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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 278 of 421

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Page 278

उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
होता यक्षदश्विनौ छागस्य वपाया मेदसो जुषेता ꣳ हविर्होतर्यज.
होता यक्षत्सरस्वती मेषस्य वपाया मेदसो जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.
होता यक्षदिन्द्रमृषभस्य वपाया मेदसो जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४१)
होता ने अश्विनीकुमारों के लिए छाग के मेद से यज्ञ किया. आप भी ऐसी ही
हवि से यज्ञ करने की कृपा कीजिए. होता ने सरस्वती देवी के लिए मेष के मेद से
यज्ञ किया. आप भी ऐसी ही हवि से यज्ञ करने की कृपा करें. होता इंद्र की
प्रसन्नता हेतु ऋषभ की वसा को स्थापित करते हैं. होता सब के कल्याण हेतु ऐसा
यज्ञ करें. ( ४१ )
होता यक्षदश्विनौ सरस्वतीमिन्द्र ꣳ सुत्रामाणमिमे सोमाः सुरामाणश्छागैर्न मेषैर्ऋषभैः
सुताः शष्पैर्न तोक्मभिर्लाजैर्महस्वन्तो मदा मासरेण परिष्कृताः शुक्राः पयस्वन्तोमृताः
प्रस्थिता वो मधुश्चुतस्तानश्विना सरस्वतीन्द्रः सुत्रामा वृत्रहा जुषन्ता ꣳ सोम्यं मधु
पिबन्तु मदन्तु व्यन्तु होतर्यज.. (४२)
होता ने अश्विनीकुमारों के लिए सुंदर छागों ( ओषधि ) से यजन किया. होता
ने वैभवशाली इंद्र देव के लिए ऋषभों से यजन किया. होता ने सरस्वती देवी के
लिए इन ओषधियों से यजन किया. यजमान देवों के लिए धान, खील, परिष्कृत
रसीला मधु चुआने वाला सोम आदि भेंट करते हैं. दोनों अश्विनीकुमार, वैभववान
वृत्र नाशक इंद्र देव, सरस्वती देवी इस मधुर सोमरस को पीएं. मदमस्त हों. हे होता!
आप भी ऐसा ही यज्ञ कीजिए. ( ४२ )
होता यक्षदश्विनौ छागस्य हविष ऽ आत्तामद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः
पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तां नूनं घासे अज्राणां यवसप्रथमाना ꣳ सुमत्क्षराणा ꣳ
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ
उत्साहतोङ्गादङ्गादवत्तानां करत ऽ एवाश्विना जुषेता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४३)
होता ने अश्विनी कुमारों के लिए छाग ( ओषधि ) के बीच के भाग से यज्ञ
किया. द्वेषियों से पहले जिन्हें पौरुष से अन्न ग्रहण करने का अधिकार है, वे देवगण
अपने पौरुष से अन्न ग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि उस अन्न को पचा कर वायु
रूप में सैकड़ों गुना फैला देते हैं. कांख, कमर, गुप्तांग तथा अन्य अंगों को हानि न
हो. वे अंग पुष्ट हों. हे होता! सब के कल्याण हेतु यज्ञ करने की कृपा करें. ( ४३ )
होता यक्षत् सरस्वतीं मेषस्य हविष ऽ आवयदद्य मध्यतो मेद ऽ उद्धृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा
पौरुषेय्या गृभो घसन्नूनं घासे अज्राणां यवसप्रथमाना ꣳ सुमत्क्षराणा ꣳ
शतरुद्रियाणामग्निष्वात्तानां पीवोपवसनानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्साहतो ऽ
ङ्गादङ्गादवत्तानां करदेव ꣳ सरस्वती जुषता ꣳ हविर्होतर्यज.. (४४)
आज होता ने देवी सरस्वती के लिए मेष के बीच के भाग से यज्ञ किया. द्वेषियों
२७८ - यजुर्वेद