यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context१५२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२०॥
जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध हुआ चित्त भी उपराम हो
जाता है, विलीन हो जाता है, मिट जाता है, उस अवस्था में 'आत्मना'– अपने
आत्मा के द्वारा 'आत्मानम्'– परमात्मा को देखता हुआ 'आत्मनि एव'–
अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। देखता तो परमात्मा को है लेकिन सन्तुष्ट
अपने ही आत्मा से होता है। क्योंकि प्राप्तिकाल में तो परमात्मा का साक्षात्कार
होता है, किन्तु दूसरे ही क्षण वह अपने ही आत्मा को उन शाश्वत ईश्वरीय
विभूतियों से ओतप्रोत पाता है। ब्रह्म अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और
अमृतस्वरूप है, तो इधर आत्मा भी अजर, अमर, शाश्वत, अव्यक्त और
अमृतस्वरूप है। है तो, किन्तु अचिन्त्य भी है। जब तक चित्त और चित्त की
लहर है, तब तक वह आपके उपभोग के लिये नहीं है। चित्त का निरोध और
निरुद्ध चित्त के विलयकाल में परमात्मा का साक्षात्कार होता है और दर्शन के
ठीक दूसरे क्षण उन्हीं ईश्वरीय गुणधर्मों से युक्त अपने ही आत्मा को पाता है,
इसलिये वह अपने ही आत्मा में सन्तुष्ट होता है। यही उसका स्वरूप है। यही
पराकाष्ठा है। इसी का पूरक अगला श्लोक देखें–
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१॥
तथा इन्द्रियों से अतीत केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने
योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और
जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भगवत्स्वरूप को तत्त्व से जानकर चलायमान
नहीं होता, सदैव उसी में प्रतिष्ठित रहता है तथा–
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥२२॥
परमेश्वर की प्राप्तिरूपी जिस लाभ को, पराकाष्ठा की शान्ति को प्राप्त
कर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और भगवत्प्राप्तिरूपी
जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता,