यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
About this granth
Yatharth Geeta (यथार्थ गीता), "the Gita as it truly is", is Swami Adgadanand's Hindi commentary on the Bhagavad Gita, subtitled Manav Dharmashastra, "the scripture of humanity". Its cover presents it as an eternal explanation of the Gita "after a gap of 5,200 years". The author is a disciple of Paramahamsa Parmanand of the Anusuiya ashram at Chitrakoot, and the commentary draws on the meditative practice of that lineage.
The publisher's note describes him as a monk without academic degrees who regarded writing as a distraction from devotion but undertook this commentary as a divine command. The commentary reads the war of the Gita as an inner struggle, and yajna and karma as stages of meditative practice.
That reading shows in its chapter names, such as "Doubt and Despondency", "Inquiry into Action", "Incentive to Destroy the Foe", "Elucidation of the Yajna", "Yoga of Practice" and "Awakening of the Royal Knowledge", closing with a concluding section called Upasham. The scanned edition, from about 2015, is published by the Shri Paramhans Swami Adgadanandji Ashram Trust.
१८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
का सूत्रपात करने के कारण ब्रह्मा कहे जाते हैं। स्वयं में वे ब्रह्मा भी नहीं हैं।
उनके पास अपनी बुद्धि रह ही नहीं जाती। किन्तु इसके पूर्व साधनाकाल में
बुद्धि ही ब्रह्मा है- ‘अहंकार सिव बुद्धि अज, मन ससि चित्त महान।’
(रामचरितमानस, ६/१५क)
साधारण मनुष्य की बुद्धि ब्रह्मा नहीं है। बुद्धि जब इष्ट में प्रवेश करने
लगती है तभी से ब्रह्मा की रचना होने लगती है, जिसके चार सोपान मनीषियों
ने कहे हैं। पीछे अध्याय तीन में बता आये हैं, स्मरण के लिये पुनः देख सकते
हैं- ब्रह्मविद्, ब्रह्मविद्वर, ब्रह्मविद्वरीयान्, ब्रह्मविद्वरिष्ठ। ब्रह्मविद् वह बुद्धि है,
जो ब्रह्मविद्या से संयुक्त हो। ब्रह्मविद्वर वह है, जिसे ब्रह्मविद्या में श्रेष्ठता प्राप्त
हो। ब्रह्मविद्वरीयान् वह बुद्धि है जिससे वह ब्रह्मविद्या में दक्ष ही नहीं वरन्
उसका नियन्त्रक, संचालक बन जाता है। ब्रह्मविद्वरिष्ठ बुद्धि का वह अन्तिम
छोर है जिसमें इष्ट प्रवाहित है। यहाँ तक बुद्धि का अस्तित्व है; क्योंकि प्रवाहित
होनेवाला इष्ट अभी कहीं अलग है और ग्रहणकर्त्ता बुद्धि अलग है। अभी वह
प्रकृति की सीमा में है। अब स्वयं प्रकाशस्वरूप में जब बुद्धि (ब्रह्मा) रहती है,
जागृत है तो सम्पूर्ण भूत (चिन्तन का प्रवाह) जागृत हैं और जब अविद्या में
रहती है तो अचेत हैं। इसी को प्रकाश और अन्धकार, रात्रि और दिन कहकर
सम्बोधित किया जाता है। देखें-
ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मविद्वेत्ता की वह श्रेणी, जिसमें इष्ट प्रवाहित है, उसको
प्राप्त सर्वोत्कृष्ट बुद्धि में भी विद्या (जो स्वयं प्रकाशस्वरूप है, उसमें मिलाती
है) का दिन और अविद्या की रात्रि, प्रकाश और अन्धकार का क्रम लगा रहता
है, यहाँ तक साधक में माया कामयाब होती है। प्रकाशकाल में अचेत भूत
सचेत हो जाते हैं, उन्हें लक्ष्य दिखायी पड़ने लगता है तथा बुद्धि के अन्तराल
में अविद्या की रात्रि के प्रवेशकाल में सभी भूत अचेत हो जाते हैं। बुद्धि
निश्चय नहीं कर पाती। स्वरूप की ओर बढ़ना बन्द हो जाता है। यही ब्रह्मा का
दिन और यही ब्रह्मा की रात्रि है। दिन के प्रकाश में बुद्धि की सहस्रों प्रवृत्तियों
में ईश्वरीय प्रकाश छा जाता है और अविद्या की रात्रि में इन्हीं सहस्रों परतों में
अचेतावस्था का अन्धकार आ जाता है।
शुभ और अशुभ, विद्या और अविद्या- इन दोनों प्रवृत्तियों के सर्वथा
शान्त होने पर अर्थात् अचेत और सचेत, रात्रि में विलीन और दिन में उत्पन्न
अष्टम अध्याय १८७
दोनों प्रकार के भूतों (संकल्प प्रवाह) के मिट जाने पर उस अव्यक्त बुद्धि से
भी अति परे शाश्वत अव्यक्त भाव मिलता है, जो फिर कभी नष्ट नहीं होता।
भूतों की अचेत और सचेत दोनों स्थितियों के मिटने पर ही वह सनातन भाव
मिलता है।
बुद्धि की उपर्युक्त चार अवस्थाओं के बादवाला पुरुष ही महापुरुष है।
उसके अन्तराल में बुद्धि नहीं है, बुद्धि परमात्मा का यन्त्र-जैसी हो गयी है
किन्तु लोगों को वह उपदेश करता है, निश्चय से प्रेरणा देता है अतः उसमें
बुद्धि प्रतीत होती है; किन्तु वह बुद्धि के स्तर से परे है। वह परम अव्यक्त भाव
में स्थित है, उसका पुनर्जन्म नहीं होना है; किन्तु इस अव्यक्त स्थिति से पूर्व
जब तक उसके पास अपनी बुद्धि है, जब तक वह ब्रह्मा है वह पुनर्जन्म की
परिधि में ही है। इन्हीं तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७॥
जो हजार चतुर्युगों की ब्रह्मा की रात्रि और हजार चतुर्युगों के उसके दिन
को साक्षात् जानते हैं, वे पुरुष समय के तत्त्व को यथार्थ जानते हैं।
प्रस्तुत श्लोक में दिन और रात विद्या और अविद्या के रूपक हैं।
ब्रह्मविद्या से संयुक्त बुद्धि ब्रह्मा की प्रवेशिका तथा ब्रह्मविद्वरिष्ठ बुद्धि ब्रह्मा की
पराकाष्ठा है। विद्या से संयुक्त बुद्धि ही ब्रह्मा का दिन है। जब विद्या कार्यरत
होती है, उस समय योगी स्वरूप की ओर अग्रसर होता है, अन्तःकरण की
सहस्रों प्रवृत्तियों में ईश्वरीय प्रकाश का संचार हो उठता है। इसी प्रकार
अविद्या की रात्रि आने पर अन्तःकरण की सहस्रों प्रवृत्तियों में माया का द्वन्द्व
प्रवाहित होता है। प्रकाश और अन्धकार की यहीं तक सीमा है। इसके पश्चात्
न तो अविद्या रह जाती है और न विद्या ही। वह परमतत्त्व परमात्मा विदित हो
जाता है। जो इसे तत्त्व से भली प्रकार जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्त्व को
जाननेवाले हैं कि कब अविद्या की रात होती है, कब विद्या का दिन आता है,
काल का प्रभाव कहाँ तक है अथवा समय कहाँ तक पीछा करता है?
