यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in contextद्वितीय अध्याय ३९
शूद्रों, वैश्यों, क्षत्रियों और ब्राह्मणों को, सबको वेद पढ़ने का अधिकार था।
प्रत्येक वर्ग के ऋषियों ने वैदिक मन्त्रों की रचना की है, शास्त्रार्थ-निर्णय में
भाग लिया है। प्राचीन राजाओं ने धर्म के नाम पर आडम्बर फैलानेवालों को
दण्ड दिया, धर्मपरायणों का समादर किया था। किन्तु मध्यकालीन भारत में
सनातन-धर्म की यथार्थ जानकारी न रखने से उपर्युक्त गाँव के निवासी भेड़
की तरह एक कोने में खड़े होते गये कि धर्म नष्ट हो गया। कई लोगों ने इस
अप्रिय शब्द को सुनकर आत्महत्या कर ली; किन्तु सब कहाँ तक प्राणान्त
करते। अटूट श्रद्धा के पश्चात् भी विवश होकर अन्य हल खोजना पड़ा। आज
भी वे बाँस गाड़कर, मूसल रखकर हिन्दुओं की तरह विवाह करते हैं, बाद में
एक मौलवी निकाह पढ़ाकर चला जाता है। सब-के-सब शुद्ध हिन्दू हैं, सब-
के-सब मुसलमान बन गये।
हुआ क्या था? पानी पिया था, अनजाने में मुसलमानों का छुआ खा
लिया था इसलिये धर्म नष्ट हो गया। धर्म तो हो गया छुईमुई (लाजवन्ती)। यह
एक पौधा होता है। आप छू दें तो उसकी पत्तियाँ संकुचित हो जाती हैं और हाथ
हटाते ही पुनः विकसित हो जाती हैं। यह पौधा हाथ हटाने पर विकसित हो
जाता है; किन्तु धर्म तो ऐसा मुरझाया कि कभी विकसित नहीं होगा। वे मर
गये, सदा के लिये उनके राम, कृष्ण और परमात्मा मर गये। जो शाश्वत थे,
वे मर गये। वास्तव में वह शाश्वत के नाम पर कोई कुरीति थी, जिसे लोग धर्म
मान बैठे थे।
धर्म की शरण हम क्यों जाते हैं? क्योंकि हम मरणधर्मा (मरने-
जीनेवाले) हैं और धर्म कोई ठोस चीज है, जिसकी शरण जाकर हम भी अमर
हो जायें। हम तो मारने से मरेंगे और यह धर्म केवल छूने और खाने से मर
जायेगा, तो हमारी क्या रक्षा करेगा? धर्म तो आपकी रक्षा करता है, आपसे
शक्तिशाली है। आप तलवार से मरेंगे और धर्म? वह छूने से नष्ट हो गया। कैसा
है आपका धर्म? कुरीतियाँ नष्ट होती हैं, न कि सनातन। सनातन तो ऐसी ठोस
वस्तु है जिसे शस्त्र नहीं काटते, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे गीला नहीं
कर सकता। खानपान तो दूर, प्रकृति में उत्पन्न कोई वस्तु उसका स्पर्श भी नहीं
कर पाती तो वह सनातन नष्ट कैसे हो गया?