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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 303 of 421

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Page 303

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
पूछते हैं. हम यजमान आप से पूछते हैं कि घोड़ों के वीर्य का बल कौन है. हम
यजमान पूछते हैं कि वाणी का परम व्योम क्या है ? ( ६१ )
इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या ऽ अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः.
अय १४ सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम.. ( ६२ )
यह वेदी पृथ्वी का परम अंत है. यह यज्ञ की नाभि है. यह सोम अश्व के वीर्य
का बल है. ब्रह्मा वाणी का परम व्योम है. ( ६२ )
सुभूः स्वयम्भूः प्रथमोन्तर्महत्यर्णवे.
दधे ह गर्भमृत्वियं यतो जातः प्रजापतिः.. ( ६३ )
परमात्मा स्वयं उत्पन्न होने वाले हैं. उन्होंने सारे संसार को उपजाया है.
सर्वप्रथम उन्होंने महान् अर्णव ( समुद्र ) में गर्भ धारा. उस गर्भ से प्रजापति ब्रह्मा
उत्पन्न हुए. ( ६३ )
होता यक्षत्प्रजापति १४ सोमस्य महिम्नः.
जुषतां पिबतु सोम १४ होतर्यज.. ( ६४ )
होता ने महिमाशालि सोम से प्रजापति का यजन किया. प्रजापति से निवेदन है
कि प्रजापति उस सोमरस को पीने की कृपा करें. आप होताओं से भी निवेदन है
कि आप भी ऐसा ही यजन करने की कृपा करें. ( ६४ )
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वय १४ स्याम पतयो रयीणाम्.. ( ६५ )
हे प्रजापति! आप के अलावा कोई दूसरा उतने विश्व रूपों वाला नहीं हो
सकता. हम जिस कामना से यज्ञ करते हैं, हमारी वह कामना पूर्ण हो. हम धनों के
स्वामी हो जाएं. ( ६५ )
यजुर्वेद - ३०३