यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
सम्प्रच्यवध्वमुप सम्प्रयाताग्ने पथो देवयानान् कृणुध्वम्.
पुनः कृण्वानाः पितरा युवानान्वाता १७ सीत् त्वयि तन्तुमेतम्.. (५३)
हे ऋषिगणो! आप अग्नि के समीप पधारिए. आप इन्हें प्रज्वलित करने व
देवताओं का पथ प्रदर्शित करने की कृपा कीजिए. हमारे पितरों ने पुनः आप को
युवा बनाया. पितरों ने पुनः यज्ञों में आप का विस्तार किया. (५३)
उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स १७ सृजेथामयं च.
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (५४)
हे अग्नि! आप उद्बुद्ध होइए. आप यजमानों को भी जाग्रत कीजिए. आप
अपने इष्टजनों की इच्छापूर्ति कीजिए. सभी देवगण और यजमानगण इस की उत्तर
दिशा में अधिष्ठित होने की कृपा करें. (५४)
येन वहसि सहस्रं येनाग्ने सर्ववेदसम्. तेनेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (५५)
हे अग्नि! जिस से आप हजार गुने हो जाते हैं, जिस से आप सब कुछ के ज्ञाता
हो जाते हैं, आप उसी से हमारे इस यज्ञ में पधारिए और सभी देवों को लाने की
कृपा कीजिए. (५५)
अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः.
तं जानन्नग्न ऽ आरोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (५६)
हे अग्नि! यह आप का मूल स्थान है. इस से यजमान ऋतुकाल के कर्मों के
लिए जागते हैं. आप उन को जान कर आरोहण करने व हमारे धन की बढ़ोत्तरी
करने की कृपा कीजिए. (५६)
तपश्च तपस्यश्च शैशिरावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ऽ
ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः.
ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे.
शैशिरावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद्ध्रुवे
सीदतम्.. (५७)
तप तथा तपस्या के लिए शिशिर ऋतु से आवृत होइए. ये महीने अग्नि के
भीतर से जुड़े हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक सुखदायी हैं. ओषधियां आनंददायी हों.
अग्नियां संकल्पशील हों. जो अग्नियां समान मन वाली हैं, वे अग्नियां स्वर्गलोक
तथा पृथ्वीलोक के बीच स्थापित होने की कृपा करें. जैसे इंद्र देव आश्रय हैं, वैसे
ही शिशिर ऋतु से संबंधित देव आश्रय बनें. देवगण अंगिरा ऋषि की तरह ध्रुव हो
कर विराजमान होने की कृपा करें. (५७)
१९२ - यजुर्वेद 632/12