प्रारम्भिक मनीषी अन्तःकरण को चित्त अथवा कभी-कभी केवल
बुद्धि कहकर सम्बोधित करते थे। कालान्तर में अन्तःकरण का विभाजन मन,
१८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
बुद्धि, चित्त और अहंकार की चार प्रमुख वृत्तियों में किया गया, वैसे अन्तःकरण
की प्रवृत्तियाँ अनन्त हैं। बुद्धि के अन्तराल में ही अविद्या की रात्रि होती है और
उसी बुद्धि में विद्या का दिन भी होता है। यही ब्रह्मा की रात्रि और दिन है।
जगत्रूपी रात्रि में सभी अचेत पड़े हैं। प्रकृति में विचरण करती हुई उनकी
बुद्धि उस प्रकाशस्वरूप को नहीं देख पाती; किन्तु योग का आचरण करनेवाले
योगी इससे जग जाते हैं, वे स्वरूप की ओर बढ़ते हैं, जैसा कि गोस्वामी
तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है-
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम, कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ज्ञान जिमि, पाइ कुसंग सुसंग।।
( रामचरितमानस, ४/१५ ख )
विद्या से संयुक्त बुद्धि कुसंग पाकर अविद्या में परिणत हो जाती है, पुनः
सुसंग से विद्या का संचार उसी बुद्धि में हो जाता है। यह उतार-चढ़ाव पूर्तिपर्यन्त
लगा रहता है। पूर्ति के पश्चात् न बुद्धि है न ब्रह्मा, न रात रहती है न दिन। यही
ब्रह्मा के दिन-रात के रूपक हैं। न हजारों साल की लम्बी रात होती है, न
हजारों चतुर्युग का दिन ही होता है और न कहीं कोई चार मुँहवाला ब्रह्मा ही
है। बुद्धि की उपर्युक्त चार क्रमिक अवस्थाएँ ही ब्रह्मा के चार मुख और
अन्तःकरण की चार प्रमुख प्रवृत्तियाँ ही उसके चतुर्युग हैं। रात और दिन इन्हीं
प्रवृत्तियों में होते हैं। जो पुरुष इसके भेद को तत्त्व से जानते हैं, वे योगीजन
काल के भेद को जानते हैं कि काल कहाँ तक पीछा करता है और कौन पुरुष
काल से भी अतीत हो जाता है। रात्रि और दिन, अविद्या और विद्या में होनेवाले
कार्य को योगेश्वर श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं-
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके।।१८।।
ब्रह्मा के दिन के प्रवेशकाल में अर्थात् विद्या (दैवी सम्पद्) के प्रवेशकाल
में सम्पूर्ण प्राणी अव्यक्त बुद्धि में जागृत हो जाते हैं और रात्रि के प्रवेशकाल में
उसी अव्यक्त, अदृश्य बुद्धि में जागृति के सूक्ष्म तत्त्व अचेत हो जाते हैं। वे
प्राणी अविद्या की रात्रि में स्वरूप को स्पष्ट देख नहीं पाते; किन्तु उनका
अस्तित्व रहता है। जागृत होने और अचेत होने का माध्यम यह बुद्धि है, जो
सबमें अव्यक्त रहती है, दृष्टिगोचर नहीं है।
अष्टम अध्याय १८९
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९॥
हे पार्थ! सब प्राणी इस प्रकार जागृत होकर प्रकृति से विवश होकर
अविद्यारूपी रात्रि के आने पर अचेत हो जाते हैं। वे नहीं देख पाते कि उनका
लक्ष्य क्या है? दिन के प्रवेशकाल में वे पुनः जागृत हो जाते हैं। जब तक बुद्धि
है, तब तक इसके अन्तराल में विद्या और अविद्या का क्रम चलता रहता है।
तब तक वह साधक ही है, महापुरुष नहीं।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२०॥
एक तो ब्रह्मा अर्थात् बुद्धि अव्यक्त है, इन्द्रियों से दिखायी नहीं पड़ती
और इससे भी परे सनातन अव्यक्त भाव है, जो भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट
नहीं होता अर्थात् विद्या में सचेत और अविद्या में अचेत, दिन में उत्पन्न और
रात्रि में विलीन भावोंवाले अव्यक्त ब्रह्मा के भी मिट जाने पर वह सनातन
अव्यक्त भाव मिलता है, जो नष्ट नहीं होता। बुद्धि में होनेवाले उक्त दोनों
उतार-चढ़ाव जब मिट जाते हैं तब सनातन अव्यक्त भाव मिलता है, जो मेरा
परमधाम है। जब सनातन अव्यक्त भाव प्राप्त हो गया तो बुद्धि भी उसी भाव
में रंग जाती है, उसी भाव को धारण कर लेती है। इसलिये वह बुद्धि स्वयं तो
मिट जाती है और उसके स्थान पर सनातन अव्यक्त भाव ही शेष बचता है।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१॥
उस सनातन अव्यक्त भाव को अक्षर अर्थात् अविनाशी कहा जाता है।
उसी को परमगति कहते हैं। वही मेरा परमधाम है, जिसे प्राप्त होकर मनुष्य
पीछे नहीं आते, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इस सनातन अव्यक्त भाव की
प्राप्ति का विधान बताते हैं-
