे साक्षात् जाननेवाले
महापुरुष कहते हैं और श्रीकृष्ण कहते हैं कि- मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ अर्थात् श्रीकृष्ण
भी एक योगेश्वर ही थे। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात् विकारसहित प्रकृति और
पुरुष को तत्त्व से जानना ही ज्ञान है, ऐसा मेरा मत है अर्थात् साक्षात्कारसहित
इनकी जानकारी का नाम ज्ञान है। कोरी बहस का नाम ज्ञान नहीं है।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥३॥
वह क्षेत्र जैसा है और जिन विकारोंवाला है तथा जिस कारण से हुआ
है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाववाला है, वह सब मुझसे संक्षेप
में सुन। अर्थात् क्षेत्र विकारवाला है, किसी कारण से हुआ है, जबकि क्षेत्रज्ञ
केवल प्रभाववाला है। मैं ही कहता हूँ- ऐसी बात नहीं है, ऋषि भी कहते हैं-
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥४॥
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से गायन किया
गया है। नाना प्रकार से वेदों की मन्त्रणा द्वारा विभाजित करके भी कहा गया है
तथा विशेष रूप से निश्चित किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के वाक्यों द्वारा भी
त्रयोदश अध्याय २७१
वही कहा गया है। अर्थात् वेदान्त, महर्षि, ब्रह्मसूत्र और हम एक ही बात कहने
जा रहे हैं। श्रीकृष्ण वही कहते हैं, जो इन सबने कहा है। क्या शरीर (क्षेत्र)
इतना ही है, जितना दिखायी देता है? इस पर कहते हैं-
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥५॥
अर्जुन ! पंच महाभूत (क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर), अहंकार,
बुद्धि और चित्त (चित्त का नाम न लेकर उसे अव्यक्त परा प्रकृति कहा गया
अर्थात् मूल प्रकृति पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें परा प्रकृति भी सम्मिलित
है, उपर्युक्त आठों अष्टधा मूल प्रकृति है) तथा दस इन्द्रियाँ (आँख, कान,
नाक, त्वचा, जिह्वा, वाक्, हाथ, पैर, उपस्थ तथा गुदा), एक मन और पाँच
इन्द्रियों के विषय (रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श) तथा-
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥६॥
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और सबका समूह स्थूल देह का यह पिण्ड,
चेतना और धैर्य- इस प्रकार यह क्षेत्र विकारोंसहित संक्षेप में कहा गया। संक्षेप
में यही क्षेत्र का स्वरूप है, जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्कारों के
रूप में उगता है। शरीर ही क्षेत्र है। शरीर में गारा-मसाला किस वस्तु का है?
तो यही पाँच तत्त्व, दस इन्द्रियाँ, एक मन इत्यादि- जैसा लक्षण ऊपर गिनाया
गया है। इन सबका सामूहिक संघात पिण्ड शरीर है। जब तक ये विकार रहेंगे,
तब तक यह पिण्ड भी विद्यमान रहेगा, इसलिये कि यह विकारों से बना है।
अब उस क्षेत्रज्ञ का स्वरूप देखें, जो इस क्षेत्र में लिप्त नहीं बल्कि इससे
निवृत्त है-
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥७॥
हे अर्जुन! मान-अपमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, अहिंसा
(अर्थात् अपनी तथा अन्य किसी की आत्मा को कष्ट न देना अहिंसा है।
२७२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अहिंसा का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि चींटी मत मारो। श्रीकृष्ण ने कहा
कि अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाओ। उसको अधोगति में पहुँचाना
हिंसा है और उसका उत्थान ही शुद्ध अहिंसा है। ऐसा पुरुष अन्य आत्माओं के
उत्थानहेतु भी उन्मुख रहता है। हाँ, इसका आरम्भ किसी को ठेस न पहुँचाने
से होता है। यह उसी का एक अंग-प्रत्यंग है), क्षमाभाव, मन-वाणी की
सरलता, आचार्योपासना अर्थात् श्रद्धा-भक्तिसहित सद्गुरु की सेवा और उनकी
उपासना, पवित्रता, अन्तःकरण की स्थिरता, मन और इन्द्रियोंसहित शरीर का
निग्रह और-
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।८।।
इस लोक और परलोक के देखे-सुने भोगों में आसक्ति का अभाव,
अहं का अभाव तथा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग और भोगादि में दुःख-दोष
का बारम्बार चिन्तन,
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।९।।
पुत्र, स्त्री, धन और गृहादि में आसक्ति का अभाव, प्रिय तथा अप्रिय की
प्राप्ति में चित्त का सदैव सम रहना (क्षेत्रज्ञ की साधना स्त्री-पुत्रादि गृहस्थी की
परिस्थितियों में ही आरम्भ होती है।) और-
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।।१०।।
मुझमें (श्रीकृष्ण एक योगी थे अर्थात् ऐसे किसी महापुरुष में) अनन्य
योग से अर्थात् योग के अतिरिक्त अन्य कुछ भी स्मरण न करते हुए, अव्यभिचारिणी
भक्ति (इष्ट के अतिरिक्त किसी चिन्तन का न आना), एकान्त स्थान का सेवन,
मनुष्यों के समूह में रहने की आसक्ति का न होना तथा-
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।।११।।
त्रयोदश अध्याय २७३
आत्मा के आधिपत्यवाले ज्ञान में एकरस स्थिति और तत्त्वज्ञान के
अर्थस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार- यह सब तो ज्ञान है और इससे जो
विपरीत है, वह सब अज्ञान है- ऐसा कहा गया है। उस परमतत्त्व परमात्मा के
साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली जानकारी का नाम ज्ञान है। (अध्याय चार में
उन्होंने कहा कि यज्ञ के पूर्तिकाल में यज्ञ जिसे शेष छोड़ता है, उस ज्ञानामृत
का पान करनेवाला सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। अतः ब्रह्म के साक्षात्कार
के साथ मिलनेवाली जानकारी ज्ञान है। यहाँ भी वही कहते हैं कि तत्त्वस्वरूप
परमात्मा के साक्षात्कार का नाम ज्ञान है।) इसके विपरीत सब अज्ञान है।
अमानित्व इत्यादि उपर्युक्त लक्षण इस ज्ञान के पूरक हैं। यह प्रश्न पूरा हुआ।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।१२।।
अर्जुन! जो जानने योग्य है तथा जिसे जानकर मरणधर्मा मनुष्य अमृत-
तत्त्व को प्राप्त होता है, उसे अच्छी प्रकार कहूँगा। वह आदिरहित परमब्रह्म न
सत् कहा जाता है और न असत् ही कहा जाता है; क्योंकि जब तक वह अलग
है, तब तक वह सत् है और जब मनुष्य उसमें समाहित हो गया तो कौन
किससे कहे। एक ही रह जाता है, दूसरे का भान नहीं। ऐसी स्थिति में वह ब्रह्म
न सत् है, न असत् है; बल्कि जो स्वयं सहज है, वही है।
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति।।१३।।
वह ब्रह्म सब ओर से हाथ-पैरवाला, सब ओर से नेत्र, सिर और
मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है-सुननेवाला है; क्योंकि वह संसार में
सबको व्याप्त करके स्थित है।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।
वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जाननेवाला है, फिर भी सब इन्द्रियों
से रहित है। वह आसक्तिरहित, गुणों से अतीत होने पर भी सबको धारण और