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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 33 of 421

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Page 33

पूर्वार्ध पहला अध्याय
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्चिनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
अग्नये जुष्टं गृह्णाम्यग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि.. (१०)
हे परमेश्वर! आप ने सविता देव और अन्य देवों को जना है. अश्विनी देव बाहु
से हवि ग्रहण करते हैं. पूषा देव हाथों से हवि ग्रहण करते हैं. अध्वर्यु ( पुरोहित )
अग्नि की ( को भेंट करने के लिए ) प्रिय हवि ग्रहण करते हैं. पुरोहित अग्नि और
सोम को भेंट करने के लिए उन्हें प्रिय लगने वाले पदार्थ ही ग्रहण करते हैं. ( १० )
भूताय त्वा नारातये स्वरभिविख्येषं दृ ઽ हथं हन्तां दुर्याः पृथिव्यामुर्वन्तरिक्षमन्वेमि.
पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या ऽ उपस्थेग्ने हव्य ઽ हथं रक्ष.. (११)
हे अग्नि! आप अदिति के पुत्र हैं. यज्ञकुंड पृथ्वी ( माता ) की नाभि है. उस में
हम ने हवि स्थापित की है. आप उस हवि की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप
को मनुष्य के कल्याण के लिए स्थापित किया गया है. हमें अपने में व्याख्यायित
( मौजूद ) परम शक्ति का अनुभव हो. दुष्टों का विनाश हो. हम अंतरिक्ष और पृथ्वी
पर बिना किसी बाधा के घूमफिर ( विचर ) सकें. ( ११ )
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पूनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः.
देवीरापो अग्रेगुवो अग्रेपुवो ग्र ऽ इममद्य यज्ञं नयताग्रे यज्ञपति ઽ हथं सुधातुं यज्ञपतिं
देवयुवम्.. (१२)
हे जल देव! इंद्र ने वृत्र का नाश करने के लिए ( सहयोग हेतु ) आप को चुना.
आप ने वृत्रासुर के नाश में इंद्र का वरण किया. आप ने वृत्रासुर के नाश में इंद्र का
सहयोग किया. आप अग्नि के प्रिय हैं. हम अग्नि के लिए आप को परिष्कृत
( शुद्ध ) करते हैं. आप सोम के प्रिय हैं. हम सोम के लिए आप को परिष्कृत करते
हैं. हम देवताओं से संबंधित कार्यों के लिए आप को शुद्ध करते हैं. ( १२ )
युष्मा इन्द्रोवृणीत वृत्रतूर्ये यूयमिन्द्रमवृणीध्वं वृत्रतूर्ये प्रोक्षिताः स्थ.
अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षाम्यग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि. दैव्याय कर्मणे शुन्धध्वं
देवयज्यायै यद्वोशुद्धाः पराजघ्नुरिदं वस्तच्छुन्धामि.. (१३)
हे जल देव! हम देव संबंधी यज्ञ कार्यों के लिए आप को शुद्ध करते हैं. यज्ञ
के अशुद्ध उपकरण भी ग्रहण करने योग्य नहीं होते. अशुद्ध जल भी यज्ञ में ग्रहण
नहीं किया जाता. ( १३ )
शर्मास्यवधूत ઽ हथं रक्षोवधूता ऽ अरातयो दित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु.
अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुध्नः प्रति त्वादित्यास्त्वग्वेत्तु.. (१४)
सुख के आसन से राक्षसों, दुष्टों व दैत्यों को दूर कर दिया गया है. आसन
पृथ्वी पर आवरण है. पृथ्वी माता उस आसन को स्वीकार करने की कृपा करें. आप
पत्थर की तरह मजबूत हैं. आप का आधार भी पत्थर की तरह मजबूत है. आप
यजुर्वेद - ३३