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२॥
पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सम्पूर्ण भूत हैं, जिससे सम्पूर्ण जगत्
व्याप्त है, सनातन अव्यक्त भाववाला वह परमपुरुष अनन्य भक्ति से प्राप्त
१९० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
होने योग्य है। अनन्य भक्ति का तात्पर्य है कि परमात्मा के सिवाय अन्य किसी
का स्मरण न करते हुए उनसे जुड़ जाय। अनन्य भाव से लगनेवाले पुरुष भी
कब तक पुनर्जन्म की सीमा में हैं और कब वे पुनर्जन्म का अतिक्रमण कर
जाते हैं? इस पर योगेश्वर कहते हैं-
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।।२३।।
हे अर्जुन! जिस काल में शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन पुनर्जन्म को
नहीं पाते और जिस काल में शरीर त्यागने पर पुनर्जन्म पाते हैं, मैं अब उस
काल का वर्णन करता हूँ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।२४।।
शरीर-सम्बन्ध का त्याग करते समय जिनके समक्ष ज्योतिर्मय अग्नि
जल रही हो, दिन का प्रकाश फैला हो, सूर्य चमक रहा हो, शुक्लपक्ष का चन्द्र
बढ़ रहा हो, उत्तरायण का निरभ्र और सुन्दर आकाश हो, उस काल में प्रयाण
करनेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
अग्नि ब्रह्मतेज का प्रतीक है। दिन विद्या का प्रकाश है। शुक्लपक्ष
निर्मलता का द्योतक है। विवेक, वैराग्य, शम, दम, तेज और प्रज्ञा ये षडैश्वर्य
ही षण्मास हैं। ऊर्ध्वरेता स्थिति ही उत्तरायण है। प्रकृति से सर्वथा परे इस
अवस्था में जानेवाले ब्रह्मवेत्ता योगीजन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म
नहीं होता; किन्तु अनन्य चित्त से लगे हुए योगीजन यदि इस आलोक को प्राप्त
नहीं कर पाये, जिनकी साधना अभी पूर्ण नहीं है, उनका क्या होता है? इस पर
कहते हैं-
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।२५।।
जिसके प्रयाणकाल में धुआँ फैल रहा हो, योगाग्नि हो (अग्नि यज्ञ-
प्रक्रिया में पायी जानेवाली अग्नि का स्वरूप है।) किन्तु धुएँ से आच्छादित
हो, अविद्या की रात्रि हो, अँधेरा हो, कृष्णपक्ष का चन्द्रमा क्षीण हो रहा हो,
कालिमा का बाहुल्य हो, षड्विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर)
अष्टम अध्याय १९१
से युक्त दक्षिणायन अर्थात् बहिर्मुखी हो (जो परमात्मा के प्रवेश से अभी बाहर
है।) उस योगी को पुनः जन्म लेना पड़ता है। तो क्या शरीर के साथ उस योगी
की साधना नष्ट हो जाती है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥२६॥
उपर्युक्त शुक्ल और कृष्ण दोनों प्रकार की गतियाँ जगत् में शाश्वत हैं
अर्थात् साधन का कभी विनाश नहीं होता। एक (शुक्ल) अवस्था में प्रयाण
करनेवाला पीछे न आनेवाली परमगति को प्राप्त होता है और दूसरी अवस्था
में, जिसमें क्षीण प्रकाश तथा अभी कालिमा है ऐसी अवस्था को गया हुआ
पीछे लौटता है, जन्म लेता है। जब तक पूर्ण प्रकाश नहीं मिलता, तब तक उसे
भजन करना है। प्रश्न पूर्ण हुआ। अब इसके लिये साधन पर पुनः बल देते हैं-
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥२७॥
हे पार्थ! इस प्रकार इन मार्गों को जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं
होता। वह जानता है कि पूर्ण प्रकाश पा लेने पर ब्रह्म को प्राप्त होगा और क्षीण
प्रकाश रहने पर भी पुनर्जन्म में साधन का नाश नहीं होता। दोनों गतियाँ
शाश्वत हैं। अतः अर्जुन! तू सब काल में योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर
साधन कर।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥२८॥
इसको साक्षात्कारसहित जानकर (मानकर नहीं) योगी वेद, यज्ञ, तप
और दान के पुण्यफलों का निःसन्देह अतिक्रमण कर जाता है और सनातन
परमपद को प्राप्त होता है। अविदित परमात्मा की साक्षात् जानकारी का नाम
वेद है। वह अविदित तत्त्व जब विदित हो गया तो अब कौन किसे जाने? अतः
विदित होने के पश्चात् वेदों से भी प्रयोजन समाप्त हो जाता है; क्योंकि
जाननेवाला भिन्न नहीं है। यज्ञ अर्थात् आराधना की नियत क्रिया आवश्यक
१९२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
थी; किन्तु जब वह तत्त्व विदित हो गया, तो किसके लिये भजन करे?
मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना तप है। लक्ष्य प्राप्त होने पर
किसके लिये तप करे? मन, वचन और कर्म से सर्वतोभावेन समर्पण का नाम
दान है। इन सबका पुण्यफल है परमात्मा की प्राप्ति। फल भी अब विलग नहीं
है अतः इन सबकी अब आवश्यकता ही न रही। वह योगी यज्ञ, तप, दान
इत्यादि के फल को भी पार कर जाता है। वह परमपद को प्राप्त होता है।
निष्कर्ष-
इस अध्याय में पाँच प्रमुख बिन्दुओं पर विचार किया गया। जिनमें
सर्वप्रथम अध्याय सात के अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा बीजारोपित प्रश्नों
को स्पष्ट समझाने की जिज्ञासा से इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने सात
प्रश्न किये कि- भगवन्! जिसे आपने कहा, वह ब्रह्म क्या है? वह अध्यात्म
क्या है? वह सम्पूर्ण कर्म क्या है? अधिदैव, अधिभूत और अधियज्ञ क्या हैं
और अन्तकाल में आप किस प्रकार जानने में आते हैं कि कभी विस्मृत नहीं
होते? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि जिसका विनाश नहीं होता, वही परब्रह्म
है। स्वयं की उपलब्धिवाला परमभाव ही अध्यात्म है। जिससे जीव माया के
आधिपत्य से निकलकर आत्मा के आधिपत्य में हो जाता है, वही अध्यात्म है
और भूतों के वे भाव जो शुभ अथवा अशुभ संस्कारों को उत्पन्न करते हैं उन
भावों का रुक जाना, 'विसर्ग:'- मिट जाना ही कर्म की सम्पूर्णता है। इसके
आगे कर्म करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। अतः कर्म कोई ऐसी वस्तु है,
जो संस्कारों के उद्गम को ही मिटा देता है।
इसी प्रकार क्षरभाव अधिभूत हैं अर्थात् नष्ट होनेवाले ही भूतों को उत्पन्न
करने में माध्यम हैं। वे ही भूतों के अधिष्ठाता हैं। परमपुरुष ही अधिदैव है।
उसमें दैवी सम्पद् विलीन होती है। इस शरीर में अधियज्ञ मैं ही हूँ अर्थात्
जिसमें यज्ञ विलय होते हैं वह मैं हूँ, यज्ञ का अधिष्ठाता हूँ। वह मेरे स्वरूप को
ही प्राप्त होता है अर्थात् श्रीकृष्ण एक योगी थे। अधियज्ञ कोई ऐसा पुरुष है जो
इस शरीर में रहता है, बाहर नहीं। अन्तिम प्रश्न कि अन्त समय में आप किस
प्रकार जानने में आते हैं? उन्होंने बताया कि जो मेरा निरन्तर स्मरण करते हैं,
अष्टम अध्याय १९३
मेरे सिवाय किसी दूसरे विषय-वस्तु का चिन्तन नहीं आने देते और ऐसा करते
हुए शरीर का सम्बन्ध त्याग देते हैं, वे मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होते हैं,
जिसे अन्त में भी वही प्राप्त रहता है। शरीर की मृत्यु के साथ यह उपलब्धि
होती हो ऐसी बात नहीं है। मरने पर ही मिलता तो श्रीकृष्ण पूर्ण न होते, अनेक
जन्मों में चलकर पानेवाला ज्ञानी उनका स्वरूप न होता। मन का सर्वथा
निरोध और निरुद्ध मन का भी विलय ही अन्तकाल है, जहाँ फिर शरीरों की
उत्पत्ति का माध्यम शान्त हो जाता है। उस समय वह परमभाव में प्रवेश पा
जाता है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
इस प्राप्ति के लिये उन्होंने स्मरण का विधान बताया- अर्जुन ! निरन्तर
मेरा स्मरण कर और युद्ध कर। दोनों एक साथ कैसे होगें? कदाचित् ऐसा हो
कि 'जय गोपाल, हे कृष्ण' कहते रहें, लाठी भी चलाते रहें। स्मरण का स्वरूप
स्पष्ट किया कि योग-धारणा में स्थिर रहते हुए, मेरे सिवाय अन्य किसी भी
वस्तु का स्मरण न करते हुए निरन्तर स्मरण कर। जब स्मरण इतना सूक्ष्म है
तो युद्ध कौन करेगा? मान लीजिये, यह पुस्तक भगवान है, तो इसके अगल-
बगल की वस्तु, सामने बैठे हुए लोग या अन्य देखी-सुनी कोई वस्तु संकल्प
में भी न आये, दिखायी न पड़े। यदि दिखायी पड़ती है तो स्मरण नहीं है। ऐसे
स्मरण में युद्ध कैसा? वस्तुतः जब आप इस प्रकार निरन्तर स्मरण में प्रवृत्त
होंगे, तो उसी क्षण युद्ध का सही स्वरूप खड़ा होता है। उस समय मायिक
प्रवृत्तियाँ बाधा के रूप में प्रत्यक्ष ही हैं। काम, क्रोध, राग, द्वेष दुर्जय शत्रु हैं।
ये शत्रु स्मरण करने नहीं देंगे। इनसे पार पाना ही युद्ध है। इन शत्रुओं के मिट
जाने पर ही व्यक्ति परमगति को प्राप्त होता है।
इस परमगति को पाने के लिये अर्जुन ! तू जप तो 'ओम्' का और ध्यान
मेरा कर अर्थात् श्रीकृष्ण एक योगी थे। नाम और रूप आराधना की कुंजी है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रश्न को भी लिया कि पुनर्जन्म क्या है? उसमें
कौन-कौन आते हैं? उन्होंने बताया कि ब्रह्मा से लेकर यावन्मात्र जगत् पुनरावर्ती
है और इन सबके समाप्त होने पर भी मेरा परम अव्यक्त भाव तथा उसमें
स्थिति समाप्त नहीं होती।
१९४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस योग में प्रविष्ट पुरुष की दो गतियाँ हैं। जो पूर्ण प्रकाश को प्राप्त
षडैश्वर्यसम्पन्न ऊर्ध्वरेता है, जिसमें लेशमात्र भी कमी नहीं है, वह परमगति
को प्राप्त होता है। यदि उस योगकर्त्ता में लेशमात्र भी कमी है, कृष्णपक्ष-सी
कालिमा का संचार है, ऐसी अवस्था में शरीर का समय समाप्त होनेवाले योगी
को जन्म लेना पड़ता है। वह सामान्य जीव की तरह जन्म-मरण के चक्कर में
नहीं फँसता बल्कि जन्म लेकर उससे आगे की शेष साधना को पूरा करता है।
इस प्रकार आगे के जन्म में उसी क्रिया से चलकर वह भी वहीं पहुँच
जाता है जिसका नाम परमधाम है। पहले भी श्रीकृष्ण कह आये हैं कि इसका
थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार कराके ही छोड़ता है।
'दोनों रास्ते शाश्वत हैं, अमिट हैं'- इस बात को समझकर कोई भी पुरुष योग
से चलायमान नहीं होता। अर्जुन ! तू योगी बन। योगी वेद, तप, यज्ञ और दान
के भी पुण्यफलों का उल्लंघन कर जाता है, परमगति को प्राप्त होता है।
इस अध्याय में स्थान-स्थान पर परमगति का चित्रण किया गया है
