Skip to content
SarvaKosh
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 75 of 421

Read in context
Page 75

पूर्वार्ध छठा अध्याय
ब्राह्मणों व क्षत्रियों आदि को यथायोग्य धन और पोषण देते हैं. आप ब्राह्मणों,
क्षत्रियों और वैश्यों को धन व संतान दीजिए. ( ३ )
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (४)
हे यजमानो! हम विष्णु से जुड़ें. हम उन के मित्र हो जाएं. उन के कामों को
देखें. हम उन के व्रतों का पालन करें. ( ४ )
तद्विष्णोः परमं पद १४ सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (५)
शूरवीर सदैव विष्णु का परम पद स्वर्गलोक में छाए हुए प्रकाश के समान
देखते हैं. ( ५ )
परिवीरसि परि त्वा दैवीर्विशो व्ययन्तां परीमं यजमान १४ रायो मनुष्याणाम्.
दिवः सूनुरस्येष ते पृथिव्याँल्लोक ऽ आरण्यस्ते पशुः.. (६)
हे यज्ञ देव! आप सर्वव्यापक हैं. यजमान आप को कणकण में देखते हैं. आप
दिन के पुत्र की तरह व्याप्त हैं. पृथ्वीलोक, वन प्रदेश, व पशु भी आप का ही
विस्तार है. आप मनुष्यों को धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ६ )
उपावीरस्युप देवान्दैवीर्विशः प्रागुरुशिजो वह्नितमान्.
देव त्वष्टर्वसु रम हव्या ते स्वदन्ताम्.. (७)
हे त्वष्टा देव! आप सर्जक हैं. आप समीप आए हुए की रक्षा करते हैं. आप की
कृपा से प्रजा श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हो जाए. आप दिव्य गुण संपन्न, तेजस्वी व समर्थ
हैं. ये सभी गुण आप की कृपा से विद्वानों को प्राप्त हों. हम आप को रमणीय हवि
प्रदान कर रहे हैं. आप उस का आस्वादन करने की कृपा कीजिए. ( ७ )
रेवती रमध्वं बृहस्पते धारया वसूनि.
ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रतिमुञ्चामि धर्षा मानुषः.. (८)
यज्ञ के आचार्यों ने उत्तम कोटि की हवि के लिए विशाल धाराओं के रूप में
धन देने वाले जिन पशुओं को बांधा, उन पशुओं को अब हम मुक्त करते हैं. वे पशु
हमें और हमारे यज्ञ के लिए दूध आदि के रूप में धन धारण करते रहें. हम समर्थ
बनें. ( ८ )
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
अग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मि.
अद्भ्यस्त्वौषधीभ्योनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्योनु सखा सयूथ्यः.
अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि.. (९)
सविता देव की कृपा से हम अश्विनीकुमारों व पूषा देव को दोनों बाहुओं से
यजुर्वेद - ७५