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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 44 of 421

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पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
समर्पित करते हैं. कुश के समूह विश्व के साथ दिव्य नभ, अरिष्यगण व वसुगणों के
साथ दिव्य नभ तक जाएं. उन के लिए स्वाहा. ( २२ )
कस्त्वा विमुञ्चति स त्वा विमुञ्चति कस्मै त्वा विमुञ्चति तस्मै त्वा विमुञ्चति.
पोषाय रक्षसां भागोसि.. (२३)
कौन आप को छोड़ता है ? किसलिए आप को छोड़ता है ? वह आप को अन्य
( याजकों और उन के परिजनों ) के लिए छोड़ता है. जो भाग अवशिष्ट है, वह
राक्षसों के पोषण के लिए है. ( २३ )
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं ४श शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (२४)
हम वर्चस्वी हों. हम दूध से अपने तन को पोषित करें. हमारे मन कल्याणमयी
भावनाओं से युक्त हों. हमारे लिए धन धारण करने की कृपा करें. हमारे शरीर में
जो भी कमी हो, वह पूरी करने की कृपा करें. ( २४ )
दिवि विष्णोर्व्यक्र ४श स्त जागतेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मोन्तरिक्षे विष्णोर्व्यक्र ४श स्त त्रैष्टुभेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मः पृथिव्यां विष्णोर्व्यक्र ४श स्त गायत्रेण छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मोस्मादन्नादस्यै प्रतिष्ठाया ऽ अगन्म स्वः सं ज्योतिषाभूम.. (२५)
विष्णु ने जगती छंद से स्वर्गलोक में पूरा भ्रमण किया है. उन्होंने जो हम से द्वेष
करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन का नाश कर दिया है. उन्होंने त्रिष्टुप् का नाश
कर दिया है. वे गायत्री छंद पृथ्वी से समाप्त करने की कृपा करें. अन्न से ऐसे शत्रुओं
को हटा दिया गया है. हम स्वर्गलोक को पाएं तथा ज्योति संपन्न हो जाएं. ( २५ )
स्वयंभूरसि श्रेष्ठो रश्मिर्वर्चोदा ऽ असि वर्चो मे देहि. सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते.. (२६)
आप स्वयं भू, श्रेष्ठ भू, किरणमय भू व वर्चस्वी भू हैं. हम सूर्य की परिक्रमा
के अनुसार ही परिक्रमा करते हैं. ( २६ )
अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाग्नेहं गृहपतिना भूयास ४श सुगृहपतिस्त्वं मयाग्ने
गृहपतिना भूयाः.
अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु शत ४श हिमाः सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते.. (२७)
हे अग्नि! आप घर के व अच्छे के स्वामी हैं. आप की कृपा से हम भी गृहपति
व अच्छे गृहपति बनें. आप की कृपा से हम भी बारंबार अच्छे गृहपति बनें. हम अच्छे
गृहस्थ हों. हम सौ वर्षों तक यज्ञ कर्म करें. हम सूर्य की परिक्रमा के अनुरूप
अनुशासन का पालन करें. ( २७ )
अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं तदशकं तन्मेराधी दमहं य ऽ एवास्मि सोस्मि.. (२८)
४४ - यजुर्वेद