यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध पहला अध्याय
जनयत्यै त्वा संद्यौमीदमग्नेरिदमग्नीषोमयोborderरेषे त्वा घर्मोसि विश्वायुरुरुप्रथा ऽ उरु
प्रथस्वोरु ते यज्ञपतिः प्रथतामग्निष्टे त्वचं मा हि १७ सीद्देवस्त्वा सविता श्रपयतु
वर्षिष्ठेधि नाके.. (२२)
पानी और पिसे हुए चावल को मिलाया जाता है. फिर उसे अग्नि में पकाया
जाता है. इस क्रिया से पुरोडाश (यज्ञ में आहुति देने के लिए पकाई गई टिकिया)
बनाया जाता है. पुरोडाश यजमान को दीर्घायु व ऊर्जस्वी बनाता है. वह यजमान के
यश को और फैलाता है. उसे अग्नि और सोम के लिए तैयार किया जाता है. सविता
देव स्वर्गलोक की अग्नि से पुरोडाश पकाने की कृपा करें. (२२)
मा भेर्मा संविक्था ऽ अतमेरुर्यज्ञोतमेरुर्यजमानस्य प्रजा भूयात् त्रिताय त्वा
द्विताय त्वैकताय त्वा.. (२३)
हे मनुष्यो! डरो मत. पीछे मत हटो. यज्ञ कार्य यजमान को संकट मुक्त करने
वाला होता है. एक गुनी, दो गुनी और तीन गुनी कितनी ही प्रजा हो सभी को संकट
मुक्त करने वाला होता है. (२३)
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
आददेध्वरकृतं देवेभ्य ऽ इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणः सहस्त्रभृष्टिः शततेजा वायुरसि
तिग्मतेजा द्विषतोवधः.. (२४)
हे सविता! आप दुनिया के लिए प्रकाश फैलाते हैं. हम अश्विनी देव की बाहुओं
और पूषा देव के हाथों से आप को धारण करते हैं. हम देवताओं की तृप्ति के लिए
यज्ञ करते हैं. आप इंद्र देव की दाहिनी भुजा हैं. आप अपने तेज से हजारों विकारों
को जला देने वाले वायु हैं. आप अत्यंत प्रकाश युक्त व तीक्ष्ण तेजवान हैं. आप
दोषियों का नाश करने की सामर्थ्य रखते हैं. (२४)
पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं मा हि १७ सिषं व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान
देव सवितः परमस्यां पृथिव्या १७ शतेन पाशैर्योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा
मौक्.. (२५)
हे पृथ्वी माता (देव)! आप में उपजने वाली ओषधियों को हमारे कारण
नुकसान न पहुंचे. देवताओं के लिए हवन किया जा रहा है. उस के लिए (खोद
कर) मिट्टी हटाई गई है. हे मिट्टी! आप गायों के बाड़े में जाइए. स्वर्गलोक आप
पर अपनी कृपा बरसाए. हे सविता! आप पृथ्वी पालक हैं. आप हम से द्वेष करने
वालों को अपने सैकड़ों पाशों से बांध दीजिए व उन्हें मुक्त मत कीजिए. (२५)
अपाररुं पृथिव्यै देवयजनाद्वध्यासं व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः
परमस्यां पृथिव्या १७ शतेन पाशैर्योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक्.
अररो दिवं मा पप्तो द्रप्सस्ते द्यां मा स्कन् व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान
३६ - यजुर्वेद