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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 51 of 421

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Page 51

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे ब्रह्मणस्पति! आप हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. हम पर धूर्त, अयज्ञी
( यज्ञ न करने वालों ) लोगों का बुरा असर न हो. ( ३० )
महि त्रीणामवोस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः. दुराधर्षं वरुणस्य.. (३१)
मित्र देवता, अर्यमन देवता और दुर्धर्ष ( प्रबल प्रतापी ) वरुण तीनों देव हमारी
रक्षा करने की कृपा करें. ( ३१ )
नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु. ईशे रिपुरघश ᳪ सः.. (३२)
राह, कठिन स्थान और घर आदि स्थानों में भी तीनों देवों की कृपा से पापी
शत्रु असर नहीं डाल सकता. ( ३२ )
ते हि पुत्रासो अदितेः प्र जीवसे मर्त्याय. ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्.. (३३)
वे तीनों देव अदिति देव के पुत्र हैं. वे मनुष्यों को दीर्घ जीवन और कभी क्षीण
न होने वाली ज्योति प्रदान करते हैं. ( ३३ )
कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे.
उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते.. (३४)
हे इंद्र! आप अहिंसक हैं. यजमान हविदाता हैं. यजमान की धनदान से सेवा करते
हैं. आप ऐश्वर्य से युक्त हैं. आप यजमान को अधिक धन दान करने वाले हैं. ( ३४ )
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (३५)
सविता वरण करने योग्य व सौभाग्यवान हैं. हम उन की बुद्धिपूर्वक उपासना
करते हैं. वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करने की कृपा करें. ( ३५ )
परि ते दूडभो रथोस्माँ २ अश्नोतु विश्वतः. येन रक्षसि दाशुषः.. (३६)
हे देवगण! आप चारों ओर से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. हे देवगण! आप
का रथ हमारी रक्षा करने की कृपा करे. हे देवगण! आप चारों ओर से हमारी रक्षा
करने की कृपा करें, ताकि हमारे धन की रक्षा हो सके. ( ३६ )
भूर्भुवः स्वः सुप्राजाः प्रजाभिः स्या ᳪ सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.
नर्य प्रजां मे पाहि श ᳪ स्य पशून्मे पाह्यर्थर्य पितुं मे पाहि.. (३७)
हे अग्नि! हम अच्छी संतान और अच्छे वीरों वाले हो जाएं. हम सुवीरों का अच्छे
अन्न से पोषण करें. आप हमारी संतान, हमारे पशुओं व पालक की रक्षा करने की
कृपा करें. ( ३७ )
आ गन्म विश्ववेदसमस्मभ्यं वसुवित्तमम्.
अग्ने सम्राडभि द्युम्नमभि सह ऽ आ यच्छस्व.. ( ३८)
यजुर्वेद - ५१