यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध पांचवां अध्याय
आदित्य को प्रसन्न करने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप
ब्राह्मणों को प्रसन्न करने वाली हैं. आप सिंहिनी हैं, आप क्षत्रियों को प्रसन्न करने
वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी रूप हैं. आप अच्छी संतान देने व धन
देने वाली हैं. आप के लिए स्वाहा. आप सिंहिनी हैं. आप यजमान के लिए देवताओं
का आह्वान करने वाली हैं. प्राणियों के लिए आप को यह आहुति समर्पित है. ( १२ )
ध्रुवोसि पृथिवीं दृ ँह ह ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षं दृ ँह हाच्युतक्षिदसि दिवं दृ ँह हाग्नेः
पुरीषमसि.. (१३)
हे मध्यम परिधि! आप पृथ्वी को स्थिर करने की कृपा करें. आप स्थिर व
अंतरिक्षवासी हैं. आप अंतरिक्ष को स्थिर बनाने की कृपा कीजिए. उत्तरवेदिका स्वर्ग
स्वरूप है. स्वर्गलोक को स्थिर बनाने की कृपा करें. हे अग्नि! आप सुगंधित वस्तुओं
से स्वर्गलोक को सुगंधित करने की कृपा करें. ( १३ )
युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः.
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा.. (१४)
ब्राह्मण यजमान अपना मन अपनी बुद्धि तथा सब कामों से अपने को हटा कर
यज्ञ में लगाते हैं. होता यज्ञ को विशेष रूप से धारते हैं. सविता देव जाग्रत हैं. प्रशंसा
प्राप्त हैं. सविता देव को सर्वविध अनुकूल करना चाहते हैं. सविता देव के लिए
स्वाहा. ( १४ )
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्. समूढमस्य पा ँह सुरे स्वाहा.. (१५)
यह विष्णु विशेष रूप से सर्वत्र भ्रमण करते हैं ( अर्थात् सर्वव्यापक हैं ). विष्णु
तीन प्रकार से तीन पैर धारण करते हैं यानी सब लोक इन के तीन पैरों में समाए
हुए हैं. इन की चरणरज में लोक समाए हैं. विष्णु के लिए स्वाहा. ( १५ )
इरावती धेनुमती हि भूत ँह सुयवसिनी मनवे दशस्या.
व्यस्कभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः स्वाहा.. (१६)
पृथ्वी धनवती व गोवती है. पृथ्वी यज्ञ साधन देने वाली है. विष्णु ने पृथ्वी को
स्वर्गलोक से अलग कर के स्थिर बनाया है. उन्होंने किरणों से पृथ्वी को पूरी तरह
व्याप्त किया है. पृथ्वी के लिए स्वाहा. ( १६ )
देवश्रुतौ देवेष्वा घोषतं प्राची प्रेतमध्वरं कल्पयन्ती ऊर्ध्वं यज्ञं नयतं मा जिह्वरतम्.
स्वं गोष्ठमा वदतं देवा दुर्ये आयुर्मा निर्वादिष्टं प्रजां मा निर्वादिष्टमत्र रमेथां वर्ष्मन्
पृथिव्याः.. (१७)
हे देवो! आप दिव्य विधाओं में दक्ष हैं. आप देवताओं की सभा में यह घोषणा
करने की कृपा करें कि देवगण यज्ञ को पूर्व दिशा में पहुंचाते हैं. वे यज्ञ को इष्ट
यजुर्वेद - ६७