यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध पांचवां अध्याय
हैं. आप शत्रुओं से युद्ध करें. आप विद्वान् हैं. बारंबार आप को नमस्कार करते हैं.
बारबार आप के लिए स्तोत्र उचारते हैं. हम आप से यज्ञ की रक्षा का निवेदन करते
हैं. ( ३६ )
अयं नो अग्निर्वकिवृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्.
अयं वाजाञ्जयतु वाजसातावय ९४ शत्रूञ्जयतु जर्हषाणः स्वाहा.. ( ३७)
यह अग्नि हमें वरण करने योग्य धन प्रदान करें. यह शत्रु नाश करते हुए हमारे
सम्मुख पधारें. यह हमारे लिए अन्न जीतें. हमारे लिए बल जीतें. यह हमारे लिए
शत्रुओं से जीतें. यह हमारी आहुति स्वीकारने की कृपा करें. ( ३७ )
उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि.
घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा.. ( ३८ )
अग्नि व्यापक, बलशाली व शत्रुनाशी हैं. वे मनुष्य को पराक्रमी बनाएं. वे घृत
योनि हैं. वे घृत पीने व यजमान की बढ़ोत्तरी करने की कृपा करें. ( ३८ )
देव सवितरेष ते सोमस्त ९४ रक्षस्व मा त्वा दभन्.
एतत्त्वं देव सोम देवो देवां २ उपागा ऽ इदमहं मनुष्यान्सह रायस्पोषेण स्वाहा
निर्वरुणस्य पाशान्मुच्ये.. ( ३९)
ये सविता हैं. यह सोम आप को भेंट किया जा रहा है. आप इस की रक्षा करने
की कृपा कीजिए. आप को राक्षस कष्ट न पहुंचा पाएं. यह सोम दिव्यता को पा
कर देवता से अधिष्ठित हैं. आप की कृपा से हम भी दिव्यता, धन व पशु प्राप्त करें.
आप के लिए स्वाहा. आप को प्रदान की गई आहुति से हम वरुण के पाश से मुक्त
हो चुके हैं. ( ३९ )
अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपा या तव तनूर्मय्यभूदेषा सा त्वयि यो मम तनूस्त्वय्यभूदिय ९४ सा
मयि.
यथायथं नौ व्रतपते व्रतान्यनु मे दीक्षां दीक्षापतिरम ९४ स्तानु तपस्तपस्पतिः.. (४०)
हे अग्नि! आप व्रतपालक हैं. आप हमारे व्रत की रक्षा करने की कृपा करें. व्रत
करने से हमारा शरीर आप के शरीर जैसा हो जाए. आप के शरीर से एकाकार हो
जाए. आप जिस तरह यथायोग्य श्रेष्ठ कार्यों का संपादन करते हैं, उसी तरह हमारे
श्रेष्ठ कार्यों का संपादन करने की कृपा करें. आप दीक्षापति हैं. आप हमें दीक्षित
करने की कृपा कीजिए. आप तपपति हैं. आप हमारे तप को स्वीकार करने की
कृपा कीजिए. ( ४० )
उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि.
घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा.. (४१)
हे अग्नि! आप बहुत व्यापक हैं. आप अतीव पराक्रमी हैं. आप शत्रुनाश हेतु
७२ - यजुर्वेद