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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 335 of 421

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Page 335

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय
होता यक्षदोजो न वीर्य १७ सहो द्वार ऽ इन्द्रमवर्धयन्.
सुप्रायणा ऽ अस्मिन्यज्ञे वि श्रयन्तामृतावृधो द्वार ऽ
इन्द्राय मीढुषे व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (५)
होता ने इंद्र देव हेतु यज्ञ किया. उन्होंने उन की बढ़ोत्तरी की एवं उन के ओज
और वीर्य की बढ़ोत्तरी की. इस यज्ञ में यज्ञ को बढ़ाने वाले द्वार की ओर देवता
अच्छी तरह प्रयाण करें. वे इच्छापूर्ति करने वाले हैं. वे यज्ञ में पधारें. अमृत स्वरूप
हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. हम उन के लिए यज्ञ करते हैं. होता उन के लिए
यज्ञ कीजिए. ( ५ )
होता यक्षदुषे इन्द्रस्य धेनू सुदुघे मातरा मही.
सवातरौ न तेजसा वत्समिन्द्रमवर्धतां वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (६)
इंद्र देव के लिए पृथ्वि मां जैसी है, अच्छे दूधवाली गायों जैसी है. होता ने महान्
उन के लिए पवित्र यज्ञ किया. होता ने अपने तेज से उन की बढ़ोत्तरी की. जैसे मां
के प्यार से बच्चा दृढ़ बनता है, वैसे ही वे हवि से दृढ़ हों. होता ! आप उन के लिए
यज्ञ कीजिए. ( ६ )
होता यक्षदैव्या होतारा भिषजा सखाया हविषेन्द्रं भिषज्यतः.
कवी देवौ प्रचेतसाविन्द्राय धत्त ऽ इन्द्रियं वीतामाज्यस्य होतर्यज.. (७)
अश्विनीकुमार दिव्य, भिषगाचार्य ( चिकित्सक ) हमारे सखा, इंद्र देव के वैद्य
और कवि हैं. वे श्रेष्ठ चित्त वाले हैं. इंद्र देव के लिए स्वास्थ्य धारण करते हैं. होता
देवों ने अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ किया. अश्विनीकुमार हवि ग्रहण करने की
कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ७ )
होता यक्षत्तिस्रो देवीर्न भेषजं त्रयस्त्रिधातवो ऽ पस ऽ इडा सरस्वती भारती मही:.
इन्द्रपत्नीर्हविष्मतीर्व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (८)
होता ने इड़ा, सरस्वती व भारती के लिए यज्ञ किया. तीनों देवियों के लिए
होता ने यज्ञ किया. ये तीनों देवियां तीनों लोकों में तीनों ऋतुओं को धारण करने
वाले इंद्र देव की आज्ञा का पालन करती हैं. ये तीनों देवियां ओषधि युक्त हैं. तीनों
देवियां हविष्मती हों. यजमान इन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ८ )
होता यक्षत्त्वष्टारमिन्द्रं देवं भिषज १७ सुयजं घृतश्रियम्.
पुरुरूप १७ सुरेतसं मघोनमिन्द्राय त्वष्टा दधदिन्द्रियाणि वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (९)
त्वष्टा देव वैभववान, दानी, रोगनाशक, श्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता, शोभाधारी व अनेक
रूप वाले हैं. उत्तम वीर्य वाले धनवान त्वष्टा ने इंद्र के लिए शक्तियां धारीं. त्वष्टा
देव हवि ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. ( ९ )
यजुर्वेद – ३३५