Skip to content
SarvaKosh
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 81 of 421

Read in context
Page 81

पूर्वार्ध छठा अध्याय
हे जल समूह! आप हमारे मन, वचन, प्राण को तृप्त कीजिए. आप हमारे नेत्रों व
कानों को तृप्त कीजिए. आप हमारी आत्मा, प्रजा को तृप्त कीजिए. आप हमारे पशुओं
व हमारे सेवकों को तृप्त कीजिए. हम आप के बिना कभी भी प्यासे न हों. ( ३१ )
इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवत ऽ इन्द्राय त्वादित्यवत ऽ इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने.
श्येनाय त्वा सोमभृतेग्नये त्वा रायस्पोषदे.. ( ३२)
हे सोम! हम इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम वसुमान के लिए
आप को ग्रहण करते हैं. हम रुद्र समान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम
आदित्य के समान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम शत्रुनाशक के लिए आप
को ग्रहण करते हैं. हे सोम! हम आप को पीने के लिए बाज की तरह झपटने वाले
इंद्र देव के लिए ग्रहण करते हैं.हम भरणपोषण कर्ता के लिए बाज की तरह ग्रहण
करते हैं. हम धनदाता, पोषणदाता अग्नि के लिए ग्रहण करते हैं. ( ३२ )
यत्ते सोम दिवि ज्योतिर्यत्पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे.
तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोचः.. ( ३३)
हे सोम! आप स्वर्गलोक व अंतरिक्षलोक तक फैले हुए हैं. आप दिव्य व
प्रकाशमान हैं. आप यजमान के लिए धन धारिए, धन दीजिए, आप यजमान की
सहायता कीजिए. ( ३३ )
श्वात्रा स्थ वृत्रतुरो राधोगूर्ता ऽ अमृतस्य पत्नीः.
ता देवीर्देवत्रेमं यज्ञं नयतोपहूताः सोमस्य पिबत.. ( ३४)
देवियां (सोम रूपी) अमृत की पत्नी हैं वे कल्याणकारी वृत्र नाशक व
धनदायक हैं. आप इस यज्ञ की रक्षा करें. आप इस यज्ञ का मार्ग निर्देशन करें. आप
इस यज्ञ में सोमरस का पान करने की कृपा करें. ( ३४ )
मा भेर्मा सं विक्था ऽ ऊर्जं धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूर्जं दधाथाम्.
पाप्मा हतो न सोमः.. ( ३५)
हे सोम! आप का रस निकालते समय आप को पत्थरों से कूटा जाता है. आप
उस से भयभीत मत होइए. आप चंद्रमा जैसे शीतल और समर्थ हैं. आप सब के पाप
और कपट दूर करने की कृपा कीजिए. ( ३५ )
प्रागपागुदगधराक्सर्वतस्त्वा दिश ऽ आधावन्तु.
अम्ब निष्पर समरीर्विदाम्.. (३६)
हे सोम! आप पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशा में अपने भाग को ग्रहण
कर के दौड़ते हुए यज्ञ में आइए. आप इस तरह यज्ञ को भलीभांति जानने की कृपा
कीजिए. ( ३६ )
यजुर्वेद - ८१