जिसे अव्यक्त, अक्षय और अक्षर कहकर सम्बोधित किया गया, जिसका कभी
क्षय अथवा विनाश नहीं होता। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'अक्षरब्रह्मयोगो' नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'अक्षर-ब्रह्मयोग' नामक आठवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'अक्षरब्रह्मयोगो'
नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'अक्षर-ब्रह्मयोग' नामक आठवाँ
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
नवमोऽध्यायः राजविद्या जागृति
।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।।
।। अथ नवमोऽध्यायः ।।
अध्याय छः तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग का क्रमबद्ध विश्लेषण
किया, जिसका शुद्ध अर्थ है यज्ञ की प्रक्रिया। यज्ञ उस परम में प्रवेश दिला
देनेवाली आराधना की विधि-विशेष का चित्रण है, जिसमें चराचर जगत्
हवन-सामग्री के रूप में है। मन के निरोध और निरुद्ध मन के भी विलयकाल
में वह अमृत-तत्त्व विदित हो जाता है। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसकी सृष्टि करता
है, उसको पान करनेवाला ज्ञानी है और वह सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है।
उस मिलन का नाम ही योग है। उस यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म कहलाता है।
सातवें अध्याय में उन्होंने बताया कि इस कर्म को करनेवाले व्याप्त ब्रह्म,
सम्पूर्ण कर्म, सम्पूर्ण अध्यात्म, सम्पूर्ण अधिदैव, अधिभूत और अधियज्ञसहित
मुझको जानते हैं। आठवें अध्याय में उन्होंने कहा कि यही परमगति है, यही
परमधाम है।
प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने स्वयं चर्चा की कि योगयुक्त
पुरुष का ऐश्वर्य कैसा है? सबमें व्याप्त रहने पर भी वह कैसे निर्लेप है? करते
हुए भी वह कैसे अकर्त्ता है? उस पुरुष के स्वभाव एवं प्रभाव पर प्रकाश
डाला, योग को आचरण में ढालने पर आनेवाले देवतादिक विघ्नों से सतर्क
किया और उस पुरुष की शरण होने पर बल दिया।
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! असूया (डाह, ईर्ष्या) रहित तेरे
लिये मैं इस परमगोपनीय ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा अर्थात् प्राप्ति के
पश्चात् महापुरुष की रहनी के साथ कहूँगा कि कैसे वह महापुरुष सर्वत्र एक
१९६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
साथ कर्म करता है, कैसे वह जागृति प्रदान करता है, रथी बनकर आत्मा के
साथ कैसे सदैव रहता है? ‘यत् ज्ञात्वा’– जिसे साक्षात् जानकर तू दुःखरूपी
संसार से मुक्त हो जायेगा। वह ज्ञान कैसा है? इस पर कहते हैं-
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।२।।
विज्ञान से संयुक्त यह ज्ञान सभी विद्याओं का राजा है। विद्या का अर्थ
भाषा-ज्ञान अथवा शिक्षा नहीं है। ‘विद्या हि का ब्रह्मगति प्रदाया।’, ‘सा
विद्या या विमुक्तये।’ विद्या उसे कहते हैं कि जिसके पास आये, उसे उठाकर
ब्रह्म-पथ पर चलाते हुए मोक्ष प्रदान कर दे। यदि रास्ते में ऋद्धियों-सिद्धियों
अथवा प्रकृति में कहीं उलझ गया तो सिद्ध है कि अविद्या सफल हो गयी। वह
विद्या नहीं है। यह राजविद्या ऐसी है, जो निश्चित कल्याण करनेवाली है। यह
सभी गोपनीयों का राजा है। अविद्या और विद्या के अवगुण्ठन का अनावरण
होने पर योगयुक्तता के पश्चात् ही इससे मिलन होता है। यह अति पवित्र,
उत्तम और प्रत्यक्ष फलवाला है। ‘इधर करो, उधर लो’- ऐसा प्रत्यक्ष फलवाला
है। यह अन्धविश्वास नहीं है कि इस जन्म में साधन करो, फल कभी दूसरे
जन्म में मिलेगा। यह परमधर्म परमात्मा से संयुक्त है। विज्ञानसहित यह ज्ञान
करने में सरल और अविनाशी है।
अध्याय दो में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! इस योग में बीज का
नाश नहीं होता। इसका थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार
कर देता है। छठें अध्याय में अर्जुन ने पूछा- भगवन्! शिथिल प्रयत्नवाला
साधक नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? श्रीकृष्ण ने बताया- अर्जुन! पहले तो कर्म
समझना आवश्यक है और समझने के बाद थोड़ा भी साधन पार लग गया तो
उसका किसी जन्म में कभी विनाश नहीं होता, बल्कि उस थोड़े से अभ्यास के
प्रभाव से हर जन्म में वही करता है। अनेक जन्मों के परिणाम में वहीं पहुँच
जाता है, जिसका नाम परमगति अर्थात् परमात्मा है। उसी को योगेश्वर श्रीकृष्ण
यहाँ भी कहते हैं कि यह साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है; परन्तु
इसके लिये श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
नवम अध्याय १९७
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि।।३।।
परंतप अर्जुन! इस धर्म में (जिसका थोड़ा भी साधन करने पर विनाश
नहीं होता) श्रद्धारहित पुरुष (एक इष्ट में मन को केन्द्रित न रखनेवाला पुरुष)
मुझे न प्राप्त होकर संसार-क्षेत्र में भ्रमण करता ही रहता है। अतः श्रद्धा
अनिवार्य है। क्या आप संसार से परे हैं? इस पर कहते हैं-
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।४।।
मुझ अव्यक्त स्वरूप से यह सब जगत् व्याप्त है अर्थात् मैं जिस स्वरूप
में स्थित हूँ, वह सर्वत्र व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थान पाये हैं किन्तु मैं
उनमें स्थित नहीं हूँ; क्योंकि मैं अव्यक्त स्वरूप में स्थित हूँ। महापुरुष जिस
अव्यक्त स्वरूप में स्थित हैं, वहीं से (शरीर छोड़कर उसी अव्यक्त स्तर से ही)
बात करते हैं। इसी क्रम में आगे कहते हैं-
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः।।५।।
