यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
Page 51 of 429
Read in context१६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कूरूनिति।।२५।।
संजय बोला- निद्राजयी अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के
ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच भीष्म, द्रोण और 'महीक्षिताम्'-
शरीररूपी पृथ्वी पर अधिकार जमाये हुए सम्पूर्ण राजाओं के बीच उत्तम रथ
को खड़ा करके कहा- पार्थ! इन इकट्ठे हुए कौरवों को देख। यहाँ उत्तम रथ
सोने-चाँदी का रथ नहीं है। संसार में उत्तम की परिभाषा नश्वर के प्रति
अनुकूलता-प्रतिकूलता से की जाती है। यह परिभाषा अपूर्ण है। जो हमारे
आत्मा, हमारे स्वरूप का सदैव साथ दे, वही उत्तम है। जिसके पीछे 'अनुत्तम'-
मलिनता न हो।
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।२६।।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
इसके उपरान्त अचूक लक्ष्यवाले, पार्थिव शरीर को रथ बनानेवाले पार्थ
ने उन दोनों सेनाओं में स्थित पिता के भाइयों को, पितामहों को, आचार्यों को,
मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को, मित्रों को, श्वसुरों को और सुहृदों
को देखा।
दोनों सेनाओं में अर्जुन को केवल अपना परिवार, मामा का परिवार,
ससुराल का परिवार, सुहृद् और गुरुजन दिखायी पड़े। महाभारतकाल की
गणना के अनुसार अठारह अक्षौहिणी लगभग चालीस लाख के समकक्ष होता
है; किन्तु प्रचलित गणना के अनुसार अठारह अक्षौहिणी साढ़े छः अरब के
लगभग होता है, जो आज के विश्व की जनसंख्या के समकक्ष है। इतने मात्र के
लिये यदा-कदा विश्वस्तर पर आवास एवं खाद्य-समस्या बन जाती है। इतना
बड़ा जनसमूह अर्जुन के तीन-चार रिश्तेदारों का परिवार मात्र था। क्या इतना बड़ा
भी किसी का परिवार होता है? कदापि नहीं! यह हृदय-देश का चित्रण है।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।।२७।।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।