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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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१४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जिस पुरुष द्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है, उसके लिये
उसी का आत्मा मित्र है और जिसके द्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं
जीता गया है, उसके लिये वह स्वयं शत्रुता में बरतता है।
इन दो श्लोकों में श्रीकृष्ण एक ही बात कहते हैं कि अपने द्वारा अपने
आत्मा का उद्धार करें, उसे अधोगति में न पहुँचावें; क्योंकि आत्मा ही मित्र है।
सृष्टि में न दूसरा कोई शत्रु है, न मित्र। किस प्रकार? जिसके द्वारा मनसहित
इन्द्रियाँ जीती हुई हैं, उसके लिये उसी का आत्मा मित्र बनकर मित्रता में
बरतता है, परमकल्याण करनेवाला होता है और जिसके द्वारा मनसहित इन्द्रियाँ
नहीं जीती गयी हैं, उसके लिये उसी का आत्मा शत्रु बनकर शत्रुता में बरतता
है, अनन्त योनियों और यातनाओं की ओर ले जाता है। प्रायः लोग कहते हैं-
‘मैं तो आत्मा हूँ’। गीता में लिखा है, “न इसे शस्त्र काट सकता है, न अग्नि
जला सकती है, न वायु सुखा सकता है। यह नित्य है, अमृतस्वरूप है, न
बदलनेवाला है, शाश्वत है और वह आत्मा मुझमें है ही।” वे गीता की इन
पंक्तियों पर ध्यान नहीं देते कि आत्मा अधोगति में भी जाता है। आत्मा का
उद्धार भी होता है, जिसके लिये ‘कार्यम् कर्म’- करने योग्य प्रक्रिया-विशेष
करके ही उपलब्धि बतायी गयी है। अब अनुकूल आत्मा के लक्षण देखें-
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।७।।
सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में जिसके अन्तःकरण की
वृत्तियाँ भली प्रकार शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष में परमात्मा सदैव
स्थित है, कभी विलग नहीं होता। ‘जितात्मा’ अर्थात् जिसने मनसहित इन्द्रियों
को जीत लिया है, वृत्ति परमशान्ति में प्रवाहित हो गयी है, (यही आत्मा के
उद्धार की अवस्था है) आगे कहते हैं-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।८।।
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति अचल,
स्थिर और विकाररहित है, जिसने इन्द्रियों को विशेष रूप से जीत लिया है,