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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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द्वितीय अध्याय ३५
सर्वथा निरोध होना, अचल-स्थिर ठहरना और अन्तिम संस्कार का विलय
एक ही क्रिया है। संस्कारों की सतह का टूट जाना ही शरीरों का अन्त है। इसे
तोड़ने के लिये आपको आराधना करनी होगी, जिसे श्रीकृष्ण ने कर्म या
निष्काम कर्मयोग की संज्ञा दी है। श्रीकृष्ण ने स्थान-स्थान पर अर्जुन को युद्ध
की प्रेरणा दी; किन्तु एक भी श्लोक ऐसा नहीं है जो भौतिक युद्ध या मारकाट
का समर्थन करता हो। यह युद्ध सजातीय-विजातीय प्रवृत्तियों का है, अन्तर्देश
में है।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।१९।।
जो इस आत्मा को मारनेवाला मानता है तथा जो इस आत्मा को मरा
हुआ समझता है, वे दोनों ही आत्मा को नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न तो
मारता है और न मारा ही जाता है। पुनः इसी पर बल देते हैं-
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।२०।।
यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है और न मरता है; क्योंकि यह
वस्त्र ही तो बदलता है। न यह आत्मा होकर अन्य कुछ होनेवाला है; क्योंकि
यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी
इसका नाश नहीं होता। आत्मा ही सत्य है, आत्मा ही पुरातन है, आत्मा ही
शाश्वत और सनातन है। आप कौन हैं? सनातन-धर्म के अनुयायी। सनातन
कौन है? आत्मा। आप आत्मा के अनुयायी हैं। आत्मा, परमात्मा और ब्रह्म एक
दूसरे के पर्याय हैं। आप कौन हैं? शाश्वत-धर्म के उपासक। शाश्वत कौन है?
आत्मा। अर्थात् हम-आप आत्मा के उपासक हैं। यदि आप आत्मिक पथ को
नहीं जानते तो आपके पास शाश्वत-सनातन नाम की कोई वस्तु नहीं है।
उसके लिये आप आहें भरते हैं तो प्रत्याशी अवश्य हैं; किन्तु सनातनधर्मी नहीं
हैं। सनातन-धर्म के नाम पर किसी कुरीति के शिकार हैं।