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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३४२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ।।३८।।
जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह यद्यपि भोगकाल
में अमृत के सदृश लगता है किन्तु परिणाम में विष के सदृश है; क्योंकि जन्म-
मृत्यु का कारण है, वह सुख राजस कहा गया है। तथा-
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।
जो सुख भोगकाल और परिणाम में भी आत्मा को मोह में डालनेवाला
है, निद्रा 'या निशा सर्वभूतानाम्'- जगत् की निशा में अचेत रखनेवाला है,
आलस्य और व्यर्थ की चेष्टाओं से उत्पन्न वह सुख तामस कहा गया है। अब
योगेश्वर श्रीकृष्ण गुणों की पहुँच बताते हैं, जो सबके पीछे लगे हैं-
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ।।४०।।
अर्जुन ! पृथ्वी में, आकाश में अथवा देवताओं में ऐसा कोई भी प्राणी
नहीं, जो प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुणों से रहित हो। अर्थात् ब्रह्मा से लेकर
कीट-पतंग यावन्मात्र जगत् क्षणभंगुर, मरने-जीनेवाला है, तीनों गुणों के
अन्तर्गत है अर्थात् देवता भी तीनों गुणों का विकार है, नश्वर है।
यहाँ बाह्य देवताओं को योगेश्वर ने चौथी बार लिया- अध्याय सात,
नौ, सत्रह तथा यहाँ अठारहवें अध्याय में। इन सबका एक ही अर्थ है कि
देवता तीनों गुणों के अन्तर्गत हैं। जो इन्हें भजता है, नश्वर की पूजा करता है।
भागवत के द्वितीय स्कन्ध में महर्षि शुक तथा परीक्षित का प्रसिद्ध
आख्यान है। जिसमें उपदेश देते हुए वे कहते हैं कि स्त्री-पुरुष में प्रेम के लिये
शंकर-पार्वती की, आरोग्य के लिये अश्विनीकुमारों की, विजय के लिये इन्द्र
की तथा धन के लिये कुबेर की पूजा करें। इसी तरह विविध कामनाएँ बताकर
अन्त में निर्णय देते हैं कि सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष के लिये तो
एकमात्र नारायण की पूजा करनी चाहिये। 'तुलसी मूलहिं सींचिए, फूलइ