वस्तुतः सब भूत भी मुझमें स्थित नहीं हैं क्योंकि वे मरणधर्मा हैं,
प्रकृति के आश्रित हैं; किन्तु मेरी योगमाया के ऐश्वर्य को देख कि जीवधारियों
को उत्पन्न और पोषण करनेवाला मेरा आत्मा भूतों में स्थित नहीं है। मैं
आत्मस्वरूप हूँ, इसलिये मैं उन भूतों में स्थित नहीं हूँ। यही योग का प्रभाव है।
इसको स्पष्ट करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण दृष्टान्त देते हैं-
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।
जैसे आकाश से ही उत्पन्न होनेवाला महान् वायु आकाश में सदैव
स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, ठीक वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें
स्थित हैं, ऐसा जान। ठीक इसी प्रकार मैं आकाशवत् निर्लेप हूँ। वे मुझे मलिन
नहीं कर पाते। प्रश्न पूरा हुआ। यही योग का प्रभाव है। अब योगी क्या करता
है? इस पर कहते हैं-
१९८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७॥
अर्जुन! कल्प के विलयकाल में सब मेरी प्रकृति अर्थात् मेरे स्वभाव
को प्राप्त होते हैं और कल्प के आदि में मैं उनको बार-बार ‘विसृजामि’-
विशेष रूप से सृजन करता हूँ। थे तो वे पहले से किन्तु विकृत थे, उन्हीं को
रचता हूँ, सजाता हूँ। जो अचेत हैं उन्हें जागृत करता हूँ, कल्प के लिये प्रेरित
करता हूँ। कल्प का तात्पर्य है उत्थानोन्मुख परिवर्तन। आसुरी सम्पद् से
निकलकर जैसे-जैसे पुरुष दैवी सम्पद् में प्रवेश पाता है, यहीं से कल्प का
आरम्भ है और जब ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है, वहीं कल्प का क्षय है।
अपना कर्म पूरा करके कल्प भी विलीन हो जाता है। भजन का आरम्भ कल्प
का आदि है और भजन की पराकाष्ठा, जहाँ लक्ष्य विदित होता है, कल्प का
अन्त है। जब यह क्षर आत्मा योनियों के कारणभूत राग-द्वेषादि से मुक्ति पाकर
अपने शाश्वत स्वरूप में स्थिर हो जाय, इसी को श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह मेरी
प्रकृति को प्राप्त होता है।
जो महापुरुष प्रकृति का विलय करके स्वरूप में प्रवेश पा गया, उसकी
प्रकृति कैसी? क्या उसमें प्रकृति शेष ही है? नहीं, अध्याय ३/३३ में योगेश्वर
श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि सभी प्राणी अपनी प्रकृति को प्राप्त होते हैं। जैसा
उनके ऊपर प्रकृति के गुणों का दबाव है, वैसा करते हैं और ‘ज्ञानवानपि’-
प्रत्यक्ष दर्शन के साथ जानकारीवाला ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के सदृश चेष्टा
करता है। वह पीछेवालों के कल्याण के लिये करता है। पूर्णज्ञानी तत्त्वस्थित
महापुरुष की रहनी ही उसकी प्रकृति है। वह अपने इसी स्वभाव में बरतता है।
कल्प के क्षय में लोग महापुरुष की इसी रहनी को प्राप्त होते हैं। महापुरुष के
इसी कृतित्व पर पुनः प्रकाश डालते हैं-
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८॥
अपनी प्रकृति अर्थात् महापुरुष की रहनी स्वीकार करके ‘प्रकृतेर्वशात्’-
अपने-अपने स्वभाव में स्थित प्रकृति के गुणों से परवश हुए इस सम्पूर्ण
नवम अध्याय १९९
भूतसमुदाय को मैं बारम्बार 'विसृजामि'- विशेष सृजन; विशेष रूप से
सजाता हूँ। उन्हें अपने स्वरूप की ओर बढ़ने के लिये प्रेरित करता हूँ। तब तो
आप इस कर्म से बँधे हैं?-
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९॥
अध्याय ४/९ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि महापुरुष की कार्य-
प्रणाली अलौकिक है। अध्याय ९/४ में बताया- मैं अव्यक्त रूप से करता हूँ।
यहाँ भी वही कहते हैं- धनंजय! जिन कर्मों को मैं अदृश्य रूप से करता हूँ,
उनमें मेरी आसक्ति नहीं है। उदासीन के सदृश स्थित रहनेवाले मुझ परमात्म-
स्वरूप को वे कर्म नहीं बाँधते; क्योंकि कर्म के परिणाम में जो लक्ष्य मिलता
है उसमें मैं स्थित हूँ, इसलिये उन्हें करने के लिये मैं विवश नहीं हूँ।
यह तो स्वभाव के साथ जुड़ी प्रकृति के कार्यों का प्रश्न था, महापुरुष
की रहनी थी, उनकी रचना थी। अब मेरे अध्यास से जो माया रचती है, वह
क्या है? वह भी एक कल्प है-
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।१०।।
अर्जुन ! मेरी अध्यक्षता में अर्थात् मेरी उपस्थिति में सर्वत्र व्याप्त मेरे
अध्यास से यह माया (त्रिगुणमयी प्रकृति, अष्टधा मूल प्रकृति और चेतन
दोनों) चराचर सहित जगत् को रचती है, जो क्षुद्र कल्प है और इसी कारण से
यह संसार आवागमन के चक्र में घूमता रहता है। प्रकृति का यह क्षुद्र कल्प
जिसमें काल का परिवर्तन है, मेरे अध्यास से प्रकृति ही करती है, मैं नहीं
करता; किन्तु सातवें श्लोक में निर्दिष्ट कल्प आराधना का संचार एवं पूर्तिपर्यन्त
मार्गदर्शनवाला कल्प महापुरुष स्वयं करते हैं। एक स्थान पर वे स्वयं कर्त्ता हैं,
जहाँ वे विशेष रूप से सृजन करते हैं। यहाँ कर्त्ता प्रकृति है, जो केवल मेरे
अध्यास से यह क्षणिक परिवर्तन करती है; जिसमें शरीरों का परिवर्तन, काल-
परिवर्तन, युग-परिवर्तन इत्यादि आते हैं। ऐसा व्याप्त प्रभाव होने पर भी
मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। तथा-
२०० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११॥
सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वररूप मेरे परमभाव को न जाननेवाले मूढ़लोग
मुझे मनुष्य-शरीर के आधारवाला और तुच्छ समझते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के
ईश्वरों का भी जो महान् ईश्वर है, उस परमभाव में मैं स्थित हूँ; किन्तु हूँ
मनुष्य-शरीरधारी, मूढ़लोग इसे नहीं जानते। वे मुझे मनुष्य कहकर सम्बोधित
करते हैं। उनका दोष भी क्या है? जब वे दृष्टिपात करते हैं तो महापुरुष का
