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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३७६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
किस दुर्गति को प्राप्त होता है? श्रीकृष्ण ने कहा (अध्याय ६/४०-४५)-
अर्जुन ! योग से चलायमान हुए शिथिल प्रयत्नवाले पुरुष का कभी विनाश नहीं
होता। वह योगभ्रष्ट श्रीमानों [‘शुचीनाम्’- शुद्ध (सत्य) आचरणवाले ही
श्रीमान हैं।] के यहाँ जन्म लेकर योगी-कुल में प्रवेश पा जाता है, साधन की
ओर आकर्षित होता है और अनेक जन्मों में चलकर वहीं पहुँच जाता है,
जिसका नाम परमगति अर्थात् परमधाम है। यह शिथिल प्रयत्न कौन करता है?
योगभ्रष्ट होकर वह कहाँ जन्म लेता है? गृहस्थ ही तो बना। वहीं से वह
साधनोन्मुख होता है। अध्याय ९/३० में उन्होंने कहा- अत्यन्त दुराचारी भी
यदि अनन्यभाव से मुझे भजने लगे तो वह साधु ही है; क्योंकि वह निश्चय के
साथ सही रास्ते पर लग गया है। अत्यन्त दुराचारी कौन होगा- जो भजन में
प्रवृत्त हो गया वह अथवा वह, जिसने अभी आरम्भ ही नहीं किया? अध्याय
९/३२ में कहा- स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनिवाले ही क्यों न हों, मेरे आश्रित
होकर साधन करने से परमगति पाते हैं। हिन्दू हो, ईसाई हो, मुसलमान हो-
श्रीकृष्ण ऐसा कुछ नहीं कहते, अत्यन्त दुराचारी पातकी ही क्यों न हों, मेरी
शरण होकर परमगति पाते हैं। अतः गीता मानवमात्र के लिये है। सद्गृहस्थ
आश्रम से ही इस कर्म का आरम्भ है। क्रमशः वही सद्गृहस्थ योगी बनता है,
पूर्ण त्यागी हो जाता है और तत्त्व का दिग्दर्शन कर परम में प्रवेश पा जाता है,
जिसे श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी मेरा स्वरूप है।
स्त्री- गीता के अनुसार शरीर एक वस्त्र है। जैसे पुराने वस्त्र को त्यागकर
मनुष्य नया वस्त्र धारण कर लेता है, ठीक इसी प्रकार भूतादिकों का स्वामी
आत्मा इस शरीररूपी वस्त्र को त्यागकर दूसरा शरीर (वस्त्र) धारण कर लेता
है। आप पिण्डरूप में स्त्री हों या पुरुष, ये वस्त्र के आकार हैं।
संसार में पुरुष दो प्रकार का है- क्षर और अक्षर। समस्त प्राणियों का
शरीर क्षर पुरुष अथवा परिवर्तनशील पुरुष है। मनसहित इन्द्रियाँ जब कूटस्थ
हो जाती हैं, तब वही अक्षर पुरुष है। उसका कभी विनाश नहीं होता। यह
भजन की अवस्था है।
स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, तो कभी अपमान की भावना समाज में
बनी ही रहती है; किन्तु गीता की अपौरुषेय वाणी में यह है कि शूद्र (अल्पज्ञ),