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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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श्रीकृष्ण जिस स्तर की बात करते हैं, क्रमशः चलकर उसी स्तर
पर खड़ा होनेवाला कोई महापुरुष ही अक्षरशः बता सकेगा कि श्रीकृष्ण
ने जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत
भाव क्या थे? मनोगत समस्त भाव कहने में नहीं आते। कुछ तो
कहने में आ पाते हैं, कुछ भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष
पर्याप्त क्रियात्मक हैं- जिन्हें कोई पथिक चलकर ही जान सकता है।
जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमशः चलकर उसी अवस्था को प्राप्त
महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। वह गीता की पंक्तियाँ
ही नहीं दुहराता, बल्कि उनके भावों को भी दर्शा देता है; क्योंकि जो
दृश्य श्रीकृष्ण के सामने था, वही उस वर्तमान महापुरुष के समक्ष भी
है। इसलिये वह देखता है, दिखा देगा; आपमें जागृत भी कर देगा, उस
पथ पर चला भी देगा।
'पूज्य श्री परमहंस जी महाराज' भी उसी स्तर के महापुरुष थे।
उनकी वाणी तथा अन्तःप्रेरणा से मुझे गीता का जो अर्थ मिला, उसी
का संकलन 'यथार्थ गीता' है।

  • स्वामी अड़गड़ानन्द