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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 327 of 421

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Page 327

सत्ताईसवां अध्याय
समास्त्वाग्न ऽ ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऽ ऋषयो यानि सत्या.
सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा ऽ आ भाहि प्रदिशश्चतस्रः.. (१)
हे अग्नि! सत्यवादी ऋषिगण हर माह, ऋतु व वर्ष में आप की बढ़ोतरी करते
हैं. आप अपनी दिव्यता दीजिए. आप संसार को आलोकित व चारों दिशाओं और
उपदिशाओं को आभासित करने की कृपा कीजिए. ( १ )
सं चेध्यस्वाग्ने प्र च बोधयैनमुच्च तिष्ठ महते सौभगाय.
मा च रिषदुपसत्ता ते अग्ने ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये.. (२)
हे अग्नि! आप यजमान को चेताइए व जगाइए! आप ऊंचे आसन पर विराजिए.
आप हमें सौभाग्य प्रदान कीजिए. आप हमें अपनी उपसत्ता और हम ब्राह्मणों को
अपना वह यश प्रदान कीजिए. आप हमें मान्यता प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २ )
त्वामग्ने वृणते ब्राह्मणा ऽ इमे शिवो अग्ने संवरणे भवा नः.
सपत्नहा नो अभिमातिजिच्च स्वे गये जागृह्यप्रयुच्छन्.. (३)
हे अग्नि! ब्राह्मण आप का वरण करते हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी
होइए. आप हमारे शत्रुओं का संवरण कीजिए. आप शत्रुओं पर हमें जिताइए.
आप की कृपा से हम अपने घर में आलस्य रहित हो कर जागते रहें. ( ३ )
इहैवाग्ने अधि धारया रयिं मा त्वा नि क्रन्पूर्वचितो निकारिणः.
क्षत्रमग्ने सुयममस्तु तुभ्यमुपसत्ता वर्धतां ते अनिष्टतः.. (४)
हे अग्नि! आप इधर पधारिए. आप हमारे लिए धन धारण करिए. यजमान आप
की आज्ञा का उल्लंघन न करें. क्षत्रिय भी आप के वश में हो जाएं. आप की
उपासना में बढ़ोतरी हो. आप के भक्त अविनाशी हों. आप उन की बढ़ोतरी करने
की कृपा कीजिए. ( ४ )
क्षेत्रेणाग्ने स्वायुः स १४ रभस्व मित्रेणाग्ने मित्रधेये यतस्व.
सजातानां मध्यमस्था ऽ एधि राज्ञामग्ने विहव्यो दीदिहीह.. (५)
यजुर्वेद - ३२७