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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 352 of 421

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Page 352

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय
हे बाण! आप सरल रहिए. आप हम पर मत गिरिए. हमारे तन पत्थर की तरह
सख्त हो जाएं. सोम देव हमारी ओर बोलें. अदिति देव हमें सुख देने की कृपा
करें. (४९)
आ जङ्घन्ति सान्वेषां जघनाँ २ उप जिघ्नते.
अश्वाजनि प्रचेतसोश्वान्तसमत्सु चोदय.. (५०)
हे अश्व प्रेरक! चाबुक आप घोड़ों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें. चेते हुए मन
वाले घुड़सवार घोड़ों के उभरे अंग पर चोट करते हैं. उन के पुट्ठों पर चाबुक
चलाते हैं. चाबुक घोड़ों को प्रेरित करने वाले हों. (५०)
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः.
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमा ँस् सं परि पातु विश्वतः.. (५१)
सांप की तरह बाहु से लिपटता है. प्रत्यंचा के प्रहार को हटाता है. विद्वान्
वीर पुरुष सब की सब ओर से रक्षा करता है. वीर सभी शत्रुओं को मार कर रक्षा
करता है. (५१)
वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया ऽ अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः.
गोभिः सन्नद्धो असि वीडयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि.. (५२)
रथ वनस्पति (लकड़ी) से बना हुआ है. रथ हमारा मित्र हो. सुवीर इस के
द्वारा युद्ध में पार पाए. हम गायों से जुड़े रहें. हम वीरतापूर्वक स्थित रहें. वीर सभी
को जीत सकें. (५२)
दिवः पृथिव्याः पर्योज उद्धृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृत ँस् सहः.
अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्र ँस् हविषा रथं यज.. (५३)
हे पुरोहितो! आप स्वर्ग और पृथ्वी के तेज को सर्वत्र फैलाइए. वनस्पति से उगे
प्राप्त हुए तेज को सर्वत्र फैलाइए. जल के साथ प्राप्त हुए तेज को सर्वत्र फैलाइए.
इंद्र के वज्र की तरह हम रथ को यज्ञीय कार्य में लगाएं. रथ सूर्य की किरणों के
समान चमकता है. (५३)
इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः.
सेमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय.. (५४)
हे रथ! आप दिव्य, इंद्र के वज्र जैसे व मरुतों की सैन्यशक्ति की भांति दृढ़ हैं.
आप मित्र देव के गर्भ व वरुण देव की नाभि हैं. रथ में बैठे देवता हमारे द्वारा भेंट
किए गए हवि को ग्रहण कर के तृप्त होने की कृपा करें. (५४)
उप श्वासय पृथिवीमुत द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्.
स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्.. (५५)
३५२ - यजुर्वेद 632/22