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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 263 of 421

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Page 263

पूर्वार्ध बीसवां अध्याय
इंद्र देव दूर या पास जहां कहीं भी हों हमारे पास पधारने की कृपा करें. वे उग्र,
बलवान, अभीष्टपूरक, ओजिष्ठ व राजा हैं. वे वज्र जैसी मजबूत भुजा वाले हैं.
युद्धों में शत्रुओं का मर्दन करने वाले हैं. (४८)
आ न ऽ इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छावाॅचीनोवसे राधसे च.
तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ.. (४९)
इंद्र देव अपने घोड़ों से हमारी रक्षार्थ हमें संपत्ति देने के लिए पधारें. वे वज्र
वाले और धनवान हैं. वे यज्ञशाला में पधारें और अपनी अन्नमयी हवि स्वीकारने
की कृपा करें. (४९)
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र १४ हवे हवे सुहव १४ शूरमिन्द्रम्.
ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्र १४ स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः... (५०)
इंद्र देव त्राता हैं. हम बारबार उन का आह्वान करते हैं. प्रत्येक हवन में उन का
आह्वान करते हैं. हम शूरवीर का अच्छी तरह आह्वान करते हैं. वे कल्याणकारी,
धनवान और धारणशील हैं. (५०)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ २ अवोभिः सुमृडीको भवतु विश्ववेदाः.
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (५१)
इंद्र देव अच्छे रक्षक, बहुत सहायकों वाले, सर्व वैभव संपन्न व सर्वज्ञ हैं. वे
हम से द्वेष रखने वाले को बाधित करें और हमें निर्भय बनाएं. उन की कृपा से हम
अच्छे पराक्रम के पालक हो जाएं. (५१)
तस्य वय १४ सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.
स सुत्रामा स्ववाँ २ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (५२)
इंद्र देव के प्रति हम सुमतिपूर्वक यज्ञ करने वाले, भद्र व अच्छे मन वाले हो
जाएं. वे अच्छे रक्षक व सहायकों वाले हैं. वे दूर होते हुए भी हमारा दुर्भाग्य दूर
करने के लिए शीघ्र ही हमारे पास आएं. (५२)
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः.
मा त्वा के चिन्नि यमन् विं न पाशिनोति धन्वेव ताँ २ इहि.. (५३)
इंद्र देव मोर के पंख जैसे रोमों वाले हैं. अपने घोड़ों से यहां आने की कृपा
करें. कोई भी जाल फैला कर आप को पाश में बांध न सके. आप बड़े धनुर्धारी
की तरह यहां पधारिए. (५३)
एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः.
स न स्तुतो वीरवद्धात्तु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... (५४)
यजुर्वेद - २६३