यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context४२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही आश्चर्य की तरह इसके तत्त्व को कहता है।
जिसने देखा है, वही यथार्थ कह सकता है। दूसरा कोई विरला साधक इसे
आश्चर्य की भाँति सुनता है। सब सुनते भी नहीं; क्योंकि यह अधिकारी के
लिये ही है। हे अर्जुन ! कोई-कोई तो सुनकर भी इस आत्मा को नहीं जान पाते;
क्योंकि साधन पार नहीं लगता। आप लाख ज्ञान की बातें सुनें, समझें- बाल
की खाल निकालकर समझें, लालायित भी रहें; किन्तु मोह बड़ा प्रबल है,
थोड़ी देर बाद ही आप अपनी सांसारिक व्यवस्थाओं में लिप्त मिलेंगे।
अन्त में श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं-
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।३०।।
अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीर में सदैव अवध्य है, अकाट्य है।
इसलिये सम्पूर्ण भूतप्राणियों के लिये तू शोक करने योग्य नहीं है।
'आत्मा ही सनातन है'- इस तथ्य का प्रतिपादन करके, इसका प्रभुतासहित
वर्णन करके यह प्रश्न यहीं पूरा हो जाता है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि इसकी
प्राप्ति कैसे हो? सम्पूर्ण गीता में इसके लिये दो ही मार्ग हैं- पहला निष्काम
कर्मयोग और दूसरा ज्ञानयोग। दोनों मार्गों में किया जानेवाला कर्म एक ही है।
उस कर्म की अनिवार्यता पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्ञानयोग के विषय
में कहते हैं-
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।३१।।
अर्जुन ! स्वधर्म देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है; क्योंकि धर्मसंयुक्त
युद्ध से बढ़कर अन्य कोई परमकल्याणकारी मार्ग क्षत्रिय के लिये नहीं है।
अभी तक तो 'आत्मा शाश्वत है', 'आत्मा सनातन है', 'वही एकमात्र धर्म है'
कहा गया है। अब यह स्वधर्म कैसा? धर्म तो एकमात्र आत्मा ही है। वह तो
अचल स्थिर है तो धर्माचरण क्या? वस्तुतः इस आत्मपथ में प्रवृत्त होने की
क्षमता हर व्यक्ति की अलग-अलग होती है। स्वभाव से उत्पन्न इस क्षमता को
स्वधर्म कहा गया है।