शरीर ही तो दिखायी पड़ता है। कैसे वे समझें कि आप महान् ईश्वरभाव में
स्थित हैं? वे क्यों नहीं देख पाते? इस पर कहते हैं-
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२॥
वे वृथा आशा (जो कभी पूर्ण न हो ऐसी आशा), वृथा कर्म (बन्धनकारी
कर्म), वृथा ज्ञान (जो वस्तुतः अज्ञान है), 'विचेतसः'- विशेष रूप से
अचेत हुए, राक्षसों और असुरों के-से मोहित होनेवाले स्वभाव को धारण
किये होते हैं अर्थात् आसुरी स्वभाववाले होते हैं इसलिये मनुष्य समझते हैं।
असुर और राक्षस मन का एक स्वभाव है, न कि कोई जाति या योनि। आसुरी
स्वभाववाले मुझे नहीं जान पाते; किन्तु महात्माजन मुझे जानते और भजते हैं-
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३॥
परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति अर्थात् दैवी सम्पद् के आश्रित हुए महात्माजन
मुझे सब भूतों का आदिकारण, अव्यक्त और अक्षर जानकर अनन्य मन से
अर्थात् मन के अन्तराल में किसी अन्य को स्थान न देकर केवल मुझमें श्रद्धा
रखकर निरन्तर मुझे भजते हैं। किस प्रकार भजते हैं? इस पर कहते हैं-
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४॥
वे निरन्तर चिन्तन के व्रत में अचल रहते हुए मेरे नाम और गुणों का
चिन्तन करते हैं, प्राप्ति के यत्न करते हैं और मुझे बारम्बार नमस्कार करते हुए
नवम अध्याय २०१
सदैव मुझसे संयुक्त होकर अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं। अविरल लगे रहते
हैं। कौन-सी उपासना करते हैं? कैसा है यह कीर्तिगान? कोई दूसरी उपासना
नहीं वरन् वही 'यज्ञ', जिसे विस्तार से बता आये हैं। उसी आराधना को यहाँ
संक्षेप में योगेश्वर श्रीकृष्ण दोहरा रहे हैं-
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥१५॥
उनमें से कोई तो मुझ सर्वव्याप्त विराट् परमात्मा को ज्ञानयज्ञ द्वारा
यजन करते हैं अर्थात् अपनी हानि, लाभ और शक्ति को समझकर इसी नियत
कर्म यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं, कुछ एकत्व भाव से मेरी उपासना करते हैं कि मुझे
इसी में एक होना है और दूसरे सब कुछ मुझे अलग रखकर, मुझे समर्पण
करके निष्काम सेवा-भाव से मुझे उपासते हैं तथा बहुत प्रकार से उपासते हैं;
क्योंकि एक ही यज्ञ के ये सभी ऊँचे-नीचे स्तर हैं। यज्ञ का आरम्भ सेवा से
ही होता है; किन्तु उसका अनुष्ठान होता कैसे है? योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-
यज्ञ मैं करता हूँ। यदि महापुरुष रथी न हो तो यज्ञ पार नहीं लगेगा। उन्हीं के
निर्देशन में साधक समझ पाता है कि अब वह किस स्तर पर है, कहाँ तक
पहुँच सका है। वस्तुतः यज्ञकर्त्ता कौन है?- इस पर योगेश्वर कहते हैं-
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥१६॥
कर्त्ता मैं हूँ। वस्तुतः कर्त्ता के पीछे प्रेरक के रूप में सदैव संचालित
करनेवाला इष्ट ही है। कर्त्ता द्वारा जो पार लगता है, मेरी देन है। यज्ञ मैं हूँ। यज्ञ
आराधना की विधि-विशेष है। पूर्तिकाल में यज्ञ जिसका सृजन करता है, उस
अमृत को पान करनेवाला पुरुष सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है। स्वधा मैं
हूँ अर्थात् अतीत के अनन्त संस्कारों को विलय करना, उन्हें तृप्त कर देना मेरी
देन है। भवरोग को मिटानेवाली औषधि मैं हूँ। मुझे पाकर लोग इस रोग से
निवृत्त हो जाते हैं। मन्त्र मैं हूँ। मन को श्वास के अन्तराल में निरोध करना मेरी
देन है। इस निरोध-क्रिया में तीव्रता लानेवाली वस्तु 'आज्य' (हवि) भी मैं हूँ।
मेरे ही प्रकाश में मन की सभी प्रवृत्तियाँ विलीन होती हैं। हवन अर्थात् समर्पण
भी मैं ही हूँ।
२०२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण बार-बार 'मैं हूँ' कह रहे हैं। इसका आशय मात्र
इतना ही है कि मैं ही प्रेरक के रूप में आत्मा से अभिन्न होकर खड़ा हो जाता
हूँ तथा निरन्तर निर्णय देते हुए योगक्रिया को पूर्ण कराता हूँ। इसी का नाम
विज्ञान है। 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि “जब तक इष्टदेव रथी होकर
श्वास-प्रश्वास पर रोकथाम न करने लगें, तब तक भजन आरम्भ ही नहीं
होता।” कोई लाख आँख मूँदे, भजन करे, शरीर को तपा डाले; लेकिन जब
तक जिस परमात्मा की हमें चाह है वह, जिस सतह पर हम खड़े हैं उस स्तर
पर उतरकर आत्मा से अभिन्न होकर जागृत नहीं हो जाता, तब तक सही मात्रा
में भजन का स्वरूप समझ में नहीं आता। इसलिये महाराज जी कहते थे- “मेरे
स्वरूप को पकड़ो, मैं सब दूँगा।” श्रीकृष्ण कहते हैं- सब मुझसे होता है।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।।१७।।
अर्जुन! मैं ही सम्पूर्ण जगत् का 'धाता' अर्थात् धारण करनेवाला,
'पिता' अर्थात् पालन करनेवाला, 'माता' अर्थात् उत्पन्न करनेवाला, 'पितामहः'
अर्थात् मूल उद्गम हूँ, जिसमें सभी प्रवेश पाते हैं और जानने योग्य पवित्र
ओंकार अर्थात् 'अहं आकार इति ओंकारः'- वह परमात्मा मेरे स्वरूप में
है। 'सोऽहं, तत्त्वमसि' इत्यादि एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसा जानने योग्य
स्वरूप मैं ही हूँ। 'ऋक्' अर्थात् सम्पूर्ण प्रार्थना, 'साम' अर्थात् समत्व
दिलानेवाली प्रक्रिया, 'यजुः' अर्थात् यजन की विधि-विशेष भी मैं ही हूँ।
योग-अनुष्ठान के उक्त तीनों आवश्यक अंग मुझसे होते हैं।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।।१८।।
हे अर्जुन! 'गतिः' अर्थात् प्राप्त होने योग्य परमगति, 'भर्ता'- भरण-
पोषण करनेवाला, सबका स्वामी, 'साक्षी' अर्थात् द्रष्टा-रूप में स्थित सबको
जाननेवाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, अकारण प्रेमी मित्र, उत्पत्ति
और प्रलय अर्थात् शुभाशुभ संस्कारों का विलय तथा अविनाशी कारण मैं ही
हूँ। अर्थात् अन्त में जिनमें प्रवेश मिलता है, वे सारी विभूतियाँ मैं ही हूँ।
नवम अध्याय २०३
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।१९।।
मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता
हूँ। मृत्यु से परे अमृत-तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ।
अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी-कभी भजनेवाले
मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं-
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।२०।।
आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना,
समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले, सोम अर्थात् चन्द्रमा के
क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की
निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं।
यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म
होता है; जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी
निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष
अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के
दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते।।२१।।
वे उस विशाल स्वर्ग को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक अर्थात्
जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार 'त्रयीधर्मम्'- प्रार्थना, समत्व एवं
यजन की तीनों विधियों से एक ही यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाले मेरी शरण हुए
२०१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भी कामनावाले पुरुष बारम्बार जाने-आने को अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते
हैं किन्तु उनका मूल नाश कभी नहीं होता; क्योंकि इस पथ में बीज का नाश
नहीं है। किन्तु जो किसी प्रकार की कामना नहीं करते, उन्हें क्या मिलता है?-
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥२२॥
अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर
चिन्तन करते हैं, 'पर्युपासते'- लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं।
उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ
अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ।
इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं-
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३॥
कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त दूसरे-दूसरे देवताओं को पूजते हैं,
वे भी मुझे ही पूजते हैं; क्योंकि वहाँ देवता नाम की कोई वस्तु तो होती नहीं,
किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति की विधि से रहित है।
यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार देवताओं के प्रकरण को लिया है।
सर्वप्रथम अध्याय सात के बीसवें से तेईसवें श्लोक तक उन्होंने कहा- अर्जुन !
कामनाओं द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, ऐसे मूढ़बुद्धि
पुरुष अन्य देवताओं की पूजा करते हैं और जहाँ पूजा करते हैं, वहाँ देवता
नाम की सक्षम सत्ता तो है ही नहीं। पीपल, पत्थर, भूत, भवानी अथवा अन्यत्र
जहाँ उनकी श्रद्धा झुक जाती है, वहाँ कोई देवता नहीं है। मैं ही सर्वत्र हूँ। उस
स्थान पर मैं ही खड़ा होकर उनकी देवश्रद्धा को उन स्थानों पर स्थिर करता हूँ।
मैं ही फल का विधान करता हूँ, फल देता हूँ। फल निश्चित मिलता है; किन्तु
उनका फल नाशवान् है। आज है तो कल भोगने में आ जायेगा, नष्ट हो जायेगा,
जबकि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। अतः वे मूढ़बुद्धि जिनके ज्ञान का अपहरण
हो गया है, वही अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।
नवम अध्याय २०५
प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण
पुनः दोहराते हैं कि- अर्जुन! जो श्रद्धा से अन्य-अन्य देवताओं को पूजते हैं,
वे मुझे ही पूजते हैं; किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है। वहाँ देवता नाम की
सक्षम वस्तु नहीं है। उनकी प्राप्ति की विधि गलत है। अब प्रश्न उठता है कि
जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही पूजते हैं और फल भी मिलता ही है, तो
दोष क्या है?
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।२४।।
सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के
परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्व
से भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये 'च्यवन्ति'- गिरते हैं। अर्थात् वे कभी
अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहीं जानते तब तक
कामनाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?-
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।।
अर्जुन! देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। देवता हैं तो
परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को
पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं, भूतों को
पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता
है। वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं,
मेरी पूजा का विधान भी सरल है-
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।२६।।
भक्ति का आरम्भ यहीं से है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई
मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करनेवाले उस भक्त का वह
सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ। इसलिये-